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देवता: पूषा ऋषि: कण्वो घौरः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

यो नः॑ पूषन्न॒घो वृको॑ दुः॒शेव॑ आ॒दिदे॑शति । अप॑ स्म॒ तं प॒थो ज॑हि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yo naḥ pūṣann agho vṛko duḥśeva ādideśati | apa sma tam patho jahi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । नः॒ । पू॒ष॒न् । अ॒घः । वृकः॑ । दुः॒शेव॑ । आ॒दिदे॑शति । अप॑ । स्म॒ । तम् । प॒थः । ज॒हि॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:42» मन्त्र:2 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:24» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

जो धर्म्म और राज्य के मार्गों में विघ्न करते हैं, उनका निवारण करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (पूषन्) सब जगत् को विद्या से पुष्ट करनेवाले विद्वान् ! आप (यः) जो (अघः) पाप करने (दुःशेवः) दुःख में शयन कराने योग्य (वृकः) स्तेन अर्थात् दुःख देने वाला चोर (नः) हम लोगों को (आदिदेशति) उद्देश करके पीड़ा देता हो (तम्) उस दुष्ट स्वभाव वाले को (पथः) राजधर्म और प्रजामार्ग से (अपजहि) नष्ट वा दूर कीजिये ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को उचित है कि शिक्षा विद्या तथा सेना के बल से दूसरे के धन को लेने वाले शठ और चोरों को मारना सर्वथा दूर करना निरन्तर बाँध के राजनीति के मार्गों को भय से रहित संपादन करें जैसे जगदीश्वर दुष्टों को उनके कर्मों के अनुसार दण्ड के द्वारा शिक्षा करता है वैसे हम लोग भी दुष्टों को दण्ड द्वारा शिक्षा देकर श्रेष्ठ स्वभावयुक्त करें ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अघ - वृक - दुःशेव'

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (पूषन्) - पोषक प्रभो ! (यः) - जो कोई (अघः) - पापमय जीवनवाला, औरों को कष्ट पहुँचानेवाला (वृकः) - लोभ के कारण अन्याय्य धन का ग्रहण करनेवाला, (दुःशेवः) - दुष्ट सुखोंवाला, अर्थात् दुराचरण में आनन्द समझनेवाला (नः) - हमें (आदिदेशति) - सब प्रकार से बुराई का संकेत करता है, बुराई में पड़ने के लिए फुसलाता है (तम्) - उसको (पथः) - हमारे मार्ग से (अप, जहि स्म) - सुदूर भगा दीजिए [हन् गति], अर्थात् हमें इस जीवन - मार्ग में 'अघ, वृक व दुःशेव' पुरुष भटकाने में समर्थ न हों ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हमें जीवन - मार्ग में विचलित करनेवाले पुरुष प्राप्त न हों ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(यः) वक्ष्यमाणः (नः) अस्मान् (पूषन्) विद्वन् (अघः) अघं पापं विद्यते यस्मिन् सः (वृकः) स्तेनः। वृकइति स्तेनना०। निघं० ३।२४। (दुःशेवः) दुःखे शाययितुमर्हः (आदिदेशति) अतिसृजेदस्मानतिदेश्य पीडयेत् (अप) निवारणे (स्म) एव (तम्) दुष्टस्वभावम् (पथः) धर्मराजप्रजामार्गाद्दूरे (जहि) हिन्धि गमय वा ॥२॥

अन्वय:

ये धर्म्मराजमार्गेषु विघ्नकर्त्तारस्ते निवारणीयाइत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे पूषन् विद्वँस्त्वं योऽघो दुःशेवो वृकः स्तेनोऽस्मानादिदेशति तं पथोऽपजहि विनाशय वा दूरे निक्षिप ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैः शिक्षाविद्यासेनाबलेन परस्वादायिनः शठाश्चोराः सर्वथा हन्तव्या दूरतः प्रक्षेप्याः सततं बन्धनीयाश्चैवं विधाय राजधर्म्मप्रजामार्गा निःशंका निर्भयाः संपादनीयाः। यथा परमेश्वरो दुष्टाँस्तत्कर्म्मानुसारेण शिक्षते तथैवाऽस्माभिरप्येते शिक्षादण्डवेदद्वारा सर्वे साधवः संपादनीया इति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Pusha, lord of physical, moral, spiritual and intellectual nourishment, whoever be the sinner, the thief, the malignant enemy that orders us to be off from the right path, remove him from the path.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Those who put obstacles in the path of righteousness or Royal Roads should be removed, is taught in the Second Mantra.

अन्वय:

O nourisher, learned person, drive away from our path, (annihilate or throw away as the need be) a sinner who is a thief, a wicked, inauspicious person who deserves punishment for causing suffering to others, and who lies in wait to injure us.

पदार्थान्वयभाषाः - (अघः) अयं पापं विद्यते यस्मिन् सः = Sinner (वृक:) स्तेन: वृक इति स्तेन नाम ( निघ० ३.२४) = Thief.( दुःशेव:) दु:खे शाययितुमर्ह:= Punishable.
भावार्थभाषाः - Men should kill, throw away or imprison with the help of education, knowledge and army those wicked thieves who take away others' property. By so doing, they should make all roads and paths free from fear and danger. As God punishes the wicked according to their actions, in the same manner, we should also make them noble by giving proper Vedic education and suitable punishment.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी शिक्षण, विद्या व सेनेच्या बलाने दुसऱ्याच्या धनाचे अपहरण करणाऱ्या चोराचे हनन करून नेहमीसाठी दूर करावे. सतत बंधनात ठेवावे व राजनीतीचा मार्ग भयरहित करावा. जसे जगदीश्वर दुष्टांना दंड देऊन शिकवितो तसे आम्हीही दुष्टांना दंड देऊन शिक्षणाद्वारे श्रेष्ठ स्वभावाचे बनवावे. ॥ २ ॥