वांछित मन्त्र चुनें

रा॒यस्पू॑र्धि स्वधा॒वोऽस्ति॒ हि तेऽग्ने॑ दे॒वेष्वाप्य॑म् । त्वं वाज॑स्य॒ श्रुत्य॑स्य राजसि॒ स नो॑ मृळ म॒हाँ अ॑सि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

rāyas pūrdhi svadhāvo sti hi te gne deveṣv āpyam | tvaṁ vājasya śrutyasya rājasi sa no mṛḻa mahām̐ asi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

रा॒यः । पू॒र्धि॒ । स्वध॒ा॒वः॒ । अ॒स्ति॒ । हि । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । दे॒वेषु॑ । आप्य॑म् । त्वम् । वाज॑स्य । श्रुत्य॑स्य । रा॒ज॒सि॒ । सः । नः॑ । मृ॒ळ्ह॒ । म॒हान् । अ॒सि॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:36» मन्त्र:12 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:10» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:12


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी अगले मंत्र में उन्हीं राजपुरुषों के गुणों का उपदेश किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (स्वधावः) भोगने योग्य अन्नादि पदार्थों से युक्त (अग्ने) अग्नि के समान तेजस्वी सभाध्यक्ष ! (हि) जिसकारण (ते) आपकी (देवेषु) विद्वानों के बीच में (आप्यम्) ग्रहण करने योग्य मित्रता (अस्ति) है इसलिये आप (रायः) विद्या, सुवर्ण और चक्रवर्त्ति राज्यादि धनों को (पूर्धि) पूर्ण कीजिये जो आप (महान्) बड़े-२ गुणों से युक्त (असि) हैं और (श्रुत्यस्य) सुनने के योग्य (वाजस्य) युद्ध के बीच में प्रकाशित होते हैं (सः) सो (त्वम्) पुत्र के तुल्य प्रजा की रक्षा करने हारे आप (नः) हम लोगों को (मृड) सुखयुक्त कीजिये ॥१२॥
भावार्थभाषाः - वेदों को जाननेवाले उत्तम विद्वानों में मित्रता रखते हुए सभाध्यक्षादि राजपुरुषों को उचित है कि अन्नधन आदि पदार्थों के कोशों की निरन्तर भर और प्रसिद्ध डाकुओं के साथ निरन्तर युद्ध करने को समर्थ होके प्रजा के लिये बड़े-२ सुख देनेवाले होवें ॥१२॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रशंसनीय धन व बल

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (स्व - धावः) - [धाव शुद्धौ] अपने मित्रभूत आत्मा का शोधन करनेवाले प्रभो ! (रायः पूर्धि) - धनों को हममें पूरित कीजिए, अर्थात् आवश्यक धनों की हमें कभी कमी न रहे ।  २. हे (अग्ने) - अग्रणी प्रभो ! (ते) - आपकी (देवेषु) - दिव्य गुणोंवाले पुरुषों में (हि) - निश्चय से (आप्यम्) - मित्रता (अस्ति) - है ।  ३. (त्वम्) - आप (श्रुत्यस्य) - प्रशंसनीय व महती वृद्धि के कारणभूत (वाजस्य) - धन व बल के (राजसि) - प्रभुत्व करनेवाले हैं । 'श्रुत्य वाज' के ईश आप ही है । आपकी कृपा से ही हमें यशस्वी बल व यशोवृद्धि का कारणभूत धन प्राप्त होता है ।  ४. (सः) - वे आप (नः मृळ) - हमें सुखी कीजिए । आप सचमुच (महान्) - पूजनीय (असि) - हैं । हम आपकी पूजा करते हैं और आपकी कृपा से हम प्रशंसनीय धन व बल का लाभ करते हैं ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमें धन प्राप्त कराते हैं । वे सब देवों के मित्र हैं, प्रशंसनीय बल के देनेवाले हैं । ये प्रभु महान् हैं और हमें सुखी करते हैं ।   
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(रायः) विद्यासुवर्णचक्रवर्त्तिराज्यादिधनानि (पूर्धि) पिपूर्धि। अत्र #बहुलंछन्दसि इति शपोलुक्। *श्रुशृणुपृ० इति हेर्धिः। (स्वधावः) स्वधा भोक्तव्या अन्नादिपदार्थाःसन्ति यस्य तत्संबुद्धौ (अस्ति) (हि) यतः (ते) तव (अग्ने) अग्निवत्तेजस्विन् (देवेषु) विद्वत्सु (आप्यम्) आप्तुं प्राप्तुं योग्यं सखित्वम्। अत्र आप्लृव्याप्तावित्यस्मादौणादिको यत्। अत्र सायणाचार्य्येण प्रमादाददुपधत्वाभावेऽपि पोरदुपधात् इतिकर्मणि यत्। ¤यतो नाव इत्याद्यु दात्तत्वम् यच्चछान्दसमाद्यु दात्तत्वमित्यशुद्धमुक्तम्। औणादिकस्य यत्प्रस्ययस्य विद्यमानत्वात् (त्वम्) पुत्रवत्प्रजापालकः (वाजस्य) युद्धस्य (श्रुत्यस्य) श्रोतुं योग्यस्य। श्रुश्रवण इत्यस्मादौणादिकः कर्मणि क्यप् प्रत्ययः। (राजसि) प्रकाशितो भवसि (सः) (नः) अस्मान् (मृड) सुखय (महान्) बृहद्गुणाढ्यः (असि) वर्त्तसे ॥१२॥ #[अ० २।४।७३।] *[अ० ६।४।१०२।] ¤[अ० ६।१।२१०।]

अन्वय:

पुनश्च तेषामेव राजपुरुषाणां गुणा उपदिश्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे स्वधावोऽग्नेहि यतस्ते देवेष्वाप्यमस्ति रायस्पूर्धिं। यस्त्वं महानसि श्रुत्यस्य वाजस्य च मध्ये राजसि स त्वं नोऽस्मान् मृड सुखयुक्तान् कुरु ॥१२॥
भावार्थभाषाः - वेदवित्सु विद्यावृद्धिषु मैत्रीं भावयद्भिः सभाध्यक्षादिराजपुरुषैरन्नधनादि पदार्थागारान् सततं प्रपूर्य प्रसिद्धैर्दस्युभिस्सह युद्धाय समर्था भूत्वा प्रजायै महान्ति सुखानि दातव्यानि ॥१२॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of power and wealth in your own right, fulfil our life with honour and prosperity, so friendly and accessible you are among the noble and the generous. You shine in battles and your fame resounds. Be good to us for our well-being. Great and glorious you are indeed.
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of those persons of the State are taught further.

अन्वय:

O President of the Assembly, full of splendor like the fire and the food materials, as you have friendship with enlightened truthful persons and are great, you shine in the famous battles whose account is worth-hearing, make us happy. Make our wealth consisting of knowledge and gold and vast Government etc. perfect.

पदार्थान्वयभाषाः - (राय:) विद्यासुवर्णचक्रवर्ति राज्यादिधनानि Wealth in the form of knowledge, gold and vast but good Government. ( स्वधावः ) स्वधा भोक्तव्या अन्नादिपदार्थाः सन्ति यस्य तत्सम्बुद्धौ ( स्वधा इति [अन्ननाम निघ० २.७ ) = Tr.
भावार्थभाषाः - The President of the Assembly and other persons of the State should have friendship with the scholars of the Vedas and other highly learned persons. They should fill up continuously the stores of food and wealth and should be able to wage war against thieves and robbers. Thus they should give much happiness to the people.
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - वेद जाणणाऱ्या उत्तम विद्वानांबरोबर मैत्री ठेवणाऱ्या सभाध्यक्ष इत्यादी राजपुरुषांनी अन्नधान्य इत्यादी पदार्थांचे कोश सदैव भरलेले ठेवावे व बलवान दस्यूबरोबर निरंतर युद्ध करण्यास समर्थ व्हावे व प्रजेला अत्यंत सुख द्यावे. ॥ १२ ॥