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स्थि॒रा वः॑ स॒न्त्वायु॑धा परा॒णुदे॑ वी॒ळू उ॒त प्र॑ति॒ष्कभे॑ । यु॒ष्माक॑मस्तु॒ तवि॑षी॒ पनी॑यसी॒ मा मर्त्य॑स्य मा॒यिनः॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sthirā vaḥ santv āyudhā parāṇude vīḻū uta pratiṣkabhe | yuṣmākam astu taviṣī panīyasī mā martyasya māyinaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स्थि॒रा । वः॒ । स॒न्तु॒ । आयु॑धा । प॒रा॒नुदे॑ । वी॒ळु । उ॒त । प्र॒ति॒स्कभे॑ । यु॒ष्माक॑म् । अ॒स्तु॒ । तवि॑षी । पनी॑यसी । मा । मर्त्य॑स्य । मा॒यिनः॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:39» मन्त्र:2 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:18» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब ईश्वर इनको उपदेश और आशीर्वाद देकर सबसे कहता है, कि तुमको क्या-२ सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे धार्मिक मनुष्यो ! (वः) तुम्हारे (आयुधा) आग्नेय आदि अस्त्र और तलवार, धनुष् बाण, भुसुंडी (बन्दूक) शतघ्नी (तोप) आदि शस्त्र अस्त्र (पराणुदे) शत्रुओं को व्यथा करनेवाले युद्ध (उत) और (प्रतिष्कमे) रोकने बांधने और मारने रूप कर्मों के लिये (स्थिरा) स्थिर दृढ़ चिरस्थायी (वीळू) दृढ़ बड़े-२ उत्तम युक्त (तविषी) प्रशस्त सेना (पनीयसी) अतिशय करके स्तुति करने योग्य व व्यवहार को सिद्ध करनेवाली (अस्तु) हो और पूर्वोक्त पदार्थ (मायिनः) कपट आदि अधर्माचरण युक्त (मर्त्यस्य) दुष्ट मनुष्यों के (मा) कभी मत हों ॥२॥
भावार्थभाषाः - धार्मिक मनुष्य ही परमात्मा के कृपा पात्र होकर सदा विजय को प्राप्त होते हैं दुष्ट नहीं। परमात्मा भी धार्मिक मनुष्यों ही को आशीर्वाद देता है पापियों को नहीं। पुण्यात्मा मनुष्यों को उचित है कि उत्तम-२ शस्त्र-अस्त्र रचकर उनके फेंकने का अभ्यास करके सेना को उत्तम शिक्षा देकर शत्रुओं का निरोध वा पराजय करके न्याय से मनुष्यों की निरन्तर रक्षा करनी चाहिये ॥२॥ सं० भा० के अनुसार इसके आगे इन शस्त्रादि पदार्थों को छली मनुष्य नहीं प्राप्त कर सक्ता इतना वाक्य और होना चाहिये। सं०
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पराणुदे - प्रतिष्कभे [धकेलना - रोकना]

पदार्थान्वयभाषाः - १. प्रस्तुत सूक्त भी मरुतों का है । इस सूक्त में मुख्यरूप से देश की शत्रुओं के आक्रमण से रक्षा करनेवाले उन मरुतों का उल्लेख है जोकि रणाङ्गण में ही 'म्रियन्ते' मर जाएँ, परन्तु कायरता से भाग नहीं खड़े हों । इनको कहते हैं - हे (मरुतः) - सैनिको ! (यत्) - जब (इत्था) - सचमुच (परावतः) - दूर देश से (शोचिः न) - सूर्यकिरणों की भाँति (मानम्) - मननीय, विचारपूर्वक बनाये गये शस्त्रास्त्रसमूह को (प्र+अस्यथ) - प्रकर्षेण शत्रु - सैन्य पर फेंकते हो तो वस्तुतः (कस्य क्रत्वा) - उस आनन्दमय प्रभु के संकल्प कर्म व प्रज्ञान के साथ (कस्य वर्पसा) - उस आनन्दमय प्रभु के बल के साथ ही तुम ऐसा कर पाते हो, अर्थात् प्रभु का स्मरण होने पर तथा प्रभु की शक्ति से शक्ति - सम्पन्न होने पर ही निर्भीकता से ये वीर देशरक्षा के लिए संग्राम कर पाते हैं ।  २. यहाँ युद्ध में प्रभुस्मरण का यह भी महान् लाभ है कि हम अन्याय्य युद्धों में प्रवृत्त न होंगे । यहाँ 'शोचिः न' सूर्य की किरणों के समान, यह उपमा भी ध्यान देने योग्य है । सूर्यकिरणें बुराई व दुर्गन्ध को समाप्त करती हैं, इसी प्रकार इन मरुतों ने भी अवाञ्छनीय तत्त्वों को ही समाप्त करना है । शस्त्रों को यहाँ 'मानम्' - 'मननीय - विचारपूर्वक बनाये गये' - ऐसा कहा है । वस्तुतः जब अस्त्रों का निर्माण अन्धाधुन्ध होने लगता है तब वे भय की - शान्ति के स्थान में भय की वृद्धि का कारण बन जाते हैं ।  ३. ये विचारपूर्वक बनाये गये अस्त्रों को फेंकनेवाले सैनिक युद्ध में मृत्यु होने पर (कम्) - उस आनन्दमय प्रभु को (याथ) - प्राप्त होते हैं और (ह) - निश्चय से (कम्) - उस प्रभु को ही प्राप्त होते हैं, क्योंकि (धूतयः) - ये शत्रुओं को कम्पित करनेवाले हैं और अपने मलों को भी कम्पित कर दूर करनेवाले हैं । ये वीर अवश्य उस प्रभु को पाते हैं ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - देश की रक्षा के लिए वीर सैनिक विचारपूर्वक अस्त्रों का प्रयोग करते हैं । प्रभु की भावना को हृदय में लेकर प्रभु की शक्ति से शक्ति - सम्पन्न होकर ये शत्रुओं को कम्पित करते हैं और प्रभु को पाते हैं ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(स्थिरा) स्थिराणि चिरं स्थातुमर्हाणि। अत्र सर्वत्र शेश्छन्दसि इति लोपः। (वः) युष्माकम् (सन्तु) भवन्तु (आयुधा) आयुधान्याग्नेयानि धनुर्वाणभुसुंडीशतघ्न्यादीन्यस्त्रशस्त्राणि (पराणुदे) परान्नुदन्ति शत्रून्यस्मिन्युद्धे तस्मै। अत्र कृतो बहुलम् इत्यधिकरणे क्विप्। (वीळू) वीडूनि दृढानि बलकारीणि। अत्र ईषाअक्षादित्वात्प्रकृतिभावः। (उत) अप्येव (प्रतिष्कमे) प्रतिष्कंभते प्रतिबध्नाति शत्रून्येन कर्मणा तस्मै। अत्र सौत्रात् स्कम्भुधातोः पूर्ववत् क्विप्। (युष्माकम्) धार्मिकाणां वीराणाम् (अस्तु) भवतु (तविषी) प्रशस्तबलविद्यायुक्ता सेना। तवेर्णिद्वा। उ० १।४९। अनेन टिषच् प्रत्ययो णिद्वा। तविषीति बलनामसु पठितम्। निघं० २।९। (पनीयसी) अतिशयेन स्तोतुमर्हा व्यवहारसाधिका (मा) निषेधार्थे (मर्त्यस्य) मनुष्यस्य (मायिनः) कपटधर्माचरणयुक्तस्य। माया कुत्सिता प्रज्ञा विद्यते यस्य तस्य। अत्र निंदार्थ इनिः। मायेति प्रज्ञानामसु पठितम् निघं० ३।९। ॥२॥

अन्वय:

अथैतेभ्य उपदिश्याऽशीर्दत्वा युष्माभिः किं किं साधनीय मित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे धार्मिकमनुष्या व आयुधा शत्रूणां पराणुद उत प्रतिष्कभे स्थिरावीळू सन्तु। युष्माकं तविषी सेना पनीयस्यन्तु मायिनो मर्त्यस्य मा सन्तु ॥२॥
भावार्थभाषाः - धार्मिका मनुष्या एवेश्वरानुग्रहविजयौ प्राप्नुवन्ति ईश्वरोपि धर्मात्मभ्य एवाशीर्ददाति नेतरेभ्यः एतैः प्रशस्तानि शस्त्रास्त्राणि रचयित्वा तत्प्रक्षेपाभ्यासं कृत्वा प्रशस्तां सेना शिक्षित्वा दुष्टानां शत्रूणां बधनिरोधपराजयान्कृत्वा न्यायेन नित्यं प्रजारक्ष्या नेदं मायावी प्राप्तुं कर्त्तुं शक्नोति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May your weapons be strong and steady to drive off the enemy, and strong and firm to stem the onslaught. May your forces be admirably intelligent and resourceful. Let the cunning and wicked people have nothing such.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What all should you accomplish with the help of the Maruts is taught in the 2nd Mantra.

अन्वय:

Strong be your weapons for driving away your foes, firm in resisting them, Yours be the army that men praise, not that (army or strength) of an unrighteous deceitful mortal.

पदार्थान्वयभाषाः - ( आयुधा ) आयुधानि आग्नेयानि धनुर्बाणभुशुण्डीशतघ्न्यादीनि अस्त्रशस्त्राणि । = Arms of various kinds like cannons, rifles, bows, arrows, swords, spears and all other war weapons. (वीळू) वीळूनि दृढानि बलकारीणि । = Firm and strong, powerful. (तविषी) प्रशस्तबलयुक्ता सेना । तविषीति बलनामसु पठितम् ( निघ० २.९) = Powerful army. ( मायिनः ) कपटाद्यधर्माचरणयुक्तस्य माया कुत्सिता प्रज्ञा विद्यते यस्य तस्य अत्र निन्दार्थ इनिः । मायेति प्रज्ञानामसु पठितम् ॥ ( निघ० ३.९ ) । = Of an un-righteous deceitful persons.
भावार्थभाषाः - Righteous persons receive the Grace of God and victory. God also blesses only righteous persons and not others. These righteous persons should manufacture powerful arms, should practice their use well, train their army, defeat, capture or kill (as the case and necessity may be) their unrighteous wicked foes and protect their subjects justly. Unrighteous, treacherous and fraudulent person can not do all this.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - धार्मिक माणसेच परमेश्वराचे कृपापात्र बनून सदैव विजय प्राप्त करतात, दुष्ट नाही. परमात्माच धार्मिक माणसांना आशीर्वाद देतो. पापी लोकांना नाही. पुण्यात्मा माणसांनी उत्तम शस्त्र अस्त्र निर्माण करून त्यांना फेकण्याचा अभ्यास करून सेनेला उत्तम शिक्षण देऊन शत्रूंचे निवारण करून पराजय करून न्यायाने माणसांचे निरंतर रक्षण केले पाहिजे. ॥ २ ॥