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हिर॑ण्यपाणिः सवि॒ता विच॑र्षणिरु॒भे द्यावा॑पृथि॒वी अ॒न्तरी॑यते । अपामी॑वां॒ बाध॑ते॒ वेति॒ सूर्य॑म॒भि कृ॒ष्णेन॒ रज॑सा॒ द्यामृ॑णोति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

hiraṇyapāṇiḥ savitā vicarṣaṇir ubhe dyāvāpṛthivī antar īyate | apāmīvām bādhate veti sūryam abhi kṛṣṇena rajasā dyām ṛṇoti ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

हिर॑ण्यपाणिः । स॒वि॒ता । विच॑र्षणिः । उ॒भे इति॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । अ॒न्तः । ई॒य॒ते॒ । अप॑ । अमी॑वाम् । बाध॑ते । वेति॑ । सूर्य॑म् । अ॒भि । कृ॒ष्णेन॑ । रज॑सा । द्याम् । ऋ॒णो॒ति॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:35» मन्त्र:9 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:7» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:9


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सभाध्यक्ष ! जैसे (हिरण्यपाणिः) जिसके हिरण्यरूप ज्योति हाथों के समान ग्रहण करनेवाले हैं (विचर्षणिः) पदार्थों को छिन्न-भिन्न और (सविता) रसों को उत्पन्न करनेवाला सूर्यलोक (उभे) दोनों (द्यावापृथिवी) प्रकाश भूमि को (अन्तः) अन्तरिक्ष के मध्य में (ईयते) प्राप्त (अमीवाम्) रोग पीड़ा का (अपबाधते) निवारण (सूर्य्य) सबको प्राप्त होनेवाले अपने किरणसमूह को (अभिवेति) साक्षात् प्रगट और (कृष्णेन) पृथिवी आदि प्रकाश रहित (रजसा) लोकसमूह के साथ अपने (द्याम्) प्रकाश को (ऋणोति) प्राप्त करता है वैसे तुझको भी होना चाहिये ॥९॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे सभापते जैसे यह सूर्य्यलोक बहुत लोकों के साथ आकर्षण संबन्ध से वर्त्तमान सब वस्तुमात्र को प्रकाशित करता हुआ प्रकाश तथा पृथिवी लोक का मेल करता है वैसे स्वभावयुक्त आप हूजिये ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

हिरण्यपाणि सविता

पदार्थान्वयभाषाः - १. (हिरण्यपाणि) - अपने किरणरूप हाथों में स्वर्ण को लिये हुए, सूर्याभिमुख होकर छाती पर, सूर्य - किरणों को अपने शरीर पर लेनेवालों को यह सूर्य अपनी किरणों से स्वर्ण के इंजैक्शन्स लगाता प्रतीत होता है, (सविता) - सबको कर्मों में व्याप्त होने की यह प्रेरणा दे रहा है । (विचर्षणिः) - [विशिष्टदर्शनयुक्ताः] यह दृष्टि - शक्ति को विशेष रूप से बढ़ानेवाला है । ऐसा यह सूर्य (उभे) - दोनों (द्यावापृथिवी अन्तः) - द्युलोक व पृथिवीलोक के मध्य में (ईयते) - गति करता है ।  २. सर्वत्र प्रकाश फैलाता हुआ यह सूर्य (अमीवाम्) - रोगकृमियों को (अपबाधते) - सुदूर फेंक देता है । [उद्यन् आदित्यः क्रिमीन् हन्ति निम्लोचन हन्तु रश्मिभिः] ।  ३. (सूर्यम्) - सरणशीलता को (वेति) - प्राप्त कराता है [जनयति, द०] शरीर में स्फूर्ति लाकर आलस्य को नष्ट करता है । (कृष्णेन) - [तमसः कर्षकेण] अन्धकार के निवारक (रजसा) - तेज से (द्याम्) - द्युलोक को (अभि ऋणोति) - दोनों ओर से व्याप्त करता है । सूर्याभिमुख पृथिवी के भाग पर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं तथा दूसरी ओर चन्द्रमा से प्रतिक्षिप्त होकर सूर्यकिरणें प्रकाश फैलाती हैं ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - सूर्य हिरण्यपाणि है, रोगों को दूर करता है और सरणशीलता व स्फूर्ति प्राप्त कराता है ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(हिरण्यपाणिः) हिरण्यानि ज्योतींषि पाणयो हस्तवद्ग्रहणसाधनानि यस्य सः (सविता) रसानां प्रसविता (विचर्षणिः) विलेखनस्वभावेन विच्छेदकः। कृषेरादेश्चचः उ० २।१००। इति कृषविलेखने धातोरनिः प्रत्ययः (उभे) द्वे (द्यावापृथिवी) प्रकाश पृथिव्यौ (अन्तः) अन्तरिक्षस्य मध्ये (ईयते) प्रापयति (अप) दूरीकरणे (अमीवाम्) रोगपीड़ाम् (बाधते) निवारयति (वेति) प्रजनयति। अत्रान्तर्गतो ण्यर्थः। (सूर्यम्) सरणशीलं स्वकीयरश्मिगणम् (अभि) सर्वतो भावे (कृष्णेन) पृथिव्यादिना (रजसा) लोकसमूहेन (द्याम्) प्रकाशम् (ऋणोति) प्रापयति। अत्रान्तर्गतो ण्यर्थः ॥९॥

अन्वय:

पुनः स किं करोतीत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - भोः सभाध्यक्ष यथा हिरण्यपाणिर्विचर्षणिः सविता सूर्यलोक उभे द्यावापृथिवी अन्तरीयते अमीवामपबाधते सूर्यमभिवेति कृष्णेन रजसा सह द्यामृणोति तथाभूतस्त्वं भव ॥९॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे सभापते यथायं सूर्योबहुभिर्लोकैः सहाकर्षणसंबन्धेन वर्त्तमानः सर्वं वस्तूजातं प्रकाशयन् प्रकाशपृथिव्योरान्तर्यं करोति तथैव त्वया भवितव्यमिति ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Savita, the sun, lord of the golden hand of generosity, creator of the sap of life, shines across the regions of heaven and earth. It destroys and eliminates disease and dirt, spreads its light all over, blazes in the heavens and over-reaches the regions of darkness.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What does Savita do is further taught in the 9th Mantra.

अन्वय:

O President of the Assembly! You should be like the solar world which has light as its hands, which is generator of sap and disintegrator of particles. It travels (through its rays ) between the two regions of heaven and earth, dispels diseases, spreads its rays, and overspreads the light with the earth.

पदार्थान्वयभाषाः - ( हिरण्यपाणि:) हिरण्यानि ज्योतींषि पाणयः-हस्तवद् ग्रहण साधनानि यस्य सः = Having light as its hands. ( सविता) रसानां प्रसविता = The generator of sap. (विचर्षणिः) विलेखन स्वभावेन विच्छेदकः । कृषेरादेश्च चः (उणा० ३.१०० ) इति कृष्-विलेखने धातोः अनि: प्रत्ययः | = Disintegrator. ( सूर्यम् ) सरणशीलं स्वकीय रश्मिगणम् = The band of the rays of the Sun. ( कृष्णेन रजसा ) ! पृथिव्यादिना लोकसमूहेन = With the earth and other worlds. (द्याम्) प्रकाशम् = Light.(ऋणोति) प्रापयति अन्तर्गतोण्यर्थः = Causes. ( ऋ०-गतिप्रापणयोः) (अमीवाम् ) रोगपीडाम् = The pain of disease. अम-रोगे
भावार्थभाषाः - O President of the Assembly, as this Sun related with many worlds on account of his gravitation, illumines all objects and enables all to distinguish between light and darkness, you should also be like him, spreading the light of knowledge and dispelling all darkness of ignorance.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे सभापती! जसा हा सूर्यलोक पुष्कळ गोलांबरोबर आकर्षण संबंधाने स्थित असून सर्व वस्तूंना प्रकाशित करतो व प्रकाश आणि पृथ्वीलोकाचा संयोग करतो तसा स्वभाव तुमचाही ठेवा. ॥ ९ ॥