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उप॑ क्ष॒त्रं पृ॑ञ्ची॒त हन्ति॒ राज॑भिर्भ॒ये चि॑त्सुक्षि॒तिं द॑धे । नास्य॑ व॒र्ता न त॑रु॒ता म॑हाध॒ने नार्भे॑ अस्ति व॒ज्रिणः॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

upa kṣatram pṛñcīta hanti rājabhir bhaye cit sukṣitiṁ dadhe | nāsya vartā na tarutā mahādhane nārbhe asti vajriṇaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उप॑ । क्ष॒त्रम् । पृ॒ञ्ची॒त । हन्ति॑ । राज॑भिः । भ॒ये । चि॒त् । सु॒क्षि॒तिम् । द॒धे॒ । न । अ॒स्य॒ । व॒र्ता । न । त॒रु॒ता । म॒हा॒ध॒ने । न । अर्भे॑ । अ॒स्ति॒ । व॒ज्रिणः॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:40» मन्त्र:8 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:21» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:8


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

ऐसे विद्वान् का कैसा राज्य होता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - जो मनुष्य (क्षत्रम्) राज्य को (पृञ्चीत) संबन्ध तथा (सुक्षितिम्) उत्तमोत्तम भूमि की प्राप्ति करानेवाले व्यवहार को (दधे) धारण करता है (अस्य) इस सर्व सभाध्यक्ष (वज्रिणः) बली के (राजभिः) रजपूतों के साथ (भये) युद्ध भीति में अपने मनुष्यों को कोई भी शत्रु (न) नहीं (हन्ति) मार सकता (न) (महाधने) नहीं महाधन की प्राप्ति के हेतु बड़े युद्ध में (वर्त्ता) विपरीत वर्त्तनेवाला और (न) इस वीर्यवाले के समीप (अर्भे) छोटे युद्ध में (चित्) भी (तरुता) बल को उल्लंघन करनेवाला कोई (अस्ति) होता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - जो रजपूत लोग महाधन की प्राप्ति के निमित्त बड़े युद्ध वा थोड़े युद्ध में शत्रुओं को जीत वा बांध के निवारण करने और धर्म से प्रजा का पालन करने को समर्थ होते हैं वे इस संसार में आनन्द को भोग कर परलोक में भी बड़े भारी आनन्द को भोगते हैं ॥८॥ अब उनतालीसवें सूक्त में कहे हुए विद्वानों के कार्यरूप अर्थ के साथ ब्रह्मणस्पति आदि शब्दों के अर्थों के संबंध से पूर्वसूक्त की संगति जाननी चाहिये ॥८॥ यह चालीसवां सूक्त और इक्कीसवां वर्ग समाप्त हुआ ॥४०।२१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ब्रह्म का क्षत्र से सम्पर्क

पदार्थान्वयभाषाः - १. (ब्रह्मणस्पतिः) - ज्ञान के पति को यह भी चाहिए कि वह (क्षत्रम्) - बल को भी (उपपृञ्चीत) - द्वितीय स्थान में प्राप्त करने का प्रयत्न करे । ज्ञान के साथ बल का सम्पादन आवश्यक है । अथवा क्षत्रियों के साथ इसका समुचित सम्पर्क हो, चूँकि ऐसा होने पर (राजभिः) - उन राजाओं के द्वारा (भये) - भय उपस्थित होने पर यह (हन्ति) - शत्रुओं का नाश कर सकता है । वस्तुतः क्षत्र को ब्रह्म का रक्षण करना ही चाहिए ।  २. इस रक्षण के होने पर यह ब्रह्मणस्पति (सुक्षितिं दधे) - उत्तम निवास को धारण करता है ।  ३. जब एक मनुष्य ब्रह्म के साथ क्षत्र को जोड़ देता है, अर्थात् ज्ञान व बल का मेल हो जाता है तब (अस्य) - इस (वज्रिणः) - क्रियाशीलतारूप वज्रवाले पुरुष का (महाधने) - बड़े - बड़े संग्रामों में व (अर्भे) - छोटे - छोटे युद्धों में (न वर्ता अस्ति) - मुकाबला करनेवाला नहीं होता है (न तरुता अस्ति) - न इसको कोई लाँघ जानेवाला व परास्त करनेवाला होता है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञान के साथ बल के मिल जाने पर हम शत्रुओं से भयभीत नहीं होते, हमारा निवास उत्तम होता है और हम बड़े - छोटे किसी भी संग्राम में पराजित नहीं होते ।   
टिप्पणी: विशेष - सूक्त का आरम्भ आचार्य के आदर्श के वर्णन से हुआ है । आचार्य को ज्ञानी, क्रियाशील, जितेन्द्रिय व सदा विद्यार्थी के साथ रहनेवाला होना चाहिए [३] । आचार्य अत्यन्त सहनशील हो, विद्यार्थी को 'ज्ञानी, सशक्त व जितेन्द्रिय' बनाने का प्रयत्न करे [२] । हम सूनृता वाणी व लोकहितकारी यज्ञों को अपनाएँ [३] । ये आचार्य लोग ही सच्चे दान के पात्र होते हैं [४] । आचार्य विद्यार्थी को सब विज्ञानों में निपुण बनाता है [५] । वेदवाणी के द्वारा सब सौन्दयों को प्राप्त कराता है [९] । इस देवयन् पुरुष को समृद्ध गृह प्राप्त होता है [७] । ब्रह्म के साथ क्षत्र को जोड़कर हम निर्भीकता से आगे बढ़ते हैं [८] । हमारे जीवनों में 'वरुण - मित्र - अर्यमा' का उचित स्थान होता है - यही उन्नति का मार्ग है ।  
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(उप) सामीप्ये (क्षत्रम्) राज्यम् (पृञ्चीत) सम्बध्नीत (हन्ति) नाशयति (राजभिः) राजपूतैः सह (भये) बिभेति यस्मात्तस्मिन् (चित्) अपि (सुक्षिति) शोभना क्षितिर्भूमिर्यस्मिन् व्यवहारे तम्। अत्र लोपस्त आत्मनेपदेषु। इति त लोपः। (न) निषेधार्थे (अस्य) पूर्वोक्तलक्षणाऽन्वितस्य सर्वसभाध्यक्षस्य (वर्त्ता) विपरिवर्तयिता। अत्र वृणोतेस्तृ च्र छन्दस्युभयथा इति सार्वधातुकत्वादिडभावः। (न) निषेधार्थे (तरुता) संप्लवनकर्त्ता। अत्र ग्रसित०। अ० ७।२।२४। इति निपातनम्। (महाधने) पुष्कलधनप्रापके संग्रामे (अर्भे) अल्पेयुद्धे (अस्ति) भवति (वज्रिणः) बलिनः। वज्रो वै वीर्यम्। शत० ७।४।२।२४। ॥८॥

अन्वय:

एतल्लक्षणस्य विदुषः कीदृशं राज्यं भवतीत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - यः क्षत्रं पृश्चीत सुक्षितिं दधेऽस्य वज्रिणो राजभिः संगे भये स्वकीयान् जनाञ्च्छत्रुर्न हन्ति महाधने युद्धे वर्त्ता विपरिवर्त्तयिता नास्त्यर्भे युद्धे चिदपि तरुता बलस्योल्लंघयिता नास्ति ॥८॥
भावार्थभाषाः - ये राजपुरुषा महाधनेऽल्पे वा युद्धे शत्रून् विजित्य बध्वा वा निवारयितुं धर्मेण राज्यं पालयितुं शक्नुवन्ति त इहानन्दं भुक्त्वा प्रेत्यापि महानन्दं भुञ्जते ॥८॥ अथैकोनचत्वारिंशत्सूक्तोक्तेन विद्वत्कृत्यार्थेन सह ब्रह्मणस्पत्यादीनामर्थानां संबन्धात्पूर्वेण सूक्तार्थेन सहैतदर्थस्य सङ्गतिरस्तीति बोध्यम्। इति चत्वारिंशं सूक्तमेकविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥४०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Brahmanaspati consolidates the ruling power. With warriors and statesmen he eliminates the enemies. In a state of fear and challenge he maintains his cool constancy. Wielder of the thunderbolt as he is, none can turn him, none can defeat even in the greatest battle. In little skirmishes? No question.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is the Government of such a learned person is taught in the 8th Mantra.

अन्वय:

Such a highly learned President of the Assembly or of the Council of Ministers, concentrates his strength and amplifies his lordly might with the aid of brave heroes shining with splendor; he slays his foes, being himself very mighty. In greater or lesser fight, none checks him, none subdues as he is the wielder of the thunderbolt. Even amid alarms, he remains secure.

पदार्थान्वयभाषाः - (क्षत्रम्) राज्यम् = Kingdom. (वर्ता) विपरिवर्तयिता = Changer or Checker. ( तरुता) संप्लवनर्ता = Subduer. (तृ-प्लवन-सन्तरणयोः) (वञ्त्रिण:) बलिन:, वज्नो वं वीर्यम् (शत ०७.४.२.२४) Of the mighty, holder of thunderbolt. This hymn is in continuation of the subject matter of the previous hymn and is connected with that. Thus ends the commentary on the fortieth hymn and 21st Verga of the first mandala of the Rigveda Sanhita.
भावार्थभाषाः - Those officers and workers of the State who conquer their enemies in greater as well as lesser fights, imprison them and restrain them from doing any mischief, can administer the State righteously, enjoy happiness in this world and attain emancipation after passing away.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे राजपुरुष महाधनाच्या प्राप्तीसाठी मोठ्या किंवा छोट्या युद्धात शत्रूंना जिंकून व बंधनात ठेवून त्यांचे निवारण करण्यासाठी व धर्माने प्रजेचे पालन करण्यासाठी समर्थ असतात. ते या संसारात आनंद भोगून परलोकातही फार मोठा आनंद भोगतात. ॥ ८ ॥