वांछित मन्त्र चुनें

वि दु॒र्गा वि द्विषः॑ पु॒रो घ्नन्ति॒ राजा॑न एषाम् । नय॑न्ति दुरि॒ता ति॒रः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vi durgā vi dviṣaḥ puro ghnanti rājāna eṣām | nayanti duritā tiraḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वि । दुः॒गा । वि । द्विषः॑ । पु॒रः । घ्नन्ति॑ । राजा॑नः । ए॒षा॒म् । नय॑न्ति । दुः॒इ॒ता । ति॒रः॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:41» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:22» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:3


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे राजप्रजा पुरुष क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - जो (राजानः) उत्तम कर्म वा गुणों से प्रकाशमान राजा लोग (एषाम्) इन शत्रुओं के (दुर्गा) दुःख से जाने योग्य प्रकोटों और (पुरः) नगरों को (घ्नन्ति) छिन्न-भिन्न करते और (द्विषः) शत्रुओं को (तिरोनयन्ति) नष्ट कर देते हैं, वे चक्रवर्त्ति राज्य को प्राप्त होने को समर्थ होते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो अन्याय करनेवाले मनुष्य धार्मिक मनुष्यों को पीड़ा देकर दुर्ग में रहते और फिर आकर दुःखी करते हों उनको नष्ट और श्रेष्ठों के पालन करने के लिये विद्वान् धार्मिक राजा लोगों को चाहिये कि उनके प्रकोट और नगरों का विनाश और शत्रुओं को छिन्न-भिन्न मार और वशीभूत करके धर्म से राज्य का पालन करें ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दुर्ग - द्विट् - दुरित' - दहन

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र के अनुसार बाहुसमूह की भाँति रक्षा करनेवाले 'वरुण, मित्र व अर्यमा' (एषां राजानः) - इनके, अर्थात् अपने उपासकों के जीवनों को दीप्त करते हैं [राज् दीप्तौ] और [राज् to regulate], ये उनके जीवनों को व्यवस्थित करनेवाले होते हैं  २. ये 'वरुण, मित्र और अर्यमा (एषां पुरः) - इनके आगे आनेवाली (दुर्गा) - विघ्नभूत कठिनाइयों को (विघ्नन्ति) - विशेषरूप से नष्ट करनेवाले होते हैं । (द्विषः) - इनके शत्रुओं को भी (विघ्नन्ति) - समाप्त करते हैं और (दुरिता) - इन्हें सब दुरितों बुराइयों के (तिरः नयन्ति) - नष्ट करनेवाले होते हैं । (द्विषः) - इनके शत्रुओं को भी (विघ्नन्ति) - ३२समाप्त करते हैं और (दुरिता) - इन्हें सब दुरितों बुराइयों के रः नयन्ति पार ले - जाते हैं ।  ३. 'निर्द्वेषता, स्नेह व दान' - ये तीन वृत्तियाँ ऐसी हैं कि इनसे जीवन के मार्ग में आनेवाली सब कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं । इनके होने पर हमारे शत्रु समाप्त हो जाते हैं । हम सब बुराइयों को पार करके दीप्त जीवनवाले बन जाते हैं ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - 'वरुण, मित्र और अर्यमा' हमारे दुर्गों, द्वेषियों व दुरितों को दूर करते हैं ।   
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(वि) विविधार्थे (दुर्गा) येषु दुःखेन गच्छन्ति तानि। अत्र सुदुरो रधिकरणे०। अ० ३।२।४८। इति #दुरुपपदाद्गमेर्डः प्रत्ययः। शेश्छन्दसि इति *लोपः। (वि) विशेषार्थे (द्विषः) ये द्विषन्त्यप्रीणयन्ति ताञ्छत्रून् (पुरः) पुराणि (घ्नन्ति) नाशयन्ति (राजानः) ये राजन्ते सत्कर्मगुणैः प्रकाशन्ते ते (एषाम्) शत्रूणाम् (नयन्ति) गमयन्ति (दुरिता) दुरिता दुःसहानि दुःखानि। अत्रापि शेर्लोपः। (तिरः) अदर्शने ॥३॥ #[टि० इति वार्त्तिकेन। सं०] *[शे लेपिः। सं०]

अन्वय:

पुनस्ते राजजनाश्च परस्परं किं कुर्युरित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - ये राजान एषां शत्रूणां दुर्गा घ्नन्ति द्विषः शत्रूँ स्तिरो नयन्ति ते साम्राज्यं प्राप्तुं शक्नुवन्ति ॥३॥
भावार्थभाषाः - येऽन्यायकारिणो धार्मिकान् पीड़यित्वा दुर्गस्था भवंति पुनरागत्य दुःखयंति तेषां विनाशाय श्रेष्ठानां पालनाय धार्मिका विद्वांसो राजपुरुषास्तेषां दुर्गाणि विनाश्य तान् छित्वा भित्वा हिंसित्वा मरणं वा वशत्वं प्रापय्य धर्मेण राज्यं पालयेयुः ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Brilliant rulers and others who shine, rout the forts and cities of these enemies and cast off all evil and suffering far away.
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How should the officers and subjects behave mutually is taught in the 3rd Mantra.

अन्वय:

The persons shining on account of their virtues, first destroy the strongholds of the enemies and drive them away and lead good men safely over distress. Such persons are fit to rule over an empire.

भावार्थभाषाः - Men should ever try to destroy those wicked persons, who trouble the righteous and then enter their forts, come out of them and then again cause trouble to the noble. They should always be engaged in protecting the righteous, in overcoming, subduing or even killing the wicked and administering the country righteously. ( राजानः ) ये राजन्ते सत्कर्मगुणैः प्रकाशन्ते ते | Those who shine on account of their virtues.
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी अन्यायी माणसे धार्मिक माणसांना त्रास देतात व किल्ल्यात राहतात व दुःखी करतात. त्यांना नष्ट करण्यासाठी व श्रेष्ठांचे पालन करण्यासाठी विद्वान धार्मिक राजांनी शत्रूंचे प्रकोट व नगर यांचा विनाश करावा. तसेच शत्रूंचे विदारण करून त्यांना ताब्यात ठेवावे व धर्माने राज्याचे पालन करावे. ॥ ३ ॥