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तं त्वा॒ वाजे॑षु वा॒जिनं॑ वा॒जया॑मः शतक्रतो। धना॑नामिन्द्र सा॒तये॑॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

taṁ tvā vājeṣu vājinaṁ vājayāmaḥ śatakrato | dhanānām indra sātaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तम्। त्वा॒। वाजे॑षु। वा॒जिन॑म्। वा॒जया॑मः। श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो। धना॑नाम्। इ॒न्द्र॒। सा॒तये॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:4» मन्त्र:9 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:8» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:2» मन्त्र:9


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर इन्द्र शब्द से अगले मन्त्र में ईश्वर का प्रकाश किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - हे (शतक्रतो) असंख्यात वस्तुओं में विज्ञान रखनेवाले (इन्द्र) परम ऐश्वर्य्यवान् जगदीश्वर ! हम लोग (धनानाम्) पूर्ण विद्या और राज्य को सिद्ध करनेवाले पदार्थों का (सातये) सुखभोग वा अच्छे प्रकार सेवन करने के लिये (वाजेषु) युद्धादि व्यवहारों में (वाजिनम्) विजय करानेवाले और (तम्) उक्त गुणयुक्त (त्वा) आपको ही (वाजयामः) नित्य प्रति जानने और जनाने का प्रयत्न करते हैं॥९॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य दुष्टों को युद्ध से निर्बल करता तथा जितेन्द्रिय वा विद्वान् होकर जगदीश्वर की आज्ञा का पालन करता है, वही उत्तम धन वा युद्ध में विजय को अर्थात् सब शत्रुओं को जीतनेवाला होता है॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

धन - संभजन

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (शतक्रतो) - अनन्त प्रज्ञान व कर्मवाले प्रभो ! (वाजेषु) - काम - क्रोधादि के साथ संग्रामों में (वाजिनम्) - प्रशस्त शक्ति को देनेवाले (तं त्वा) - उस आपको हम (वाजयामः) अर्चित करते हैं [वाजयति - अर्चति - निरु०] । वस्तुतः कोई भी व्यक्ति इस अध्यात्म - संग्राम में प्रभु के उपासन से ही शक्ति को प्राप्त करता है ; जीव स्वयं इन प्रबल शत्रुओं को जीत नहीं सकता । ["त्वया स्विद् युजा वयम्' प्रभुरूप मित्र के साथ ही हम इनको जीत पाते हैं] ।  २. हे (इन्द्रः) परमैश्वर्यशाली प्रभो ! इन कामादि शत्रुओं को जीतकर (धनानां सातये) - धनों की प्राप्ति के लिए भी हम आपकी ही अर्चना करते हैं । आपने ही हमें वे सब वस्तुएँ प्राप्त करानी हैं जिनसे कि मनुष्य धन्य बनता है । 'शरीर का स्वास्थ्य  , मन का नैर्मल्य व बुद्धि की तीव्रता' ये सब प्रभु - कृपा से ही हमें प्राप्त होते हैं । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ही हमें अध्यात्मसंग्रामों में विजयी बनाते हैं और धन प्राप्त कराते हैं ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनरिन्द्रशब्देनेश्वर उपदिश्यते।

अन्वय:

हे शतक्रतो इन्द्र जगदीश्वरं ! वयं धनानां सातये वाजेषु वाजिनं तं पूर्वोक्तमिन्द्रं परमेश्वरं त्वामेव सर्वान्मनुष्यान्प्रति वाजयामो विज्ञापयामः॥९॥

पदार्थान्वयभाषाः - (तम्) इन्द्रं परमेश्वरम् (त्वा) त्वाम् (वाजेषु) युद्धेषु (वाजिनम्) विजयप्रापकम्। वाजिन इति पदनामसु पठितत्वात्प्राप्त्यर्थोऽत्र गृह्यते। (वाजयामः) विज्ञापयामः। वज गतावित्यन्तर्गतण्यर्थेन ज्ञापनार्थोऽत्र गृह्यते। (शतक्रतो) शतेष्वसंख्यातेषु वस्तुषु क्रतुः प्रज्ञा यस्य तत्सम्बुद्धौ। क्रतुरिति प्रज्ञानामसु पठितम्। (निघं०३.९) (धनानाम्) पूर्णविद्याराज्यादिसाध्यपदार्थानाम् (इन्द्र) परमैश्वर्य्यवन् ! (सातये) सुखार्थं सम्यक्सेवनाय॥९॥
भावार्थभाषाः - यो दुष्टान् युद्धेन निर्बलान् कृत्वा जितेन्द्रियो विद्वान् भूत्वा जगदीश्वराज्ञां पालयति, स एव मनुष्यो धनानि विजयं च प्राप्नोतीति॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of light and power, hero of a hundred yajnic creations, we celebrate your glory of speed and success in the battles of humanity for the achievement of the wealth of life and prosperity of the people.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Now again by Indra, God is meant.

अन्वय:

O Omniscient God, we give Thy knowledge to all people for the acquirement of all things to be obtained through knowledge and kingdom etc. so that we may use them properly and enjoy happiness. It is Thou who givest victory to righteous persons in their battles with the wicked.

भावार्थभाषाः - Only that learned person acquires wealth and is victorious who makes un-righteous weak or powerless and having controlled his senses, obeys God's commands.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जो माणूस दुष्टांना युद्धाने निर्बल करतो व जितेन्द्रिय, विद्वान बनून जगदीश्वराच्या आज्ञेचे पालन करतो, तोच उत्तम धन प्राप्त करतो व युद्धात विजय मिळवून सर्व शत्रूंना जिंकणारा असतो. ॥ ९ ॥