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त्वं तस्य॑ द्वया॒विनो॒ऽघशं॑सस्य॒ कस्य॑ चित् । प॒दाभि ति॑ष्ठ॒ तपु॑षिम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvaṁ tasya dvayāvino ghaśaṁsasya kasya cit | padābhi tiṣṭha tapuṣim ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम् । तस्य॑ । द्व॒या॒विनः॑ । अ॒घशं॑सस्य । कस्य॑ । चि॒त् । प॒दा । अ॒भि । ति॒ष्ठ॒ । तपु॑षिम्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:42» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:24» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर इन पूर्वोक्त चोरों की क्या गति करनी चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सेनासभाध्यक्ष ! (त्वम्) आप (तस्य) उस (द्वयाविनः) प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष औरों के पदार्थों को हरने वाले (कस्यचित्) किसी (अघशंसस्य) (तपुषिम्) चोरों की सेना को (पदाभितिष्ठ) बल से वशीभूत कीजिये ॥४॥
भावार्थभाषाः - न्याय करनेवाले मनुष्यों को उचित है कि किसी अपराधी चोर को दण्ड देने विना छोड़ना कभी न चाहिये, नहीं तो, प्रजा पीड़ायुक्त होकर नष्ट भ्रष्ट होने से राज्य का नाश होजाय इस कारण प्रजा की रक्षा के लिये दुष्ट कर्म करनेवाले अपराध किये हुए माता-पिता, आचार्य्य और मित्र आदि को भी अपराध के योग्य ताड़ना अवश्य देनी चाहिये ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

द्वयावी - अघशंस

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (पूषन्) - पोषकदेव ! (त्वम्) - आप (तस्य) - उस (कस्यचित्) - किसी के भी, अथवा पराया जो कोई भी वह हो, चाहे राजपुत्र भी हो, उस (द्वयाविनः) - सामने वा पीछे अपहरण करनेवाले - प्रत्यक्षापहार व परोक्षापहार से युक्त (अघशंसस्य) - हमारे विषय में अनिष्ट अघ [कपट] का शंसन करनेवाले पुरुष के (तपुषिम्) - इस परसन्तापक देह को (पदा, अभितिष्ठ) - पाँवों से आक्रान्त करके स्थित हो ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - राजा को चाहिए कि द्वयावी, अघशंस पुरुषों को पैरों - तले कुचल दे । प्रभु से भी यही आराधना है कि इन लोगों का परसन्तापक देह नष्ट ही हो जाए ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(त्वम्) पूर्वोक्तः पूषा (तस्य) पूर्वोक्तस्य वक्ष्यमाणस्य च (द्वयाविनः) प्रत्यक्षाप्रत्यक्षयोः परपदार्थापहर्तुः (अघशंसस्य) स्तेनस्य। अघशंस इति स्तेननामसु पठितम्। निघं० ३।२४। (कस्य) किंत्वमितिवदतः (चित्) अपि (पदा) पादाक्रमणेन (अभितिष्ठ) स्थिरो भव (तपुषिम्) श्रेष्ठानां संतापकारिकां सेनाम् ॥४॥

अन्वय:

पुनरेतेषां चोराणां का गतिः कार्य्येत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे पूषन्सेनासभाध्यक्ष ! त्वं तस्य द्वयाविनः कस्य चिदघशंसस्य तपुषिं पदाभितिष्ठ पादाक्रांतां कुरु ॥४॥
भावार्थभाषाः - नैव न्यायकारिभिर्मनुष्यैः कस्यापराधिनश्चोरस्य दण्डदानेन विना त्यागः कर्त्तव्यः। नोचेत्प्रजा पीडिता स्यात्तस्मात्प्रजारक्षणार्थं दुष्टकर्मकारिणः पित्राचार्य्यमातृपुत्रमित्रादयोऽपि सदैव यथाऽपराधं ताडनीयाः ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Pusha, whosoever the sinner, thief or robber, overt or covert, suppress, and keep his oppressive force under foot.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - न्यायाधीशाने अपराधी चोराला दंड दिल्याशिवाय कधी सोडू नये; अन्यथा प्रजेला त्रास होऊन ती नष्ट भ्रष्ट झाल्यास राज्याचा नाश होतो. यामुळे प्रजेच्या रक्षणासाठी दुष्ट कर्म करणाऱ्या अपराधी माता, पिता, पुत्र, आचार्य व मित्र इत्यादींनाही अपराधाप्रमाणे योग्य शिक्षा द्यावी. ॥ ४ ॥