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उपो॒ रथे॑षु॒ पृष॑तीरयुग्ध्वं॒ प्रष्टि॑र्वहति॒ रोहि॑तः । आ वो॒ यामा॑य पृथि॒वी चि॑दश्रो॒दबी॑भयन्त॒ मानु॑षाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

upo ratheṣu pṛṣatīr ayugdhvam praṣṭir vahati rohitaḥ | ā vo yāmāya pṛthivī cid aśrod abībhayanta mānuṣāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उपो॒ इति॑ । रथे॑षु । पृष॑तीः । अ॒यु॒ग्ध्व॒म् । प्रष्टिः॑ । व॒ह॒ति॒ । रोहि॑तः । आ । वः॒ । यामा॑य । पृ॒थि॒वी । चि॒त् । अ॒श्रो॒त् । अबी॑भयन्त । मानु॑षाः॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:39» मन्त्र:6 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:19» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:6


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर मनुष्यों को किसके साथ इनको युक्त करके कार्यों को सिद्ध करने चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (मानुषाः) विद्वान् लोगो ! तुम (वः) अपने (यामाय) स्थानान्तर में जाने के लिये (पृष्टिः) प्रश्नोत्तरादि विद्या व्यवहार से विदित (रोहितः) रक्त गुणयुक्त अग्नि (पृथिवी) स्थल जल अन्तरिक्ष मे जिन को (उपवहति) अच्छे प्रकार चलाता है जिनके शब्दों को (अश्रोत्) सुनते और (अबीभयन्त) भय को प्राप्त होते हैं उन (रथेषु) रथों में (पृषतीः) वायुओं को (अयुग्ध्वम्) युक्त करो ॥६॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य यानों में जल अग्नि और वायु को युक्त कर उनमें बैठ गमनागमन करें तो सुख ही से सर्वत्र जाने-आने को समर्थ हों ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'रोहित व प्रष्टि' राजा

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे मरुतो ! आप (रथेषु) - अपने रथों में (पृषतीः) - भय का सेचन करनेवाली [पृष् to sprinkle] घोड़ियों को (उ) - निश्चय से (उप, अयुग्ध्वम्) - समीपता से जोतिए । रथों में जुड़ी ये घोड़ियाँ भी [पृष् to injure] शत्रुओं की हिंसा करनेवाली हों ।  २. आपमें (रोहितः) - अपनी शक्तियों को उन्नत करके राष्ट्र का वर्धन करनेवाला (प्रष्टिः) - आचार्य - चरणों में बैठकर विविध जिज्ञासाओं को करनेवाला ज्ञानी राजा (वहति) - राष्ट्रभार को अपने कन्धों पर उठाता है ।  ३. (वः) - आपके (यामाय) - गति के लिए अथवा शत्रु पर आक्रमण के लिए (पृथिवी चित्) - यह सारी पृथिवी ही (अश्रोत्) - सुनती है, अर्थात् जब आप शत्रुओं पर आक्रमण करते हो तो उस आक्रमण के विषय में सारे ही लोग बड़े आश्चर्य व उत्सुकता से सुनते हैं । (मानुषाः) - शत्रुओं के पुरुष (अबीभयन्त) - भय से काँप उठते हैं । वस्तुतः इस प्रकार के वीर सैनिकों के बल पर ही राजा राष्ट्र को धारण व उत्थान करने में समर्थ होता है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - राजा के लिए 'रोहित व प्रष्टि' - उन्नत शक्तियों व ज्ञान की प्यासवाला होना आवश्यक है । सैनिक वीर कार्यों के करनेवाले हों ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(उपो) सामीप्ये (रथेषु) स्थलजलान्तरिक्षाणां मध्ये रमणसाधनेषु यानेषु (पृषतीः) पर्षंति सिंचन्ति याभिस्ताः शीघ्रगतीः मरुतां धारणवेगादयोऽश्वाः। पृषत्यो मरुतामित्यादिष्टोपयोजननामसु पठितम्। निघं० १।१५। (अयुग्ध्वम्) सम्प्रयुङ्ध्वम्। अत्र लोडर्थे लुङ्। बहुलं छन्दसि इति विकरणाभावश्च (प्रष्टिः) पृच्छन्ति ज्ञीप्संत्यनेन सः (वहति) प्रापयति (रोहितः) रक्तगुणविशिष्टस्याग्नेर्वेगादिगुणसमूहः। रोहितोग्नेरित्यादिष्टोपयोजननामसु पठितम्। निघं० १।३#। (चित्) एव (अश्रोत्) श्रृणोति। अत्र बहुलं छन्दसि इति विकरणभावः। (अबीभयन्त) भीषयन्ते। अत्र लडर्थे लुङ्। (मानुषाः) विद्वांसो जनाः ॥६॥ #[नि० १।१५।]

अन्वय:

पुनर्मनुष्यैः केन सहैतान्संप्रयोज्य कार्याणि साधनीयानी त्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मानुषा ! यूयं वो युष्माकं यामाय प्रष्टीरोहितोग्निः पृथिवी भूमावन्तरिक्षे गमनाय यान् वहति यस्य शब्दानश्रोदबीभयन्त तेषु रथेषु तं पृषतीश्चायुग्ध्वम् ॥६॥
भावार्थभाषाः - यदि मनुष्या यानेषु जलाग्निवायुप्रयोगान् कृत्वा तत्र स्थित्वा गमनागमने कुर्युस्तर्हि सुखेनैव सर्वत्र गन्तुमागन्तुं च शक्नुयुः ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For your travel on earth and in the sky, yoke to your chariot horses fast as winds. Let the red fire with the mist be the leader in front as motive power of the carrier. Let the earth hear the boom and people feel fear and awe.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

With whose association, should they ( Maruts) accomplish their tasks is taught further in the 6th Mantra.

अन्वय:

O men, in order that your chariots (Vehicles) may travel on earth, water and the sky, you should yoke or harness the red fire about which you may ask the learned scientists. This fire mainly sustains the vehicles, and by its sound men are frightened.

पदार्थान्वयभाषाः - ( रथेषु ) स्थलजलान्तरिक्षाणां मध्ये रमणसाधनेषु यानेषु = In the vehicles by which a man can travel on earth, water and the firmament. (पृषतीः) पर्षन्ति सिंचन्ति याभिस्ताः शीघ्रगतीः मरुतां धारणवेगादयोऽश्वाः | पृषत्यो मरुतामित्यादिष्टोपयोजननामसु पठितम् ( निघ० १.१५) = Fast going airs. ( रोहितः ) रत्नगुणविशिष्टस्याग्नेवेंगादिगुणसमूहः रोहितोऽग्नेरित्यादिष्टोपयोजननामसुपठितम् (निध. १.३) = The attributes of red fire.
भावार्थभाषाः - If men properly use water, fire and air in the vehicles and thereby travel from one place to another, they can easily go and come everywhere.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे यानात जल, अग्नी व वायूला युक्त करून त्यातून गमनागमन करतात तेव्हा ती सहजगत्या सर्वत्र जाण्या-येण्यास समर्थ होतात. ॥ ६ ॥