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यं त्वा॑ दे॒वासो॒ मन॑वे द॒धुरि॒ह यजि॑ष्ठं हव्यवाहन । यं कण्वो॒ मेध्या॑तिथिर्धन॒स्पृतं॒ यं वृषा॒ यमु॑पस्तु॒तः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yaṁ tvā devāso manave dadhur iha yajiṣṭhaṁ havyavāhana | yaṁ kaṇvo medhyātithir dhanaspṛtaṁ yaṁ vṛṣā yam upastutaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यम् । त्वा॒ । दे॒वासः॑ । मन॑वे । द॒धुः । इ॒ह । यजि॑ष्ठम् । ह॒व्य॒वा॒ह॒न॒ । यम् । कण्वः॑ । मेध्य॑अतिथिः । ध॒न॒स्पृत॑म् । यम् । वृषा॑ । यम् । उ॒प॒स्तु॒तः॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:36» मन्त्र:10 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:9» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:8» मन्त्र:10


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्य किस प्रकार के पुरुष को सभाध्यक्ष करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (हव्यवाहन) ग्रहण करने योग्य वस्तुओं की प्राप्ति करानेवाले सभ्यजन ! (यम्) जिस विचारशील (यजिष्ठम्) अत्यन्त यज्ञ करनेवाले (त्वा) आप को (देवासः) विद्वान् लोग (मनवे) विचारने योग्य राज्य की शिक्षा के लिये (इह) इस पृथिवी में (दधुः) धारण करते (यम्) जिस शिक्षा पाये हुए (धनस्पृतम्) विद्या सुवर्ण आदि धन से युक्त आप को (मेध्यातिथिः) पवित्र अतिथियों से युक्त अध्यापक (कण्वः) विद्वान् पुरुष स्वीकार करता (यम्) जिस सुख की वृष्टि करनेवाले (त्वा) आप को (वृषा) सुखों का फैलानेवाला धारण करता और (यम्) जिस स्तुति के योग्य आप को (उपस्तुतः) समीपस्थ सज्जनों की स्तुति करनेवाला राजपुरुष धारण करता है उन आप को हम लोग सभापति के अधिकार में नियत करते हैं ॥१०॥
भावार्थभाषाः - इस सृष्टि में सब मनुष्यों को चाहिये कि विद्वान् और अन्य सबको चतुर पुरुष मिल के जिस विचारशील ग्रहण के योग्य वस्तुओं के प्राप्त करानेवाले शुभ गुणों से भूषित विद्या सुवर्णादिधनयुक्त सभा के योग्य पुरुष को राज्य शिक्षा के लिये नियुक्त करें उसी पिता के तुल्य पालन करनेवाला जन राजा होवे ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उपस्तुत

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (हव्यवाहन) - हव्यः दानपूर्वक अदन के योग्य अथवा पवित्र पदार्थों को प्राप्त करानेवाले प्रभो ! आप वे हैं (यम्) - जिन (यजिष्ठम्) - सर्वोत्तम, पूजा के योग्य (त्वा) - आपको (देवासः) - देववृत्तिवाले लोग (इह) - इस मानव - जीवन में (मनवे) - मनुष्यमात्र के हित के लिए अथवा ऊँचे - से - ऊँचा ज्ञान प्राप्त करने के लिए (दधुः) - धारण करते हैं । प्रभु को हृदय में धारण करने पर मनुष्य सबके साथ बन्धुत्व को अनुभव करता है, अतः सभी के हित में प्रवृत्त होता है । प्रभु के हृदयस्थ होने पर हमारा हृदय ज्ञान से दीप्त हो उठता है ।  २. प्रभु वे हैं (यं धनस्पृतम्) - जिन सब धनों से प्रीणित करनेवाले को (कण्वः) - मेधावी पुरुष धारण करता है ।  ३. प्रभु वे हैं (यम्) - जिनको (वृषा) - शक्तिशाली पुरुष और शक्ति के द्वारा सबपर सुखों की वर्षा करनेवाला पुरुष धारण करता है ।  ४. प्रभु वे हैं (यम्) - जिनको (उपस्तुतः) - [उपगतः स्तौति, द०] प्रभु की उपासना करता हुआ स्तुति करता है, वह धारण करता है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु को धारण वह करता है जो ‘देव, कण्व, मेध्यातिथि, वृषा व उपस्तुत' है । प्रभु ज्ञान देनेवाले व धनों से प्रीणित करनेवाले हैं ।  
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(यम्) मननशीलम् (त्वा) त्वाम् (देवासः) विद्वांसः (मनवे) मननयोग्याय राजशासनाय (दधुः) दध्यासुः। अत्र लिङर्थे लिट्। (इह) अस्मिन् संसारे (यजिष्ठम्) अतिशयेन यष्टारम् (हव्यवाहन) हव्यान्यादातु-मर्हाणि वसूनि वहति प्राप्नोति तत्संबुद्धौ सभ्यजन (यम्) शिक्षितम् (कण्वः) मेधावीजनः (मेध्यातिथिः) मेध्यैरतिथिभिर्युक्तोऽध्यापकः (धनस्पृतम्) धनैर्विद्यासुवर्णादिभिः स्पृतः प्रीतः सेवितस्तम् (यम्) सुखस्य वर्षकम् (वृषा) विद्यावर्षकः (यम्) स्तोतुमर्हम् (उपस्तुतः) उपगतः स्तौति स उपस्तुतो विद्वान्। अत्र स्तुधातोर्बाहुलकादौणादिकः क्तः प्रत्ययः ॥१०॥

अन्वय:

मनुष्याः कीदृशं सभेशं कुर्य्युरित्याह।

पदार्थान्वयभाषाः - हे हव्यवाहन यं यजिष्ठं त्वा त्यां देवासो मनव इह दधुर्दधति। यं धनस्पृतं त्वा त्वां मेध्यातिथिः कण्वो दधे। यं त्वा त्वां वृषादधे। यं त्वा त्वामुपस्तुतो दधे तं त्वां वयं सभापतित्वेनाङ्गी कुर्महे ॥१०॥
भावार्थभाषाः - अस्मिञ्जगति सर्वैर्मनुष्यैर्विद्वांसोऽन्ये च श्रेष्ठपुरुषा मिलित्वा यं विचारशीलमादेयवस्तुप्रापकं शुभगुणाढ्यं विद्यासुवर्णादिधनयुक्तं सभ्यजनं राज्यशासनाय नियुञ्ज्युस्स, एव पितृवत्पालको राजा भवेत् ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of light and fire, most dedicated to yajna, loved and honoured, creator and harbinger of the noblest wealth of life, you — whom the brilliant, intelligent and generous people accepted for enlightened rule, whom the scholars and teachers with their disciples and yajnic friends accepted as the man of wealth and knowledge, whom the generous pious people accepted, whom the popular and respected people accepted — such as you are, we accept, elect, appoint and consecrate you as the ruler and commander of the nation.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Whom should men elect as the President of the Assembly or the State is taught in the tenth Mantra.

अन्वय:

O bearer of acceptable wealth, we accept you as the President of the Assembly (or the council of ministers) who are the most liberal donor and performer of Yajnas, whom learned persons choose for the well-considered administration of the State, who are endowed with the wealth of wisdom and gold, upheld or supported by teachers having holy guests, whom a showerer of knowledge supports as you are Rainer down of happiness and whom an admirer of nobility or virtues whole-heartedly supports.

पदार्थान्वयभाषाः - (मनवे) मननयोग्याय राजशासनाय = For the administration of the State which should be well considered. (वृषा) विद्यावर्षक: = The showerer of knowledge. (उपस्तुतः) उपगतः स्तौति सा उपस्तुतो विद्वान अत्र स्तुधार्बाहुलकादौणादिकः क्तः प्रत्ययः | = He who advises well when approached.
भावार्थभाषाः - The man whom all learned and other righteous persons. appoint as the ruler of the State, because he is thoughtful, the bringer of all articles that are worth-taking, endowed with noble virtues, possessing the wealth of wisdom and gold etc, who is good mannered and civilized, should protect and preserve all people like their father.
टिप्पणी: Is is wrong on the part of Sayanacharya, Prof. Wilson, Griffith and others to take words like Manu and Kanva as the names of particular persons. It is against the principles of the Vedic terminology which takes all words as derivative or Yaugikas. In the Vedic Lexicon Nighantu 3.15 it is clearly stated कण्व इति मेधाविनाम ( निघ० ३.१५ )| The word Manu is from मन ज्ञाने orअव वधे hence according to the context, Rishi Dayananda has interpreted मनवे as मननयोग्याय राजशासनाव It is note-worthy that while even Sayanacharya takes the words मेध्यातिथि, बृषा and उपस्तुत as derivatives and Prof. Wilson follows him. Griffith goes in the wrong direction and mistakenly remarks in the foot-note:- "Medhyatithi: Sayana takes this word to be an epithet of Kanva! entertainer of guests who are worthy sacrifical food. "But it appears to be the name of a Rishi of Kanva's family, the seer of twenty eight of Books VIII and IX. Griffith further remarks, “Vrishan, and Upastuta, rendered by Wilson after Sayana "Indra and some other worshipper are also apparently the names of the two other Rishis." mansa All this audacious interpretation is opposed to the Meemansa aphorisms. आख्याप्रवचनात् परन्तु श्रुतिसामान्यमात्रम् (मीमांसा १.३१.३३) as quoted by Shri Sayanacharya also in his Introduction.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या सृष्टीत सर्व माणसांनी विद्वान व इतर सर्व श्रेष्ठ चतुर पुरुषांनी मिळून ज्या विचारशील ग्रहण करण्यायोग्य वस्तूंना प्राप्त करविणाऱ्या शुभ गुणांनी भूषित विद्या सुवर्ण इत्यादी धनयुक्त सभेच्या योग्य पुरुषाला राज्य शिक्षणासाठी नियुक्त करावे तोच पित्याप्रमाणे पालन करणारा राजा असावा. ॥ १० ॥