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अ॒ष्टौ व्य॑ख्यत्क॒कुभः॑ पृथि॒व्यास्त्री धन्व॒ योज॑ना स॒प्त सिन्धू॑न् । हि॒र॒ण्या॒क्षः स॑वि॒ता दे॒व आगा॒द्दध॒द्रत्ना॑ दा॒शुषे॒ वार्या॑णि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

aṣṭau vy akhyat kakubhaḥ pṛthivyās trī dhanva yojanā sapta sindhūn | hiraṇyākṣaḥ savitā deva āgād dadhad ratnā dāśuṣe vāryāṇi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒ष्टौ । वि । अ॒ख्य॒त् । क॒कुभः॑ । पृ॒थि॒व्याः । त्री । धन्व॑ । योज॑ना । स॒प्त । सिन्धू॑न् । हि॒र॒ण्य॒अ॒क्षः । स॒वि॒ता । दे॒वः । आ । अ॒गा॒त् । दध॑त् । रत्ना॑ । दा॒शुषे॑ । वार्या॑णि॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:35» मन्त्र:8 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:7» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:8


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर इसके कृत्य का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सभेश ! जैसे जो (हिरण्याक्षः) जिसके सुवर्ण के समान ज्योति हैं वह (सविता) वृष्टि उत्पन्न करनेवाला (देवः) द्योतनात्मक सूर्यलोक (पृथिव्याः) पृथिवी से संबन्ध रखनेवाली (अष्टौ) आठ (ककुभः) दिशा अर्थात् चार दिशा और चार उपदिशाओं (त्री) तीन भूमि अन्तरिक्ष और प्रकाश के अर्थात् ऊपर नीचे और मध्य में ठहरनेवाले (धन्व) प्राप्त होने योग्य (योजना) सब वस्तु के आधार तीन लोकों और (सप्त) सात (सिंधून्) भूमि अंतरिक्ष वा ऊपर स्थित हुए जलसमुदायों को (व्यख्यत्) प्रकाशित करता है वह (दाशुषे) सर्वोपकारक विद्यादि उत्तम पदार्थ देनेवाले यजमान के लिये (वार्याणि) स्वीकार करने योग्य (रत्ना) पृथिवी आदि वा सुवर्ण आदि रमणीय रत्नों को (दधत्) धारण कर्ता हुआ (आगात्) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है वैसे तुम भी वर्त्तो ॥८॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यह सूर्यलोक सब मूर्त्तिमान् पदार्थो का प्रकाश छेदन वायुद्वारा अन्तरिक्ष में प्राप्त और वहां से नीचे गेर कर सब रमणीय सुखों को जीवों के लिये उत्पन्न करता और पृथिवी में स्थित और उनचास क्रोश पर्यन्त अन्तरिक्ष में स्थूल सूक्ष्म लघु और गुरु रूप से स्थित हुए जलों को अर्थात् जिनका सप्तसिंधु नाम है आकर्षणशक्ति से धारण करता है वैसे सब विद्वान् लोग विद्या और धर्म से सब प्रजा को धारण करके सबको आनन्द में रक्खें ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

हिरण्याक्ष - सविता

पदार्थान्वयभाषाः - १. यह सूर्य (पृथिव्याः) - पृथिवी की (अष्टौ ककुभः) - आठों दिशाओं को [चार मुख्य व चार उपदिशाओं को] (वि अख्यत्) - विशेष रूप से प्रकाशित करता है ।  २. (योजना) - सब प्राणियों के उचित भोगों से युक्त [योजित] करनेवाले (त्री धन्व) - तीन लोकों को [द्युलोक, अन्तरिक्ष व पृथिवी को] भी तथा (सप्त सिन्धून्) - इन सर्पणशील जलों को भी (व्यख्यत्) - यह प्रकाशित करता है । ३. (हिरण्याक्षः) - ज्योतिर्मय आँखवाला, अर्थात् चमकते हुए प्रकाशवाला (सविता) - सबका प्रेरक (देवः) - सब व्यवहारों का साधक सूर्य (आगात्) - आता है और (दाशुषे) - दान देनेवाले, अर्थात् त्याग की वृत्तिवाले पुरुष के लिए तथा सूर्य के प्रति अपना अर्पण करनेवाले के लिए, सूर्याभिमुख होकर ध्यानादि करनेवाले के लिए (वार्याणि) - वरणीय - चाहने योग्य (रत्ना) - रमणीय पदार्थों को, शरीर की धारक सात धातुओं को (दधत्) - धारण कराता है । सूर्य - किरणों के सेवन से शरीर की सब धातुएँ ठीक रहती हैं और नीरोगता प्राप्त होती है ।  ४. 'दाशुषे' शब्द का अर्थ सायण [हविर्दत्तवते] 'अग्निहोत्र करनेवाले के लिए' यह करते हैं । एवं, प्रातः सायं सूर्याभुमख होकर यज्ञ करना आरोग्यता के लिए अत्यन्त सहायक है ।  ५. 'हिरण्याक्षः' का अर्थ [हितरमणीय चक्षुर्युक्तः] है, अतः यह संकेत कर रहा है कि सूर्याभिमुख होकर ध्यान व यज्ञ करेंगे तो आँख की शक्ति भी बढ़ेगी ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - सूर्याभिमुख होकर ध्यान व यज्ञ में बैठने से दृष्टि - शक्ति बढ़ेगी, शरीरस्थ धातुएँ ठीक होकर स्वास्थ्य प्राप्त होगा ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(अष्टौ) चतस्रोदिश उपदिशश्च (वि) विशेषार्थे क्रियायोगे (अख्यात्) ख्यापयति (ककुभः) दिशः। ककुभइति दिङ्नामसु पठितम्। निघं० १।६। (पृथिव्याः) भूमेः सम्बन्धिनीः (त्री) त्रीणि भूम्यन्तरिक्षप्रकाशस्थानि भुवनानि (धन्व) प्राप्तव्यानि। अत्र गत्यर्थाद्धविधातोरौणादिकः कनिन् सुपां सुलुग् इतिविभक्तेर्लुक्। (योजना) युज्यन्ते सर्वाणि वस्तूनि येषु भुवनेषु तानि योजनानि। अत्र शेश्छन्दसि इति शेर्ल्लोपः। (सप्त) सप्तसङ्ख्याकान् (सिंधून्) भूम्यन्तरिक्षोपर्युपरिस्थितान् (हिरण्याऽक्षः) हिरण्यानि ज्योतींष्यक्षीणि व्याप्तिशीलानि यस्य सः (सविता) वृष्ट्युत्पादकः (देवः) द्योतनात्मकः (आ) समंतात् (अगात्) एति प्राप्नोति। अत्र लडर्थे लुङ्। इणो गा लुङि। अ० २।४।४५। इति गा आदेशः। (दधत्) दधातीति दधत्सन् (रत्ना) सुवर्णादीनि रमणीयानि (दाशुषे) सर्वोपकारकाय विद्यादिदानशीलाय यजमानाय (वार्य्याणि) वरितुं ग्रहीतुं योग्यानि ॥८॥

अन्वय:

पुनरेतस्य कृत्यमुपदिश्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सभेश त्वं यथा यो हिरण्याक्षः सविता देवः सूर्यलोकः पृथिव्याः सम्बन्धिनीरष्टौककुभस्त्री त्रीण्युपर्यधोमध्यस्थानि धन्वानि योजनानि तदुपलक्षितान् मार्गान् सप्तसिंधूँश्च व्यख्यद्विख्यापयति स दाशुषे वार्याणि रत्ना रत्नानि दधत्सन्नागात् समंतादेति तथा भूतः सन् वर्त्तस्व ॥८॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथाऽयं सूर्यलोकः सर्वाणि मूर्त्तद्रव्याणि प्रकाश्य छित्वावायुद्वाराऽन्तरिक्षे नीत्वा तस्मादधो निपात्य सर्वाणि रमणीयानि सुखानि जीवार्थं नयति। पृथिव्या मध्ये स्थितानामेकोनपंचाशत् क्रोशपर्यन्तेन्तरिक्षे स्थूलसूक्ष्मलघुगुरुत्वरूपेण स्थितानां चापां सप्तसिंध्विति संज्ञैताः सर्वा आकर्षणेन धरति च तथा सर्वैर्विद्वद्भिर्विद्याधर्म्माभ्यां सकलान् मनुष्यान् धृत्वाऽऽनन्दयितव्याः ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Savita, generous lord of golden light, comes illuminating the eight directions and sub-directions of the earth, the three sustaining regions of earth, heaven and the middle skies, and the seven seas of space, holding and bringing choicest gifts for the man of charity and yajna.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject of Savita is continued.

अन्वय:

O president of the Assembly, You should be like the sun who lights up or illumines the earth's eight quarters, the three worlds where all objects are placed properly and the moving seven waters in the firmament. He the glorious Sun, comes on all sides upholding desirable gold and other objects for the benevolent Yajamana (performing Yajnas) imparting education to all.

पदार्थान्वयभाषाः - (अष्टौ ककुभः) चतस्रो दिश: उपदिशश्च । ककुभः इति विङ्नामसु पठितम् ( निघ० १.६) =Four directions East, West, North and South and four sub directions known as Agneya, Ishaana etc. ( त्री धन्व) त्रीणि भूम्यन्तरिक्षप्रकाशस्थानि भुवनानि = Three worlds i. e. the earth, heaven and middle region. धन्व प्राप्तव्यानि अत्र गत्यर्थाद्धविधातोरौणादिक: दानिन् सुपां सुलुक् इति विभक्तेर्लुक् ( योजना ) युज्यन्ते सर्वाणि वस्तूनि येषु भुवनेषु तानि योजनानि अत्र शेश्छन्दसि बहुलम् (अष्टा० ६.१.७० ) इति शेर्लोपः । = Worlds in which all things are properly united. (हिरण्याक्ष:) हिरण्यानि ज्योतींषि अक्षीणि-व्याप्ति शीलानि यस्य सः । = Glorious or Resplendent. (सविता) वृष्ट्युत्पादक: (सूर्य:) = The Sun-the cause of rains. षु-प्रसवैश्वर्ययोः ( दाशुषे ) सर्वोपकारकाय विद्यादिदानशीलाय यजमानाय = For the performer of the Yajna who does good to others by giving them knowledge and other things.
भावार्थभाषाः - There is implied simile used in the Mantra. This Solar world illuminating all objects, disintegrating particles, taking them to the firmament through the air and bringing them down brings about charming happiness to all souls. It upholds or sustains the waters on the earth and up to about 50 miles in the firmament in gross subtle, light or heavy forms known technically as Sapta Sindhus. In the same manner, learned persons should maintain all with knowledge and righteousness and should make them happy and blissful.
टिप्पणी: (ज्योतिवें शुक्रं हिरण्यम् ऐतरेय ब्रा० ७.१२) ज्योतिहि हिरण्यम् (शत०४.३.१.२२) = Light. Though according to the Nighantu ( 13 ) Dhanva ( धन्व ) is used for अन्तरिक्ष or firmament धन्व इत्यन्तरिक्ष नामसु ( निघ० १.३ ) yet because the number of the Dhanvas used here is three, therefore it is clear that here it means three worlds. Sayanacharya and Skanda Swami have also given the same meaning saying— साहचर्याद् वा त्रयोऽपि लोकास्त्रीणि धन्वान्युच्यन्ते ( स्कन्दस्वामी ) धन्वअन्तरिक्षोपलक्षितान् त्रिसंख्याकान् पृथिव्यादिलोकान् इति सायणाचार्यः ।
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसा सूर्य प्रत्यक्ष पदार्थाच्या प्रकाशाचे छेदन करून वायूद्वारे अंतरिक्षातून खाली आणतो व सर्व रमणीय सुख जीवासाठी उत्पन्न करतो व पृथ्वीत स्थित एकोणचाळीस कोसांपर्यंत अंतरिक्षात स्थूल, सूक्ष्म, लघु व गुरु रूपाने स्थित झालेले जल अर्थात ज्यांचे नाव सप्तसिंधू आहे, आकर्षणशक्तीने धारण करतो. तसे सर्व विद्वान लोकांनी विद्या व धर्माने सर्व प्रजेला धारण करून सर्वांना आनंदात ठेवावे. ॥ ८ ॥