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असा॑मि॒ हि प्र॑यज्यवः॒ कण्वं॑ द॒द प्र॑चेतसः । असा॑मिभिर्मरुत॒ आ न॑ ऊ॒तिभि॒र्गन्ता॑ वृ॒ष्टिं न वि॒द्युतः॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asāmi hi prayajyavaḥ kaṇvaṁ dada pracetasaḥ | asāmibhir maruta ā na ūtibhir gantā vṛṣṭiṁ na vidyutaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

असा॑मि । हि । प्र॒य॒ज्य॒वः॒ । कण्व॑म् । द॒द । प्र॒चे॒त॒सः॒ । असा॑मिभिः । म॒रु॒तः॒ । आ । नः॒ । ऊ॒तिभिः॑ । गन्त॑ । वृ॒ष्टिम् । न । वि॒द्युतः॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:39» मन्त्र:9 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:19» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:9


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उनसे शोधे वा प्रेरे हुए वे क्या२ करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (प्रयज्यवः) अच्छे प्रकार परोपकार करने (प्रचेतसः) उत्तम ज्ञानयुक्त (मरुतः) विद्वान् लोगो ! तुम (असामिभिः) नाशरहित (ऊतिभिः) रक्षा सेना आदि से (न) जैसे (विद्युतः) सूर्य बिजुली आदि (वृष्टिम्) वर्षा कर सुखी करते हैं वैसे (नः) हम लोगों को (असामि) अखंडित सुख (दद) दीजिये (हि) निश्चय से दुष्ट शत्रुओं को जीतने के वास्ते (कण्वम्) और आप्त विद्वान् के समीप नित्य (आगन्त) अच्छे प्रकार जाया कीजिये ॥९॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे पवन सूर्य बिजुली आदि वर्षा करके सब प्राणियों के सुख के लिये अनेक प्रकार के फल, पत्र, पुष्प, अन्न आदि को उत्पन्न करते हैं वैसे विद्वान् लोग भी सब प्राणीमात्र को वेद विद्या देकर उत्तम-२ सुखों को निरन्तर संपादन करें ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ब्रह्म' का रक्षक 'क्षत्र'

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (मरुतः) - वीर सैनिको ! आप (हि) - निश्चय से (असामि) - पूर्णरूप से (प्रयज्यवः) - परोपकार नाम यज्ञ को [द०] करनेवाले हैं । ये वीर सैनिक अपने प्राणों की आहुति देकर राष्ट्र की रक्षा करते हैं, इससे बढ़कर परोपकार क्या हो सकता है ?  २. हे वीर सैनिको ! (प्रचेतसः) - प्रकृष्ट चेतनावाले आप (कण्वं, दद) - मेधावी पुरुष को [धारयत - सा०] धारण करते हैं । समझदार क्षत्रिय राष्ट्र में ब्राह्मण की रक्षा करना अपना मूल कर्तव्य समझता है ।  ३. हे वीर सैनिको ! आप (असामिभिः, ऊतिभिः) - पूर्ण रक्षणों से (नः) - हमें उसी प्रकार (आगन्त) - समन्तात् प्राप्त होओ (नः) - जैसे (वृष्टिम्) - वृष्टि को (विद्युतः) - बिजलियाँ प्राप्त होती हैं । विद्युत् वृष्टि की वृद्धि का कारण होती है, इसी प्रकार वीर सैनिक रक्षण के द्वारा प्रजा की वृद्धि का कारण बनें ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - राष्ट्र में क्षत्र को ब्रह्म का रक्षण करना चाहिए ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(असामि) संपूर्णम्। सामीति खण्डवाची। नसाभ्यसाभि (हि) खलु (प्रयज्यवः) प्रकृष्टो यज्युः परोपकाराख्यो यज्ञो येषां राजपुरुषाणां तत्संबुद्धौ (कण्वम्) मेधाविनं विद्यार्थिनम् (दद) दत्त। अत्र लोडर्थे लिट्। (प्रचेतसः) प्रकृष्टं चेतो ज्ञानं येषां ते (असामिभिः) क्षयरहिताभिः रीतिभिः। अत्र षैक्षय इत्यस्माद्बाहुलकादौणादिकोमिः प्रत्ययः। (मरुतः) पूर्णबला ऋत्विजः (आ) समन्तात् (नः) अस्मभ्यम् (ऊतिभिः) रक्षादिभिः (गन्त) गच्छत। अत्र दीर्घः। (वृष्टिम्) वर्षाः (न) इव (विद्युतः) स्तनयित्नवः ॥९॥

अन्वय:

पुनस्तच्छोधिताः प्रेरिताः किं किं साध्नुवन्तीत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे प्रयज्यवः प्रचेतसो मरुतो यूयं सामिभिरूतिभिर्न विद्युतो वृष्टिं #नारसामि सुखं सर्वस्मै दद हि किल शत्रुविजयाय कण्वमागन्त ॥९॥ #[‘नोऽसामि सुखं दद’। सं०।]
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। यथा मरुतः सूर्यविद्युतश्च वृष्टिं कृत्वा सर्वेषां प्राणिनां सुखाय विविधानि फलपत्रपुष्पादीन्युत्पादयन्ति। तथैव विद्वांसः सर्वेभ्यो मनुष्येभ्यो वेदविद्यां दत्त्वा सुखानि संपादयंत्विति ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Heroic yajakas, brilliant men of knowledge and wisdom, mighty heroes of the speed of winds, just as flashes of lightning bring showers of rain for us, so with spontaneous, unqualified and unreserved powers and protections give us peace, freedom and comfort, whole, complete and undisturbed. And to suppress the evil and the wicked, go to the man of wisdom and vision for light and guidance.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What do people reformed and prompted by them (Maruts) accomplish is taught in the ninth Mantra.

अन्वय:

O mighty highly learned persons who are always engaged in the performance of Yajna in the form of philanthropic activities, give entire happiness to all by your undivided protective powers as lighting brings the rain. Come to the aid of a highly intelligent person for conquering his enemies.

पदार्थान्वयभाषाः - ( प्रचेतसः ) प्रकृष्टं चेतो ज्ञानं येषां ते = Full of Knowledge. (असामि) सम्पूर्णम् | सामीति खण्डवाची । न सामि असामि । = Entire, whole S. Sama-Latin and English Semi. (असामिभिः ) क्षयरहिताभिः रीतिभिः अत्र षैक्षये इत्यस्माद् बाहुलकादौणादिको मिप्रत्ययः । = By un-decaying manners.
भावार्थभाषाः - There is Upamalankara or simile used in the Mantra. As Monsoon winds, sun and lightning cause the production of fruits and flowers by means of the rains for the happiness of all, in the same manner, learned persons should make all people happy by giving them Vedic knowledge.
टिप्पणी: Wilson, Griffith, Maxmuller and other Western translators have again committed the mistake of taking Kanva as the name of a particular sage, instead of taking it as a general noun denoting a highly intelligent person as un-ambiguously stated in the Vedic Lexicon-Nighantu- कण्व इति मेधाविनाम (निघ० ३,१५) How audacious are some of these Western scholars is exemplified by Ludwig's conjecture which Prof. Maxmuller remarks as bold. “Ludwig proposes some bold conjectures. He would change ( कण्वम् Kanvam ) to (रएवम् Ranvam ). " No comments are needed. It is remarkable that Prof. Maxmuller also translates प्रचेतसः as wise Maruts and so does Griffith. Is it applicable to Storm Gods ?
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसे वायू, सूर्य, विद्युत इत्यादी वृष्टी करून सर्व प्राण्यांच्या सुखासाठी अनेक प्रकारची फळे, पत्र, पुष्प, अन्न इत्यादी उत्पन्न करतात तसे विद्वान लोकांनीही सर्व प्राणिमात्रांना वेदविद्या देऊन उत्तम सुख निरंतर संपादन करावे. ॥ ९ ॥