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को दे॑व॒यन्त॑मश्नव॒ज्जनं॒ को वृ॒क्तब॑र्हिषम् । प्रप्र॑ दा॒श्वान्प॒स्त्या॑भिरस्थितान्त॒र्वाव॒त्क्षयं॑ दधे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ko devayantam aśnavaj janaṁ ko vṛktabarhiṣam | pra-pra dāśvān pastyābhir asthitāntarvāvat kṣayaṁ dadhe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कः । दे॒व॒यन्त॑म् । अ॒श्न॒व॒त् । जन॑म् । कः । वृ॒क्तब॑र्हिषम् । प्रप्र॑ । दा॒श्वान् । प॒स्त्या॑भिः । अ॒स्थि॒त॒ । अ॒न्तः॒वाव॑त् । क्षय॑म् । द॒धे॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:40» मन्त्र:7 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:21» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:7


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

कोई ही मनुष्य विद्वान् मनुष्य को प्राप्त होकर विद्या को ग्रहण कर सकता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - (कः) कौन मनुष्य (देवयन्तम्) विद्वानों की कामना करने और (कः) कौन (वृक्तबर्हिषम्) सब विद्याओं में कुशल सब ऋतुओं में यज्ञ करनेवाले (जनम्) सकल विद्याओं में प्रकट हुए मनुष्य को (अश्नवत्) प्राप्त तथा कौन (दाश्वान्) दानशील पुरुष (प्रास्थित) प्रतिष्ठा को प्राप्त होवे और कौन (पस्त्याभिः) उत्तमगृहवाली भूमि में (अन्तर्वावत्) सबके अन्तर्गत चलनेवाले वायु से युक्त (क्षयम्) निवास करने योग्य घरको (दधे) धारण करे ॥७॥
भावार्थभाषाः - सब मनुष्य विद्या प्रचार की कामनावाले उत्तम विद्वान् को नहीं प्राप्त होते और न सब दानशील होकर सब ऋतुओं में सुखरूप घर को धारण कर सकते हैं, किन्तु कोई ही भाग्यशाली विद्वान् मनुष्य इन सबको प्राप्त हो सकता है ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

समृद्ध गृह को

पदार्थान्वयभाषाः - १. (देवयन्तं जनम्) - देवों की कामना करनेवाले, दिव्यगुणों की प्राप्ति के लिए यत्नशील मनुष्यों को (कः) - वह अनिवर्चनीय, आनन्दस्वरूप प्रभु (अश्नुवत्) - प्राप्त होता है । देवों को प्राप्त करते हुए हम उस महादेव को प्राप्त करनेवाले बनते हैं ।  २. (वृक्तबर्हिषम्) - जिसमें वे वासनाओं को छिन्न [वृजी वर्जने] किया गया है, ऐसे पवित्र हृदयान्तरिक्षवाले पुरुष को (कः) - वे आनन्दस्वरूप प्रभु प्राप्त होते हैं । एवं 'दिव्यगुणों को अपनाने के लिए प्रयत्न करना और इस प्रकार वासनाओं को विच्छिन्न करना' - यही मार्ग है जिससे कि हमें प्रभु की प्राप्ति होती है ।  ३. केवल प्रभु की प्राप्ति ही नहीं, यह (प्रदाश्वान्) - सदा खूब हवि देनेवाला दानशील पुरुष (पस्त्याभिः) - उत्तम मनुष्यों के साथ (प्र अस्थित) - उत्तमतया स्थित होता है, अर्थात् इसे उत्तम पुरुष का संग प्राप्त होता है और यह (क्षयं दधे) - [क्षि निवासे] उस घर को धारण करता है जोकि (अन्तर्वावत्) - [अन्तः स्थितबहुधनोपेतम्, सा०] खूब धन - धान्य से युक्त होता है अथवा [अन्तः स्थितपुत्रपौत्रादिबहुविधगुणोपेतम्, सा०] पुत्र - पौत्रादि के विविध उत्तम गुणों से युक्त घर को यह दाश्वान् प्राप्त होता है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - "दिव्यगुणों की प्राप्ति की कामना व हृदय को निर्वासन बनाना" प्रभुप्राप्ति का उपाय है । यह दाश्वान् पुरुष उत्तम पुरुषों के संग को प्राप्त करता है तथा धन - धान्ययुक्त घर को पाता है ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(कः) कश्चिदेव (देवयन्तं) देवानां कामयितारम् (अश्नवत्) प्राप्नुयात्। लेट् प्रयोगोयम्। (जनम्) सकल विद्याऽऽविर्भूतम् (कः) कश्चिदेव (वृक्तबर्हिषम्) सर्वविद्यासु कुशलमृत्विजम् (प्रप्र) प्रत्यर्थे। अत्र प्रसमुपोदः पादपूरणे अ० ८।१।६। इति द्वित्वम्। (दाश्वान्) दानशीलः (पस्त्याभिः) पस्त्यानि गृहाणि विद्यन्ते यासु भूमिषु ताभिः। पस्त्यमिति गृहना०। निघं० ३।४। ततः अर्शआदि#भ्योऽच्। अ० ५।२।१२७। (अस्थित) प्रतिष्ठते (अंतर्वावत्) अन्तर्मध्ये वाति गच्छति सोऽतर्वा वायुः स विद्यते यस्मिन् गृहे तत् (क्षयम्) क्षियन्ति निवसन्ति यस्मिँस्तत्। अत्र क्षिनिवासगत्योरित्यस्मात् एरच्* इत्यच्। भयादीनामितिवक्तव्यम् अ० ३।३।५६। इति नपुंसकत्वम्। (दधे) धरेत्। अत्र लिङर्थे लिट् ॥७॥ #[इत्यनेन मतुबर्थीयोऽच् प्रत्ययः। सं०] *[३।३।५६]

अन्वय:

कश्चिदेव विद्वांसं प्राप्य विद्याग्रहणं कर्त्तुं शक्नोतीत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - को मनुष्यो देवयन्तं कश्च वृक्तबर्हिषं जनमश्नवत्प्राप्नुयात् कोदाश्वान् प्रास्थित प्रतिष्ठिते को विद्वान् पस्त्याभिरंतर्वावत् क्षयं गृहं दधे धरेत् ॥७॥
भावार्थभाषाः - नैव सर्वे मनुष्या विद्याप्रचारकामं विद्वांसं प्राप्नुवन्ति नहि समस्ता दाश्वांसो भूत्वा सर्वर्तु सुखं गृहं धर्तुं शक्नुवन्ति। किन्तु कश्चिदेव भाग्यशाल्येतत्प्राप्नुमर्हतीति ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Who would reach the man of divine love? Who would go to the man of yajna who has collected the holy grass for the vedi? Who is the generous giver that finds a settled home with noble presences on open airy land and holds the fort? (Answer: Brahmanaspati).
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

It is only some that can attain knowledge from the learned persons is taught in the 7th Mantra.

अन्वय:

Who is the person that approaches a man desiring to get divine attributes and is himself devoted to enlightened truthful persons ? Who approaches a highly learned priest well-versed in all sciences devoid of all impurity ? Who is the charitably disposed lucky person that builds a beautiful house on good ground, full of pure air and well-ventilated ?

पदार्थान्वयभाषाः - (दाश्वान्) दानशील: दाशृ-दाने = Charitable. ( पस्त्याभि: ) पस्त्यानि गृहाणि विद्यन्ते यासु भूमिषु ताभिः । पस्त्यम् इति गृहनाम ( निघ० ३.४ ) ततः 'अर्श आदिभ्योऽच' (अष्टा० ५.२.१२७) (अन्तर्वावत् ) अन्तर्मध्ये वाति गच्छति सः अन्तर्वा वायुः स विद्यते यस्मिन् गृहे तत् | = Well ventilated.
भावार्थभाषाः - It is not all persons that approach a learned man who desires to diffuse knowledge. It is not all that can build a house that is suitable and source of happiness in all seasons. But it is only some fortunate persons that are able to do it.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - सर्व माणसांना विद्या प्रचाराची कामना असणाऱ्या उत्तम विद्वानांची संगत मिळत नाही. तसेच सर्वजण दानशील बनून सर्व ऋतूत सुखयुक्त घर धारण करू शकत नाहीत. तर एखादा भाग्यवान विद्वान माणूसच या सर्वांना प्राप्त करू शकतो. ॥ ७ ॥