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जना॑सो अ॒ग्निं द॑धिरे सहो॒वृधं॑ ह॒विष्म॑न्तो विधेम ते । स त्वं नो॑ अ॒द्य सु॒मना॑ इ॒हावि॒ता भवा॒ वाजे॑षु सन्त्य ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

janāso agniṁ dadhire sahovṛdhaṁ haviṣmanto vidhema te | sa tvaṁ no adya sumanā ihāvitā bhavā vājeṣu santya ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

जना॑सः । अ॒ग्निम् । द॒धि॒रे॒ । स॒हः॒वृध॑म् । ह॒विष्म॑न्तः । वि॒धे॒म॒ । ते॒ । सः । त्वम् । नः॒ । अ॒द्य । सु॒मनाः॑ । इ॒ह । अ॒वि॒ता । भव॑ । वाजे॑षु । स॒न्त्य॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:36» मन्त्र:2 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:8» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी अगले मन्त्र में उक्त विषय का उपदेश किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सन्त्य) सब वस्तु देनेहारे ईश्वर ! जैसे (हविष्मन्तः) उत्तम देने लेने योग्य वस्तुवाले (जनासः) विद्या में प्रसिद्ध हुए विद्वान् लोग जिस (ते) आपके आश्रय का (दधिरे) धारण करते हैं वैसे उन (सहोवृधम्) बल को बढ़ानेवाले (अग्निम्) सबके रक्षक आपको हम लोग (विधेम) सेवन करें (सः) सो (सुमनाः) उत्तम ज्ञानवाले (त्वम्) आप (अद्य) आज (नः) हम लोगों के (इह) इस संसार और (वाजेषु) युद्धो में (अविता) रक्षक और सब विद्याओं में प्रवेश करानेवाले (भव) हूजिये ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को एक अद्वितीय परमेश्वर की उपासना ही से संतुष्ट रहना चाहिये क्योंकि विद्वान् लोग परमेश्वर के स्थान में अन्य वस्तु को उपासना भाव से स्वीकार कभी नहीं करते इसी कारण उनका युद्ध वा इस संसार में कभी पराजय दीख नहीं पड़ता क्योंकि वे धार्मिक ही होते हैं और इसीसे ईश्वर की उपासना नहीं करनेवाले उनके जीतने को समर्थ नहीं होते, क्योंकि ईश्वर जिनकी रक्षा करनेवाला है उनका कैसे पराजय हो सकता है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुमनाः - अविता

पदार्थान्वयभाषाः - १. (अग्निम्) - उस उन्नति के साधक प्रभु को (सहोवृधम्) - जो कि हमारे "सहस् - बल" को बढ़ानेवाले हैं, (जनासः) - अपनी शक्तियों का विस्तार करनेवाले लोग (दधिरे) - धारण करते हैं । वस्तुतः प्रभु को प्राप्त करने के अधिकारी वे ही होते हैं जो कि अपनी शक्तियों को बढ़ाने का प्रयत्न करते हैं । आलसी व निर्बल मनुष्यों को प्रभु की प्राप्ति नहीं होती ।  २. शक्तियों का विस्तार करनेवाले हम (हविष्मन्तः) - हविवाले होकर, अर्थात् त्यागपूर्वक उपभोग का व्रत लेकर (ते विधेम) - आपका पूजन करते हैं । प्रभु का आदेश है 'त्यक्तेन भुञ्जीथाः ' त्यागपूर्वक उपभोग करना । इस आदेश का पालन करने से प्रभु का सच्चा पूजन होता है ।  ३. हे प्रभो ! (सः त्वम्) - वे आप (अद्य) - आज (इह) - प्रलोभनों से परिपूर्ण इस जगत् में (नः) - हमारे (समनाः) - [शोभनं मनो यस्मात्] मनों को उत्तम बनानेवाले तथा (अविता) - सब बुराइयों से रक्षण व बचाव करनेवाले (भव) - होओ । प्रभुकृपा से ही हम अपने मनों को अशुभ भावों से बचा सकेंगे । इन आसुर प्रवृत्तियों के आक्रमण को जीतना सुगम नहीं है ।  ४. हे प्रभो ! आप ही (वाजेषु) - युद्धों में आसुरभावों के साथ संग्राम में (सन्त्य) - [सन्तौ दाने साधुः] शक्तियों के देनेवालों में उत्तम हैं । प्रभु - स्मरण से ही वह शक्ति प्राप्त होती है जो हमें इन संग्रामों में विजयी बनाती है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - वे प्रभु हमारे सहस् - बल को बढ़ानेवाले हैं । संग्रामों में विजयी होने के लिए हमें उस प्रभु से शक्ति प्राप्त होती है ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(जनासः) विद्यासु प्रादुर्भूता मनुष्याः (अग्निम्) सर्वाभिरक्षकमीश्वरम् (दधिरे) धरन्ति। अत्र लडर्थे लिट्। (सहोवृधम्) सहोबलं वर्धयतीति सहोवृत्तम् (हविष्मन्तः) प्रशस्तानि हवींषि दातुमादातुमर्हाणि वस्तूनि विद्यन्ते येषां ते। अत्र प्रशंसार्थे मतुप्। (विधेम) सेवेमहि (ते) तव। अत्र सायणाचार्य्येण ते त्वामित्युक्तं तन्न संभवति द्वितीयैकवचने त्वाऽऽदेशविधानात् (सः) ईश्वरः (त्वम्) सर्वदाप्रसन्नः (नः) अस्माकम् (अद्य) अस्मिन्नहनि (सुमनाः) शोभनं मनोज्ञानं यस्य सः (इह) अस्मिन् संसारे (अविता) रक्षको ज्ञापकः सर्वासु विद्यासु प्रवेशकः (भवा) अत्र द्वचोतस्तिङ् इति दीर्घः। (वाजेषु) युद्धेषु (संत्य) सन्तौ दाने साधुस्तत्संबुद्धौ। अत्र षणुदानइत्यस्माद्बाहुलकादौणादिकस्तिः प्रत्ययस्ततः साध्वर्थे यच्च ॥२॥

अन्वय:

पुनः स एवार्थ उपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सन्त्येश्वर यथा हविष्मन्तो जनासो यस्य ते तवाश्रयं दधिरे तथा तं सहोवृधमग्निं त्वां वयं विधेम स सुमनास्त्वमद्य नोस्माकमिह वाजेषु चाविता भव ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैरेकस्याद्वितीयपरमेश्वरस्योपासनेनैव संतोषितव्यं नहि विद्वांसः कदाचिद् ब्रह्मस्थानेऽन्यद्वस्तूपास्यत्वेन स्वीकुर्वन्ति। अत एव तेषां युद्धेष्विह कदाचित् पराजयो न दृश्यते। एवं नहि कदाचिदनीश्वरोपासकास्तान् विजेतुं शक्नुवन्ति येषामीश्वरो रक्षकोस्ति कुतस्तेषां पराभवः ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The ancient people of vision and wisdom hold on to Agni, Lord of light and knowledge. We have the will and devotion, and we have the offerings, with these we worship you, lord giver of strength and courage more and ever more. Lord of wealth and generosity, we pray, be good and kind to us here and now, be our saviour and protector in the battles of life.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is taught further.

अन्वय:

O God, the most Liberal Donor, as worshippers offering oblations and possessing and giving good articles, take recourse to Thee, so we also worship Thee who art the augmenter of vigor. So O Omniscient Lord, be our Gracious Helper in all deeds of might, be Thou, O Excellent, our Protector this day and for ever.

पदार्थान्वयभाषाः - ( अग्निम् ) सर्वाभिरक्षकमीश्वरम् = To God who is the Protector of all. ( हविष्मन्तः ) प्रशस्तानि हवींषि दातुम् आदातुम् अर्हाणि वस्तूनि विद्यन्ते येषां ते । अत्र प्रशंसार्थे मतुप् । = Those who have got admirable or good things to give 1 and to take. ( सुमना:) शोभनं मनो ज्ञानं यस्य सः = Whose knowledge is good and pure-Omniscient in the case of God. ( सन्त्य ) सन्ती दाने साधुस्तत् सम्बुद्धौ । अत्र षणु-दाने इत्यस्माद् बाहुलकात औणादिकः तिः प्रत्ययः ततः साध्वर्ये यच्च || = liberal Donor.
भावार्थभाषाः - Men should remain contented with the Communion with or contemplation upon One God only. Wise learned persons never accept anything else as Adorable in the place of God, therefore they can not be defeated. Thus those who are atheists can never overcome them. How can they be defeated who have God as their Protector ?
टिप्पणी: For the meaning of Agni as God, the passages like the following have already been quoted. एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः । क० १.१६४.६, ब्रह्म वा अग्निः ॥ कौषीतकी ब्रा० ९/१/५ ।। १२।८, शतपथ २.५.४.८ ।। ५.३.५.३२ तैत्तिरीय ३.९.१६.३ ब्रह्माग्निः (शतपथ १.३.३.१९ ) हु-दानादनयोः On this basis is Rishi Dayananda's interpretation of हवींषि as प्रशस्तानि दातुम् आदातुमर्हाणि वस्तूनि ।
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी एका अद्वितीय परमेश्वराच्या उपासनेनेच संतुष्ट राहिले पाहिजे. कारण विद्वान लोक परमेश्वराऐवजी दुसऱ्या वस्तूची उपासना करीत नाहीत. त्यामुळेच त्यांचा युद्धात व या संसारात कधी पराजय होत नाही. कारण ते धार्मिक असतात. म्हणून नास्तिक लोक त्यांना जिंकू शकत नाहीत. ईश्वर ज्यांचा रक्षक असतो त्यांचा पराजय कसा होऊ शकेल? ॥ २ ॥