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न॒हि वः॒ शत्रु॑र्विवि॒दे अधि॒ द्यवि॒ न भूम्यां॑ रिशादसः । यु॒ष्माक॑मस्तु॒ तवि॑षी॒ तना॑ यु॒जा रुद्रा॑सो॒ नू चि॑दा॒धृषे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nahi vaḥ śatrur vivide adhi dyavi na bhūmyāṁ riśādasaḥ | yuṣmākam astu taviṣī tanā yujā rudrāso nū cid ādhṛṣe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

न॒हि । वः॒ । शत्रुः॑ । वि॒वि॒दे । अधि॑ । द्यवि॑ । न । भूम्या॑म् । रि॒शा॒द॒सः॒ । यु॒ष्माक॑म् । अ॒स्तु॒ । तवि॑षी । तना॑ । यु॒जा । रुद्रा॑सः । नु । चि॒त् । आ॒धृषे॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:39» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:18» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे विद्वान् किस प्रकार के हों, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (रिशादसः) शत्रुओं के नाश कारक (रुद्रासः) अन्यायकारी मनुष्यों को रुलानेवाले वीर पुरुष ! (चित्) जो (युष्माकम्) तुम्हारे (आधृषे) प्रगल्भ होनेवाले व्यवहार के लिये (तना) विस्तृत (युजा) बलादि सामग्री युक्त (तविषी) सेना (अस्तु) हो तो (अधिद्यवि) न्याय प्रकाश करने में (वः) तुम लोगों को (शत्रुः) विरोधी शत्रु (नु) शीघ्र (नहि) नहीं (विविदे) प्राप्त हो और (भूम्याम्) भूमि के राज्य में भी तुम्हारा कोई मनुष्य विरोधी उत्पन्न न हो ॥४॥
भावार्थभाषाः - जैसे पवन आकाश में शत्रु रहित विचरते हैं वैसे मनुष्य विद्या, धर्म, बल, पराक्रमवाले न्यायाधीश हो सबको शिक्षा दे और दुष्ट शत्रुओं को दण्ड देके शत्रुओं से रहित होकर धर्म में वर्त्ते ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सैनिकों में ऐकमत्य

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (रिशादसः) - हिंसक शत्रुओं को खा जानेवाले सैनिको ! (वः) - तुम्हारा (शत्रुः) - शातन व विनाश करनेवाला (नहि अधि द्यवि) - न तो द्युलोक में और (न भूम्याम्) - न ही इस पृथिवी पर (विविदे) - विद्यमान है, अर्थात् तुम्हारा मुकाबला न देव कर सकते हैं, न मनुष्य । आँधी, बाढ़ व आग आदि के रूप में ये वायु, जल व अग्नि आदि देव तुम्हें आगे बढ़ने से रोक नहीं सकते, मनुष्य की तो शक्ति ही क्या है कि वे तुम्हे रोक पाएँ व तुम्हारा विनाश कर पाएँ ।  २. हे (रुद्रासः) - [रोरूयमाणो द्रवति] प्रभु - नाम - स्मरण करते हुए व गर्जना करते हुए शत्रुओं पर आक्रमण करनेवाले सैनिको ! (युष्माकम्) - तुम्हारे (युजा) - [योगेन, परस्परैकभावेन] मेल व परस्पर अविरोध के कारण (तविषी) - यह सेना (नु चित्) - [क्षिप्रमेव] शीघ्र ही (आधृषे) - शत्रओं के धर्षण के लिए (तना) - विस्तृत शक्तिवाली (अस्तु) - हो, अर्थात् सैनिकों के परस्पर ऐकमत्य व एक विचार के कारण सेना की शक्ति इतनी प्रबल हो कि वह शत्रुओं का पूर्ण धर्षण करने में समर्थ हो ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - सैनिकों का ऐकमत्य होना सेना को प्रबल बनाता है और वह सेना सदा शत्रुओं का धर्षण करनेवाली होती है ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(नहि) निषेधार्थे (वः) युष्मान् (शत्रुः) विरोधी (विविदे) विंदेत् अत्र लिङर्थे लिट्। (अधि) उपरिभावे (द्यवि) प्रकाशे (न) निषेधार्थे (भूम्याम्) पृथिव्याम् (रिशादसः) रिशान् शत्रून् रोगान् वा समन्ताद्दस्यन्त्युपक्षयन्ति ये तत्सम्बुद्धौ (युष्माकम्) मनुष्याणाम् (अस्तु) भवतु (तविषी) प्रशस्तबलयुक्ता सेना (तना) विस्तृता (युजा) युनक्ति यया तया। अत्र कृतो बहुलम् इति करणे क्विप्। (रुद्रासः) ये रोदयन्त्यन्यायकारिणोजनांस्तत्सम्बुद्धौ (नु) क्षिप्रम् (चित्) यदि (आधृषे) समन्ताद् धृष्णुवन्ति यस्मिन् व्यवहारे तस्मै। अत्र पूर्ववत् क्विप् ॥४॥

अन्वय:

पुनस्ते कीदृशा भवेयुरित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे रिशादसो रुद्रासो वीरा चित् यदि युष्माकमाधृषे तना युजा तविष्यस्तु स्यात्तर्ह्यधि द्यवि न्यायप्रकाशे वो युष्मान् शत्रुर्नुनहि विविदे कदाचिन्न प्राप्नुयान्न भूम्यां भूमिराज्ये कश्चिच्छत्रूरुत्पद्येत ॥४॥
भावार्थभाषाः - यथा पवना अजातशत्रवः सन्ति तथा मनुष्या विद्याधर्मबलपराक्रमवन्तो न्यायाधीशा भूत्वा सर्वान्प्रशास्य दुष्टाञ्च्छत्रून् निवार्याऽदृष्टशत्रवः स्युः ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Scourge of wrong and enemies of injustice, no enemy will stand against you on earth or on high in the light of your justice and rectitude. May your forces be blazing brilliant, wide and expansive, expert and well- provided with weapons and equipment for your struggle and battles for life and humanity.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How should they (learned men) be, is taught further in the fourth Mantra.

अन्वय:

O brave destroyers of your foes and diseases, if you have a powerful army, no adversary of yours will there be in the light of justice nor any upon the earth, may your collected strength of army be quickly exerted O heroes who make your opponents weep, to humble or overcome your enemies.

पदार्थान्वयभाषाः - ( रिशादसः ) रिशान् शत्रून् रोगान् वा समन्तात् दस्यन्ति उपक्षयन्ति ये तत्सम्बुद्धौ = Destroyers of the foes and diseases. (द्यवि) न्यायप्रकाशे = In the light of justice. (तविषी) प्रशस्तबलयुक्ता सेना = Powerful army.
भावार्थभाषाः - As the airs have no enemies and are liked by all, in the same way, people should be endowed with knowledge, righteousness, strength and force and justice, so that they may rule over all with justice, may destroy their opponents and should become so popular as to have no enemy at all.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जसा वायू आकाशात निर्बंधपणे वाहतो तसे माणसाने विद्या, धर्म, बल, पराक्रमयुक्त न्यायाधीश बनून सर्वांना शिक्षित करावे व दुष्ट शत्रूंना दंड देऊन, शत्रूरहित बनून धर्माचे वर्तन करावे. ॥ ४ ॥