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वि सु॑प॒र्णो अ॒न्तरि॑क्षाण्यख्यद्गभी॒रवे॑पा॒ असु॑रः सुनी॒थः । क्वे॒३॒॑दानीं॒ सूर्यः॒ कश्चि॑केत कत॒मां द्यां र॒श्मिर॒स्या त॑तान ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vi suparṇo antarikṣāṇy akhyad gabhīravepā asuraḥ sunīthaḥ | kvedānīṁ sūryaḥ kaś ciketa katamāṁ dyāṁ raśmir asyā tatāna ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वि । सु॒प॒र्णः । अ॒न्तरि॑क्षाणि । अ॒ख्य॒त् । ग॒भी॒रवे॑पाः । असु॒रः । सु॒नी॒थः । क्व॑ । इ॒दानी॒म् । सूर्यः॑ । कः । चि॒के॒त॒ । क॒त॒माम् । द्याम् । र॒श्मिः । अ॒स्य॒ । आ । त॒ता॒न॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:35» मन्त्र:7 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:7» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:7


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर इस सूर्यलोक के गुणों का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वज्जन ! जैसे यह सूर्य्यलोक जो (असुरः) सबके लिये प्राणदाता अर्थात् रात्रि में सोये हुओं को उदय के समय चेतनता देने (गभीरवेपाः) जिसका कंपन गभीर अर्थात् सूक्ष्म होने से साधारण पुरुषों के मन में नहीं बैठता (सुनीथः) उत्तम प्रकार से पदार्थों की प्राप्ति कराने और (सुपर्णः) उत्तम पतन स्वभाव किरण युक्त सूर्य्य (अन्तरिक्षाणि) अन्तरिक्ष में ठहरे हुए सब लोकों को (व्यख्यत्) प्रकाशित करता है (इदानीम्) इस वर्त्तमान समय रात्रि में (क्व) कहाँ है। इस बात को (कः) कौन (चिकेत) जानता तथा (कतमाम्) बहुतों में किस (द्याम्) प्रकाश को (अस्य) इस सूर्य्य के (रश्मिः) किरण (आततान) व्याप्त हो रहे हैं इस बात को भी कौन जानता है अर्थात् कोई-२ जो विद्वान् हैं वे ही जानते हैं सब साधारण पुरुष नहीं इस लिये सूर्य्यलोक का स्वरूप और गति आदि को तूं जान ॥७॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है जब यह भूगोल अपने भ्रमण से सूर्य्य के प्रकाश का आच्छादन कर अन्धकार करता है तब साधारण मनुष्य पूंछते है कि अब वह सूर्य कहाँ गया उस प्रश्न का उत्तर से समाधान करे कि पृथिवी के दूसरे पृष्ठ में है जिसका चलना अति सूक्ष्म है वैसे वह मूर्ख मनुष्यों से जाना नहीं जाता वैसे ही महाशय मनुष्यों का आशय भी अविद्वान् लोग नहीं जान सकते ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सूर्य की सुपर्णता व असुरता

पदार्थान्वयभाषाः - १. (सुपर्णः) - उत्तमता से सबका पालन करनेवाला यह सूर्य (अन्तरिक्षाणि) - अन्तरिक्ष लोकों को, अर्थात् अन्तरिक्ष में स्थित इन सब लोकों को (वि अख्यत्) - विशेष रूप से प्रकाशित करता है । २. यह (सूर्य गभीरवेपाः) - अत्यन्त गम्भीर कम्पनवाला है । इसका अपनी कीली पर घूमना इतना गम्भीर है कि वह दिखता नहीं, यह स्थित - सा प्रतीत होता है । (असुरः) - यह प्राणशक्ति को देनेवाला है - 'प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ' । (सुनीथः) - मार्गदर्शन कराता हुआ यह सम्यक्तया हमें लक्ष्य - स्थान पर पहुँचानेवाला है ।  ३. जिस समय हमसे अधिष्ठित पृथिवी - भाग सूर्याभिमुख नहीं होता उस समय (इदानीम्) - अब रात्रि के समय (सूर्यः) - यह सूर्य (क्व) - कहाँ है ? (कः चिकेत) - कौन इस बात को ठीक - ठीक जानता है ? (कतमां द्याम्) - किस द्युलोक में (अस्य रश्मिः) - इसकी किरणें (आततान) - अपने को विस्तृत कर रही हैं, अर्थात् इस समय कौन - सा भू - भाग सूर्य के द्वारा प्रकाशमय किया जा रहा है ?   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - सूर्य की अक्ष पर गति अति गम्भीर है, वह दिखती नहीं । सब प्राणशक्ति को देनेवाला, उत्तमतया मार्गदर्शक यह सूर्य बारी - बारी अपने सामने आये हुए भू - भाग को प्रकाशित करता है ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(वि) विशेषार्थे (सुपर्णः) शोभनपतनशीला रश्मयो यस्य। सुपर्णा इति रश्मिनामसु पठितम्। निघं० १।५। (अन्तरिक्षाणि) अन्तरिक्षस्थानि सर्वाणि भुवनानि (अख्यत्) ख्यापयति प्रकाशयति (गभीरवेपाः) गभीरोऽविद्वद्भिर्लक्षितुमशक्यो वेपः कंपनं यस्य सः। टुवेपृकंपन अस्मात्सर्वधातुभ्योऽसुन् इत्यसुन् प्रत्ययः (असुरः) सर्वेभ्यः प्राणदः सूर्य्योदये मृता इवोत्तिष्ठन्तीत्यतः। असुषु प्राणेषु रमते वा। (सुनीथः) सुष्ठनीथाः पदार्थप्राप्तयो यस्मात् सः। हनिकुषि० उ० २।२। अनेन णीञ् प्रापणे धातोः क्थन् प्रत्ययः (क्व) कुत्र (इदानीम्) अस्मिन् समये वर्त्तमानायां रात्रौ (सूर्यः) (कः) विद्वान् (चिकेत) केतति जानाति। अत्र कितज्ञाने धातोर्लडर्थे लिट्। (कतमाम्) बहूनां पृथिवीनां मध्ये काम् (द्याम्) द्योतनात्मिकाम् (रश्मिः) ज्योतिः (अस्य) सूर्यस्य (आ) समन्तात् (ततान) तनोति विस्तृणोति। अत्रापि लडर्थे लिट् ॥७॥

अन्वय:

पुनरस्य सूर्यलोकस्य गुणा उपदिश्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वन् यथाऽसुरो गभीरवेपाः सुनीथः सुपर्णोस्यरश्मिरन्तरिक्षाणिव्यख्यद्विख्यापयति प्रकाशयति तेन रश्मिगणेन युक्तः सूर्य्य इदानीं क्व वर्त्तते। एतत्कश्चिकेत को जानाति। कतमां द्यामस्य सूर्य्यस्य रश्मिराततानैतदपि कश्चिकेत। कश्चिदेव जानाति न तु सर्वे तदेतत्त्वमवेहि ॥७॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यदायं भूगोलो भ्रमणेन सूर्य प्रकाशमाच्छाद्यान्धकारं जनयति तदाऽविद्वांसो जनाः पृच्छन्तीदानीं सूर्य्यः क्व गत इति तंप्रश्नमुत्तरेणैवं समादध्यात् पृथिव्या अपरे पृष्ठेस्तीति यस्य चलनमतीव सूक्ष्ममस्त्यतः प्राकृतैर्जनैर्न विज्ञायत एवं विद्वद्भिप्रायोपि ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The sun is mighty brilliant, illuminates the middle regions, awfully vibrating with fusion, gives pranic life to nature and humanity, holding and guiding things in orbit. And then, where is the sun now, (when it is no more there)? In what heaven does its light shine now? Who knows? Kah knows. The Lord Supreme only knows.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of the solar world are taught further in the seventh Mantra.

अन्वय:

O learned person, The solar ray which is the giver of life to all, deep-quivering, well-directed or cause of the attainment of all articles, has illuminated the three regions. At night, where is the sun whose rays illumine or light up the world ? Who knows all this properly ? Who knows to what sphere, his rays have extended ? This can be known. Only by some learned persons and not by all. You should know all this well.

पदार्थान्वयभाषाः - (सुपर्ण:) शोभनपतनशीला रश्मयो यस्य | सुपर्णा इति रश्मिनामसु पठितम् ( निघ० १.५) = The Sun with rays which are like his charming wings. ( गभीरवेपाः ) गभीरः अविद्वद्भिः लक्षितुम् अशवयः वेपः कम्पनं यस्य सः । टु वेपृ- कम्पने अस्मात् सर्व धातुभ्योऽसुन् इति असुन् प्रत्ययः । = Deep-quivering whose quivering or subtle movement can not be known by ignorant persons. (असुर:) सर्वेभ्य: प्राणप्रदः सूर्योदये मृता इवोत्तिष्ठन्तीत्यतः । = Give of life to all beings as at the rise of the sun, they get up as if from the dead state. असुषु-प्राणेषु रमते इति वा । (सुनीथा:) सुष्ठु नीथा: पदार्थप्राप्तयो यस्मात् सः हनिकुषिनीरमि काषिभ्य: क्थन् (उणादि २.२ ) इति अनेन णीज् प्रापणे इति धातोः क्थन् प्रत्ययः । = The cause of the attainment of all articles.
भावार्थभाषाः - When this earth while rotating around the Sun, covers the light of the sun and creates darkness, then learned persons ask where has the sun gone? The question should be properly answered that he is on the back of the earth. His rotation at his own axis is very subtle, therefore ordinary people cannot know it. Such are also the thoughts of the wise, which all cannot understand.
टिप्पणी: Rishi Dayananda has interpreted गम्भीरवेपा: as गभीर:अविद्वद्भिः लक्षितुम् अशक्य: षेप:- कम्पनं यस्य सः on the basis of the root-meaning of वेप्-कम्पने |
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जेव्हा हा भूगोल आपल्या भ्रमणाने सूर्याच्या प्रकाशाचे आच्छादन करून अंधकार करतो तेव्हा साधारण माणसे विचारतात की आता तो सूर्य कुठे गेला? त्या प्रश्नाचे उत्तर द्यावे की पृथ्वीच्या दुसऱ्या भागात आहे. पृथ्वीची गती अति सूक्ष्म आहे. जशी ती मूर्ख माणसे जाणू शकत नाहीत तसेच विद्वान माणसांचा आशयही अविद्वान लोक जाणू शकत नाहीत. ॥ ७ ॥