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यु॒ष्मेषि॑तो मरुतो॒ मर्त्ये॑षित॒ आ यो नो॒ अभ्व॒ ईष॑ते । वि तं यु॑योत॒ शव॑सा॒ व्योज॑सा॒ वि यु॒ष्माका॑भिरू॒तिभिः॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yuṣmeṣito maruto martyeṣita ā yo no abhva īṣate | vi taṁ yuyota śavasā vy ojasā vi yuṣmākābhir ūtibhiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यु॒ष्माइ॑षि॑तः । म॒रु॒तः॒ । मर्त्य॑इषितः । आ । यः । नः॒ । अभ्वः॑ । ईष॑ते । वि । तम् । यु॒यो॒त॒ । शव॑सा । वि । ओज॑सा । वि । यु॒ष्माका॑भिः । ऊ॒तिभिः॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:39» मन्त्र:8 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:19» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:8


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर तुमको उनसे क्या सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (मरुतः) विद्वानों ! तुम (यः) जो (अभ्वः) विरोधी मित्र भाव रहित (युष्मेषितः) तुम लोगों को जीतने और (मर्त्येषितः) मनुष्यों से विजय की इच्छा करनेवाला शत्रु (नः) हम लोगों को (ईषते) मारता है उसको (शवसा) बलयुक्त सेना वा (व्योजसा) अनेक प्रकार के पराक्रम और (युष्माकाभिः) तुम्हारी कृपापात्र (ऊतिभिः) रक्षा प्रीति तृप्ति ज्ञान आदिकों से युक्त सेनाओं से (वियुयोत) विशेषता से दूर कर दीजिये ॥८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को उचित है कि जो स्वार्थी परोपकार से रहित दूसरे को पीड़ा देने में अत्यन्त प्रसन्न शत्रु हैं उनको विद्या वा शिक्षा के द्वारा खोटे कर्मों से निवृत्त कर वा उत्तम सेना बल को संपादन युद्ध से जीत निवारण करके सबके हित का विस्तार करना चाहिये ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सैनिक शासन व राज - परिवर्तन

पदार्थान्वयभाषाः - १. राष्ट्र में ऐसा भी हो सकता है कि कभी कोई उच्छृङ्खल राजा अपने सैनिकों के बल के घमण्ड से प्रजा पर कुछ अत्याचार करने लगे अथवा अपने कुछ खुशामदी पुरुषों से विकृत प्रेरणा प्राप्त करके प्रजा को अनुचित कर - भार से पीड़ित करे, ऐसा राजा मन्त्र में 'युष्मेषितः तथा मर्त्येषितः' शब्दों से स्मरण किया गया है । 'इषितः ' का अर्थ [animated, exited] 'उत्तेजित किया गया' है । मन्त्र में कहते हैं कि हे (मरुतः) - प्रजा के रक्षण के लिए रणाङ्गण में मृत्यु का आलिंगन करनेवाले वीरो ! (युष्मेषितः) - तुम्हारे द्वारा प्रेरित हुआ - हुआ, अर्थात् तुम्हारे बल के कारण अत्याचार के लिए उत्तेजित हुआ - हुआ अथवा (मर्त्येषितः) - खुशामदी पुरुषों से भड़काया हुआ (यः) - जो कोई (अभ्वः) - [Mighty] शक्तिशाली प्रजा का शत्रुभूत राजा (नः) - हम प्रजाओं पर (आ ईषते) - सब ओर से आक्रमण करता है (तम्) - उसको (शवसा) - [शवः उदकनाम, नि० १/१२] पानी से (वियुयोत) - पृथक् कर दीजिए, उसे पानी न मिल सके । पानी की प्यास से व्याकुल होकर वह अपनी उद्दण्डता को समाप्त करने के लिए बाधित होगा ही । सायणाचार्य 'शवसा' का अर्थ 'अन्नेन' करते हैं, उसे अन्न न पहुँच सके । राजमहल को इस प्रकार घेर लिया जाए कि वहाँ अन्नादि पहुँचना सम्भव ही न रहे । इस राजा को (ओजसा) - ओज व बल से  (वि) - पृथक् करो । इसकी शक्ति को न्यून करने का प्रयत्न करो तथा (युष्माकाभिः, ऊतिभिः) - अपने रक्षणों से (वि) - इसे वंचित कर दो । जब इस प्रजापीड़क राजा को सैनिकों का रक्षण प्राप्त न होगा तो यह अवश्य ही प्रजा के अनुकूल शासन करने के लिए बाधित होगा अथवा गद्दी को छोड़ने के लिए बाधित किया जा सकेगा ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - सैनिकों को चाहिए कि सेना के घमण्ड पर या खुशामदियों के कुमन्त्रण के कारण यदि कोई राजा उच्छृङ्खल होकर प्रजापीड़न में प्रवृत्त हो तो उसे अन्न व जल से वंचित करके, निर्बल करके व सैन्य रक्षणों से वंचित करके ठीक मार्ग पर लाने का प्रयत्न करें ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(युष्मेषितः) यो युष्माभिर्जेतुमिषितः सः। अत्र छान्दसो वर्णलोपो वा इति दकारलोपः। इमं सुगमपक्षं विहाय सायणाचार्येण प्रत्ययलक्षणादिकोलाहलः कृतः (मरुतः) ऋत्विजः। मरुत इति ऋत्विङ् नामसु पठितम्। निघं० ३।१८। (मर्त्येषितः) मर्त्यैः सेनास्थैरितरैश्चेषितो विजयः (आ) समन्तात् यः शत्रुः (नः) अस्मान् (अभ्वः) यो विरोधी मित्रो न भवति सः (ईषते) हिनस्ति (वि) विगतार्थे (तम्) शत्रुम् (युयोत) पृथक् कुरुत। अत्र बहुलं छन्दसि इति शपः श्लुः। तप्तनप्तन० इति तबादेशः। (शवसा) बलयुक्तसैन्येन (वि) विविधार्थे (ओजसा) पराक्रमेण (वि) विशिष्टार्थे (युष्माकाभिः) युस्माभिरनुकंपिताभिः सेनाभिः (ऊतिभिः) रक्षाप्रीतितृप्त्यवगमप्रवेशयुक्ताभिः ॥८॥

अन्वय:

पुनः युष्माभिस्तेभ्यः किं साधनीयमित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मरुतो ! यूयं योऽभ्वो युष्मेषितो मर्त्येषितः शत्रुर्नोस्मानीषते तं शवसा व्योजसा युष्माकाभिरूतिभिर्वियुयोत ॥८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैर्ये स्वार्थिनः परोपकारविरहाः परपीडारता अरयः सन्ति तान् विद्याशिक्षाभ्यां दुष्कर्मभ्यो निवर्त्याऽथवा परमे सेनाबले संपाद्य युद्धेन विजित्य निवार्य सर्वहितं सुखं विस्तारणीयम् ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Maruts, veterans of knowledge and heroes of might and right, if the monstrous enemy whom you would wish to subdue and whom the people wish to suppress attacks us, then with your valour and splendour and with your means of protection and promotion for us, ward him off.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What more should you accomplish with their help and co-operation is taught in the 8th Mantra.

अन्वय:

O brave learned people, whatever adversary whom you and other persons of the army desire to overcome, attacks us, deprive him of power, by your strong army, by your own might and by your defending forces endowed with protection, love and knowledge etc.

पदार्थान्वयभाषाः - ( मरुतः ) ऋत्विजः मरुत इति ऋत्विङ्नामसु पठितम् ( निघ० ३.१८ ) = Priests and other learned persons. (ईषते) हिनस्ति = Attacks or assails. (अभ्वः) यो विरोधी, मित्रो न भवति सः = Adversary, not friendly. (ऊतिभिः) रक्षाप्रीतितृप्त्यवगमप्रवेशयुक्ताभिः सेनाभिः = Forces endowed with protection, love and knowledge etc. (वियुयोत) पृथक् कुरुत = Remove, deprive.
भावार्थभाषाः - Men should extend happiness which brings about welfare to all, by making them refrain from evil selfish enemies who have no idea of doing good to others, but on the contrary who give them trouble, by imparting them good knowledge and education or conquering them in battles with the help of army and power.
टिप्पणी: ईषते is from ईष-गतिहिंसादर्शनेषु Here the second meaning of the Verb हिंसा has been taken by Rishi Dayananda and has been interpreted as हिनस्ति Attacks or assails. यु-मिश्रणा मिश्रणयोः Here it is in the sense of अमिश्रण removing or depriving of power. " Prof. Maxmuller's translation of the Mantra as “Whatever fiend, roused by you or roused by men, attacks us, deprive him of power, of strength, and of your favors," is not correct as it is absurd to say that the Maruts (learned priests or other good brave people) rouse the fiends or wicked persons.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - स्वार्थी व परोपकाररहित, दुसऱ्याला त्रास देताना प्रसन्न होणारे लोक शत्रू असतात. हे माणसांनी जाणावे. त्यांना विद्या व शिक्षणाद्वारे खोट्या कर्मापासून निवृत्त करावे. उत्तम सेना बल संपादन करून युद्धात जिंकून त्यांचे निवारण करावे व सर्वांच्या हिताचा विस्तार करावा. ॥ ८ ॥