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देवता: मरूतः ऋषि: कण्वो घौरः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
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कद्ध॑ नू॒नं क॑धप्रियः पि॒ता पु॒त्रं न हस्त॑योः । द॒धि॒ध्वे वृ॑क्तबर्हिषः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kad dha nūnaṁ kadhapriyaḥ pitā putraṁ na hastayoḥ | dadhidhve vṛktabarhiṣaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कत् । ह॒ । नू॒नम् । क॒ध॒प्रि॒यः॒ । पि॒ता । पु॒त्रम् । न । हस्त॑योः । द॒धि॒ध्वे । वृ॒क्त॒ब॒र्हि॒षः॒॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:38» मन्त्र:1 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:15» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:1


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब अड़तीसवें सूक्त का आरम्भ है। उसके पहिले मंत्र में वायु के समान मनुष्यों को होना चाहिये, इस विषय का वर्णन अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (कधप्रियाः) सत्य कथाओं से प्रीति करानेवाले (वृक्तबर्हिषः) ऋत्विज् विद्वान् लोगो ! (न) जैसे (पिता) उत्पन्न करनेवाला जनक (पुत्रम्) पुत्र को (हस्तयोः) हाथों से धारण करता है, और जैसे पवन लोकों को धारण कर रहे हैं वैसे (कद्ध) कब प्रसिद्ध से (नूनम्) निश्चय करके यज्ञ कर्म को (दधिध्वे) धारण करोगे ॥१॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में उपमा और वाचक लुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे पिता हाथों से अपने पुत्र को ग्रहण कर शिक्षापूर्वक पालना तथा अच्छे कार्यों में नियुक्त करके सुखी होता और जैसे पवन सब लोकों को धारण करते हैं वैसे* विद्या से यज्ञ का ग्रहण कर युक्ति से अच्छे प्रकार सेवन करते हैं वे ही सुखी होते हैं ॥१॥ *सं० भा० के अनुसार यहाँ- जो मनुष्य इतना और होना चाहिये। सं०

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पिता के समान

पदार्थान्वयभाषाः - १. प्राणसाधना में लगा हुआ पुरुष प्राणों की ही पुरुषविधता [Personification] करके प्राणों से पूछता है कि हे प्राणो! (कत् ह नूनम्) - कब ही निश्चय से आप मुझे उसी प्रकार (दधिष्वे) - धारण करोगे (न) - जैसेकि (पिता) - पिता (पुत्रम्) - पुत्र को (हस्तयोः) - हाथों में धारण करता है । वस्तुतः प्राण हमारे लिए पिता के समान हैं । जैसे पिता पुत्र की रक्षा करता है वैसे ही प्राण हमारा रक्षण करते हैं ।  २. ये प्राण कैसे हैं ? [क] (कधप्रियः) - [कथाप्रियः] स्तुतियों से प्रभु को प्रीणित करनेवाले हैं, अर्थात् इन प्राणों से प्रभुस्तवन चलता है । प्रभुस्तवन करनेवाली इन्द्रियाँ तो असुरों से पराजित हो गई थीं, परन्तु प्रभुपूजन करनेवाले प्राणों से टकराकर असुर चकनाचूर हो गये थे । यह प्राणों द्वारा होनेवाला प्रभुपूजन ही "हंसः व सोऽहम्" का जप कहलाता है ।  ३. (वृक्तबर्हिषः) - इन प्राणों ने हृदयान्तरिक्ष को वासनाओं से वर्जित कर दिया है । प्राणसाधना से वासनाओं का विनाश हो जाता है और हृदय निर्मल हो जाता है, इसलिए हृदय में ही प्रभु - दर्शन सम्भव होता है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना होने पर प्रभुस्तवन चलता है और हृदय पवित्र हो जाता है । इस प्रकार ये प्राण हमारा उसी प्रकार धारण करते हैं जैसेकि पिता पुत्र का ।   

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(कत्) कदा। अत्र छान्दसो वर्णलोपो वा इत्याकारलोपः। (ह) प्रसिद्धम् (नूनम्) निश्चयार्थे (कधप्रियः) ये कधाभिः कथाभिः प्रीणयन्ति ते। अत्र वर्णव्यत्ययेन थकारस्य धकारः। ङ्यापोः संज्ञाछन्दसोर्बहुलम्। अ० ६।३।६३। अनेन ह्रस्वः। (पिता) जनकः (पुत्रम्) औरसम् (न) इव (हस्तयोः) बाह्वोः (दधिध्वे) धरिष्यथ। अत्र# लोडर्थे लिट्। (वृक्तबर्हिषः) ऋत्विजो विद्वांसः ॥१॥ #[लृडर्थे। सं०]

अन्वय:

तत्रादिमे मंत्रे वायुरिव मनुष्यैर्भवितव्यमित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे कधप्रिया वृक्तबर्हिषो विद्वांसः पिता हस्तयोः पुत्रं न मरुतो लोकानिव कद्ध नूनं यज्ञकर्म दधिध्वे ॥१॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। यथा पिता हस्ताभ्यां स्वपुत्रं गृहीत्वा शिक्षित्वा पालयित्वा सत्कार्येषु नियोज्य सुखी भवति तथैव ये मनुष्या मरुतो लोकानिव विद्यया यज्ञं गृहीत्वा युक्त्या संसेवन्ते त एव सुखिनो भवन्तीति ॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Heroes of yajna, lovers of the stories of life and nature, you have collected the sacred grass for the yajna vedi. When for sure are you going to take the work of the nation in hand like a father taking up the child in arms for its nurture and nourishment?

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

In the first Mantra, it is taught that men should be like the air.

अन्वय:

O learned priests who please and benefit. others by telling good stories when will you uphold or maintain the Yajnas (unselfish philanthropic deeds) as a father holds by both his hands a son or as gases uphold the worlds ?

पदार्थान्वयभाषाः - ( कधप्रियः) ये कधाभिः कथाभिः प्रीणयन्ति ते । अत्र अत्र वर्णव्यत्ययेन थकारस्य धकारः । ड्ययोः संज्ञाछन्दसोर्बहुलम् (अष्टा० ६.३.६३ ) अनेन हस्वः ॥ = Those who please and benefit others by telling good stories. (वृक्तबहिष:) ऋत्विजो विद्वांसः = Learned priests.
भावार्थभाषाः - There is Upmalankara and Luptopamalankara-Simile and implied simile in this Mantra. As a father holds his son by both his hands, gives him proper education, brings him up suitably, urges upon him to do noble deeds, and enjoys happiness, in the same manner, those persons who like the air that upholds the worlds, take up Yainas with knowledge and perform them properly become happy.
टिप्पणी: Rishi Dayananda has interpreted वृक्तबर्हिषः as ऋत्विजो विद्वांसः or learned priests without quoting an authority. But it is clearly available in the 'Vedic Lexicon-Nightantu 3.18 which says... वृक्तवहिष इति ऋत्विनाम ( निघ० ३.१८ )

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात वायूच्या दृष्टांताने विद्वानांचे गुणवर्णन करण्याने पूर्वीच्या सूक्ताबरोबर या सूक्ताची संगती जाणली पाहिजे. ॥

भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमा व वाचकलुप्तोपमालंकार आहेत. जसे पिता स्वतः पुत्राला शिक्षण देऊन पालन करतो व चांगल्या कार्यात नियुक्त करतो व सुखी होतो. जसे पवन सर्व गोलांना धारण करतात तसा विद्येने यज्ञाचे ग्रहण करून युक्तीने जे चांगल्या प्रकारे स्वीकार करतात तेच सुखी होतात. ॥ १ ॥