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देवता: मरूतः ऋषि: कण्वो घौरः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

मरु॑तो वीळुपा॒णिभि॑श्चि॒त्रा रोध॑स्वती॒रनु॑ । या॒तेमखि॑द्रयामभिः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

maruto vīḻupāṇibhiś citrā rodhasvatīr anu | yātem akhidrayāmabhiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मरु॑तः । वी॒ळु॒पा॒णिभिः॑ । चि॒त्राः । रोध॑स्वतीः । अनु॑ । या॒त । ई॒म् । अखि॑द्रयामभिः॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:38» मन्त्र:11 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:17» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:11


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे मनुष्य पवनों से क्या करते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (मरुतः) योगाभ्यासी योग व्यवहार सिद्धि चाहनेवाले पुरुषो ! तुम लोग (अखिद्रयामभिः) निरन्तर गमनशील (वीळुपाणिभिः) दृढ़ बलरूप ग्रहण के साधक व्यवहारवाले पवनों के साथ (रोधस्वतीः) बहुत प्रकार के बांध वा आवरण और (चित्राः) आश्चर्य्य गुणवाली नदी वा नाडियों के (ईम्) (अनु) अनुकूल (यात्) प्राप्त हों ॥११॥
भावार्थभाषाः - पवनों में गमन बल और व्यवहार होने के हेतु स्वाभाविक धर्म हैं और ये निश्चय करके नदियों को चलानेवाले नाड़ियों के मध्य में गमन करते हुए रुधिर रसादि को शरीर के अवयवों में प्राप्त करते हैं इस कारण योगी लोग योगाभ्यास और अन्य मनुष्य बल आदि के साधनरूप वायुओं से बड़े-२ उपकार ग्रहण करें ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अद्भुत नदियों में प्राणप्रवाह

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (मरुतः) - प्राणो ! (वीळुपाणिभिः) - दृढ़ हाथों से अथवा दृढ रक्षणों से युक्त हुए - हुए आप (अखिद्रयामभिः) - अदीन गतियों से, अर्थात् न क्षीण हुई - हुई गतियों से (चित्राः) - अद्भुत अथवा ज्ञान का प्रकाश करनेवाली (रोधस्वतीः अनु) - नदियों व नाड़ियों का लक्ष्य करके (यात् ईम्) - गतिवाले होओ ही ।  २. प्राणसाधना में जब इन प्राणों की गति 'इडा, पिंगला व सुषुम्णा' नामक नाड़ियों में ठीक से होने लगती है तब जहाँ शरीर के अङ्ग - प्रत्यङ्ग सुदृढ़ होते हैं, वहाँ कुण्डलिनी शक्ति का प्रबोधन होकर ज्ञान का प्रकाश प्राप्त होता है । प्राणसाधना से प्राणों की गति में क्षीणता नहीं आती और शरीर की शक्ति सुस्थिर रहती है ।  ३. शरीर में ये नाडियाँ ही नदियाँ हैं । 'इडा, पिंगला व सुषुम्णा' ही गङ्गा, यमुना व सरस्वती हैं । इनमें प्राणों की गति होने पर क्रियाशीलता, संयम व ज्ञान प्राप्त होता है । 'गङ्गा' क्रियाशीलता की प्रतीक है, 'यमुना' आत्म - संयम की तथा 'सरस्वती' ज्ञान की ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से शरीर सुदृढ़ होता है और हृदय प्रभु की ज्योति से दीप्त ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(मरुतः) योगाभ्यासिनो व्यवहारसाधका वा जनाः (वीळुपाणिभिः) वीळूनि दृढानि बलानि पाणयोर्ग्रहणसाधनव्यवहारयोर्थेषां तैः। वीड्विति बलनामसु पठितम्। निघं० २।९। (चित्राः) अद्भुतगुणाः (रोधस्वतीः) रोधो बहुविधमावर्णं विद्यते यासां नदीनां नाडीनां वा ताः रोधस्वत्य इति नदीनामसु पठितम्। निघं० १।१३। (अनु) अनुकूले (यात) प्राप्नुत (ईम्) एव (अखिद्रयामभिः) +अच्छिन्नानि निरन्तराणि निगमनानि येषां तैः। स्फायितञ्चि० उ० २।१४। इति रक्। सर्वधातुभ्यो मनिन् इति करणे मनिंश्च ॥११॥ +[अखिन्नानि]

अन्वय:

पुनस्ते मानवः वायुभिः किं कुर्वन्तीत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मरुतो यूयमखिद्रयामभिर्वीळुपाणिभिः पवनैः सह रोधस्वतीश्चित्रा ईमनुयात ॥११॥
भावार्थभाषाः - वायुषु गमनबलव्यवहारहेतूनि कर्माणि स्वाभाविकानि सन्ति। एते खलु नदीनां गमयितारो नाडींनां मध्ये गच्छन्तो रुधिररसादिकं शरीराऽवयवेषु प्रापयन्ति तस्माद्योगिभिर्योगाभ्यासेनेतरैर्जनैश्च बलादिसाधनाय वायुभ्यो महोपकारा ग्राह्याः ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Maruts, lightning powers of the winds, wondrous forces of the nation, resistant and inviolable, march on with invincible arms by the irresistible paths (to your goal in sight).
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What do men do with the winds is taught further in the 11th Mantra.

अन्वय:

O practisers of yoga or other worldly men, you should come (for a walk and meditation) to the beautifully embanked rivers with unobstructed progress along with ever-moving and strong winds.

भावार्थभाषाः - The winds have the power of going about and strength natural in them. It is they that cause the movement of the rivers and when entering the nerves, they cause the circulation of blood and sap in the organs of the body. Therefore the Yogis should make proper use of them for gaining strength through the practice of Yoga- Pranayama etc. and other persons engaged in worldly occupations should also utilize them properly. ( मरुतः ) योगाभ्यासिनो व्यवहारसाधका वा जनाः = The practisers of Yoga or other worldly men. ( वीडु पाणिभिः) वीडूनि दृढानि बलानि पाण्योर्ग्रहण साधनव्यवहारा येषां ते । वीलु इति बलनामसु पठितम् । ( निघ० २.९) = With powerful hands. ( रोधस्वती: ) रोधो बहुविधमावरणं विद्यते यासां नदीनां नाडीनां वा ताः, रोधस्वत्यः इति नदीनामसु पठितम् ( निघ० १.१३) = Rivers and nerves. (अखिद्रयामभिः) अच्छिन्नानि निरन्तराणि गमनानि येषां ते । स्फायितंचिवंचि शकि क्षिपि क्षुदि सृप्रि तृपि वन्द्युन्दिश्विती वृत्यजनी पदि मदि मुदि खिदि छिदि शुमिभ्यो रक् ( उणादि० २.१४) इति रक् = Unobstructed or ever going.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - वायूमध्ये गमन बल व व्यवहाराचे स्वाभाविक धर्म आहेत व ते निश्चयपूर्वक नद्या चालविण्यात, नाड्यांमध्ये गमन करण्यात रस रक्त इत्यादी शरीराच्या अवयवात असतात, यामुळे योग्यांनी योगाभ्यास व इतर माणसांनी बल इत्यादी साधनरूपी वायूकडून महाउपकार घ्यावेत. ॥ ११ ॥