वांछित मन्त्र चुनें

ति॒स्रो द्यावः॑ सवि॒तुर्द्वा उ॒पस्थाँ॒ एका॑ य॒मस्य॒ भुव॑ने विरा॒षाट् । आ॒णिं न रथ्य॑म॒मृताधि॑ तस्थुरि॒ह ब्र॑वीतु॒ य उ॒ तच्चिके॑तत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tisro dyāvaḥ savitur dvā upasthām̐ ekā yamasya bhuvane virāṣāṭ | āṇiṁ na rathyam amṛtādhi tasthur iha bravītu ya u tac ciketat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ति॒स्रः । द्यावः॑ । स॒वि॒तुः । द्वौ । उ॒पस्था॑ । एका॑ । य॒मस्य॑ । भुव॑ने । वि॒रा॒षाट् । आ॒णिम् । न । रथ्य॑म् । अ॒मृता॑ । अधि॑ । त॒स्थुः॒ । इ॒ह । ब्र॒वी॒तु॒ । यः । ऊँ॒ इति॑ । तत् । चिके॑तत्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:35» मन्त्र:6 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:6» मन्त्र:6 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:6


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी वायु और सूर्य्य के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वान् ! तूं (रथ्यम्) रथ आदि के चलाने योग्य (आणिम्) संग्राम को जीतनेवाले राज भृत्यों के (न) समान इस (सवितुः) सूर्यलोक के प्रकाश में जो (तिस्रः) तीन अर्थात् (द्यावः) सूर्य अग्नि और विद्युत् रूप के साधनों से युक्त (अधितस्थुः) स्थित होते हैं उनमें से (द्वौ) दो प्रकाश वा भूगोल सूर्य मंडल के (उपस्था) समीप में रहते हैं और (एका) एक (विराषाट्) शूरवीर ज्ञानवान् प्राप्ति स्वभाववाले जीवों को सहनेवाली बिजुली रूप दीप्ति (यमस्य) नियम करनेवाले वायु के (भुवने) अन्तरिक्ष में ही रहती है और जो (अमृता) कारणरूप से नाश रहित चन्द्र तारे आदि लोक हैं वे इस सूर्य लोक के प्रकाश में प्रकाशित होकर (अधितस्थुः) स्थित होते हैं (यः) जो मनुष्य (उ) वादविवाद से इनको (चिकेतत्) जाने और उस ज्ञान को (ब्रवीतु) अच्छे प्रकार उपदेश करे उसीके समान होके हमको सद्गुणों का उपदेश किया कर ॥६॥ टि० पदार्थ में इह शब्द का अर्थ छूट गया है। सं०
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जिस ईश्वर ने अग्निरूप कारण से सूर्य अग्नि और बिजुली रूप तीन प्रकार की दीप्ति रची है जिनके द्वारा सब कार्य सिद्ध होते हैं जब कोई ऐसा पूछे कि जीव अपने शरीरों को छोड़के जिस यम के स्थान को प्राप्त होते हैं वह कौन है तब उत्तर देनेवाला अन्तरिक्ष में रहनेवाले वायु को प्राप्त होते हैं ऐसा कहे जैसे युद्ध में रथ भृत्य आदि सेना के अङ्गों में स्थित होते हैं वैसे मरे और जीते हुए जीव वायु के अवलंब से स्थित होते हैं। पृथिवी चन्द्रमा और नक्षत्रादि लोक सूर्य्य प्रकाश के आश्रय से स्थित होते हैं जो विद्वान् हो वही प्रश्नों के उत्तर कह सकता है, मूर्ख नहीं। इस लिये ।मनुष्यों को मूर्ख अर्थात् अनाप्तों के कहने में विश्वास और विद्वानों के कथन में अश्रद्धा कभी न करनी चाहिये ॥६॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तीन द्युलोक

पदार्थान्वयभाषाः - १. (तिस्त्रः द्यावः) - तीन प्रकाशमय द्युलोक हैं । इनका वर्णन अथर्व १८/२/४८ में इस प्रकार है 'उदन्वती द्यौरवमा पीलुमतीतिमध्यमा । तृतीया ह प्रद्यौरिति यस्यां पितर आसते' - जलकणों - [वाष्प - कणों] - वाला द्युलोक सबसे नीचे है, पीलुओं - अत्यन्त सूक्ष्म पार्थिव जलीय व तैजस् कणों से युक्त द्युलोक मध्यम है और निश्चय से तीसरा प्रकृष्ट द्युलोक है, जिसमें पितर आसीन होते हैं । यहाँ अथर्व० १८/२/४७ में इन पितरों का भी उल्लेख इस प्रकार है - 'ये अग्रवः शशमानाः परेयुर्हित्वा द्वेषांस्यनपत्यवन्तः । ते द्यामुदित्याविदन्त लोक नाकस्य पृष्ठे अधि दीध्यानाः' - जो अग्रगामी शीघ्रगतिवाले, द्वेषों को छोड़कर किन्हीं एक - दो को ही अपना सन्तान न समझते हुए शरीर को छोड़ते हैं, वे द्युलोक पर पहुंचकर स्वर्गलोक के पृष्ठ पर आधिक्येन दीप्त होते हुए सर्वोत्कृष्ट लोक को प्राप्त करते हैं ।  २. इस प्रकार वर्णित तीन द्युलोकों में 'उदन्वती व पीलुमती' ये (द्वा) - दो द्युलोक तो (सवितुः) - सूर्य के (उपस्था) - गोद में है, समीप स्थान में हैं, अथवा सूर्य के निचले स्थान में हैं । एका बचा हुआ एक तीसरा द्युलोक वह है जो (यमस्य भुवने) - उस नियन्ता प्रभु के अथवा सर्वत्र बहनेवाली वायु [अयं वै यमः योऽयं पवते] के लोक में (विराषाट्) - [वूर्यन्ते इति विराः] जिनका प्रभु द्वारा वरण होता है, उन वीरों को ही सहता है, अर्थात् इस [प्र - द्यौः] - प्रकृष्ट द्युलोक में इन वीर पितरों का ही निवास होता है । युद्ध में पीठ न दिखानेवाले वीर ही यहाँ पहुँचते हैं ।  ३. (न) - जिस प्रकार (रथं आणिम्) - रथ में होनेवाले अक्षछिद्र में डले कीलविशेष में रथ स्थित होता है इसी प्रकार (अमृताः) - चन्द्र - नक्षत्रादि अमृत रोगरहित लोक (अधितस्थुः) - इस सूर्य में स्थित हैं  ४. (यः) - जो (उ) - निश्चय से (तत्) - सूर्य की इस सब महिमा को (चिकेतत्) - जानता है, वह (इह) - यहाँ हमें (ब्रवीतु) - इसका उपदेश करे । इस सूर्य के आकर्षण में रहनेवाले सभी लोक सूर्य में स्थित कहलाते हैं । वस्तुतः इस पृथिवीलोक की तुलना में चन्द्रादि लोक अधिक आनन्दमय व मृत्यु से रहित हैं । इसमें रहनेवाले देव 'अमर' कहलाते हैं । 'अमृता' शब्द का अर्थ 'जल' भी है , ये जल सूर्य में ही अधिष्ठित हैं । सूर्य द्वारा समुद्र - जलों का वाष्पीकरण होकर बादल बनते हैं, ये पर्वतों पर बरसते हैं और नदियों के रूप में बहकर फिर समुद्र की ओर चलते हैं । इस प्रकार ये जल सूर्य में ही अधिष्ठित हैं ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - दो द्युलोक के प्रदेश सूर्य और पृथिवी के बीच में हैं, तीसरा 'प्रद्यौः' सूर्य के ऊपर है । इसी 'प्रद्यौः' में वीर पुरुषों का निवास होता है । सब जल भी सूर्य में अधिष्ठित हैं ।   
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(तिस्रः) त्रित्वसंख्याकाः (द्यावः) सूर्याग्निविद्युद्रूपाः (सवितुः) सूर्यलोकस्य (द्वौ) स्वप्रकाशभूगोलौ (उपस्था) उपतिष्ठन्ति यस्मिँस्तत्र। अत्र आङ् याजायारांचोपसंख्यानम्#। इति वार्त्तिकेन ङेः स्थाने आङादेशः। आशेनुनासि० कश्छन्दसि। अ० ६।१।१२६। इति प्रकृतिभावादसंधिः। (एका) विद्युदाख्यदीप्तिः। (यमस्य) वायोः (भुवने) अन्तरिक्षस्थाने (विराषाट्) वीरान् ज्ञानवतः प्राप्तिशीलान् जीवान् सहते सः। अत्र वर्णव्यत्ययेन दीर्घेकारस्यस्थाने ह्रस्वेकारोऽकारस्थान आकारश्च स्फायितंचि० उ० २।१३। इत्यजधातोरक् प्रत्ययः।* छन्दसि सहः। अ० ३।२।६३। इति ण्विः। सहेः साढः सः। अ० ८।३।५६। इति षत्वम् (आणिम्) संग्रामम्। आणाविति संग्रामनामसु पठितम् निघं० २।१७। (न) इव (रथ्यम्) रथान् वहति तम् (अमृता) अमृतानि (अधि) उपरिभावे (तस्थुः) तिष्ठन्ति। अत्र लडर्थे लिट्। (इह) अस्मिन् संसारेऽस्यां विद्यायां वा (ब्रवीतु) उपदिशतु (यः) मनुष्यः (ऊँ) वितर्के (तत्) ज्ञानम् (चिकेतत्) विजानीयात् अयं कितज्ञाने धातोर्लेट् प्रथमैकवचनप्रयोगः। बहुलं छन्दसि इति शपः श्लुः ॥६॥# [अ० ७।२।३९।] * [अजेर्व्यघञपोः। अ० २।४।५६। इत्यजेः स्थाने व्योदेशः। सं०] # [अन्येषामपिदृश्यते। अ० ६।३।१३७ इत्यनेन सं०।]

अन्वय:

पुनरपि वायुसूर्य्ययोर्गुणा उपदिश्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - ¤हे विद्वँस्त्वं रथ्यमाणिं भृत्यानेवाऽस्य सवितुः सूर्यलोकस्य प्रकाशे यास्तिस्रो द्यावोऽधितस्थुस्तत्र द्वौ सवितृमण्डलस्योपस्था वर्त्तेते। एका विराषाट् विद्युदाख्यादीप्तिर्यमस्य नियंतुर्वायोर्भुवनेऽन्तरिक्षे हि तिष्ठति। यान्यमृताकारणरूपेण नाशरहितानि चंद्रतारकादीनि भुवनानि सन्ति तान्यन्तरिक्षेऽधितस्थुरधितिष्ठन्ति। यउएतानि चिकेतत् जानीयात् स तज्ज्ञानं ब्रवीतु तथा भूत्वेमां विद्यामुपदिश ॥६॥¤ [अन्वये ‘इह’ शब्दस्यार्थः स्खलितः। सं०]
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। ईश्वरेण या अग्न्याख्यात्कारणात्तिस्रो दीप्तयः सूर्याग्निविद्युदाख्या रचिताः संति तद्वारा सर्वाणि कार्याणि सिध्यन्ति। यदा ये जीवाः। शरीराणि त्यक्त्वा यस्य यमस्य स्थानं गच्छन्ति स कोस्तीति पृच्छ्यते। अत्रोत्तरमन्तरिक्षस्थं वायुं यमाख्यं गच्छन्तीति ब्रूयात्। यथा युद्धे रथस्य भृत्यादीम्यंगाम्युप तिष्ठन्ति। तथैव मृता जीविताश्च जीवा वायुमाश्रित्य तिष्ठन्ति। पृथिवीचन्द्रतारकादयो लोकाः सूर्यप्रकाशमुपाश्रित्य वर्त्तन्ते। यो विद्वान् स एव प्रश्नोत्तराणि वदेन्नेतरोमूढः। नैव मनुष्यैरविद्वत्कथने विश्वसितव्यं न किलाप्तशब्देऽश्रद्धातव्यं चेति ॥६॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Three are the lights: sunlight, fire and universal electric energy. Two of these, sun-light and fire (which is of the earthly sphere) are in the sun’s field of power and gravitation. The third, universal energy which holds the spirit and soul of the brave resides in antariksha, the middle region of yama, the vital wind (which overtakes and carries the soul after death of the body). Like the pin of a chariot wheel axle in battle, all these, fixed in their place with their role, abide by the Immortal Supreme Savita. Whoever here really knows the secret, may speak.
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of the air and the Sun are taught further.

अन्वय:

O learned person, as a battle where there are chariots and other things, depends upon the soldiers who serve in the army, there are three luminaries. The Sun, the fire and electricity, out of which two-the sun and the earth are in the proximity of or under the Solar world, while one the electricity is the world of the air antariksha or firmament The moon, stars and planets that are imperishable in the sense that they are originated from the eternal and imperishable Prakriti or Matter, who knows all these are in the middle region. He things positively or thoroughly should speak out and declare this knowledge. You should also impart this knowledge to others, having become well-versed in it.

पदार्थान्वयभाषाः - ( द्याव:) सूर्याग्निविधुदुरूपाः = Luminaries in the form of the sun, the fire and electricity. ( यमस्य ) वायो: Of the air.(अणिम् ) संग्रामम्-आणाविति संग्रामनामसु पठितम् । (निघ० १.१७) = Battle. ( चिकेतत् ) जानीयात् कित ज्ञाने इति धातो: लेट् प्रथमैकवचनप्रयोगः | बहुलं छन्दसीति शप: श्लुः ॥
भावार्थभाषाः - There is Upamalankara or simile used in this Mantra. All works are accomplished with the help of three luminaries the sun, fire and electricity born of Agni in the subtle form. When the souls depart from the bodie they go to Yama-it is said. What is that Yama is the question. The answer is that by Yama is meant here the Vayu or air in the firmament. As there are soldiers and servants as a part of the army, in the same manner, all living beings and the dead are dependent upon the air. The earth, moon. stars and other worlds depend upon the light of the sun. Only a learned person, should give answers to questions and not a stupid fellow. Men should not believe in the words of an ignorant person and should not have lack of faith in the words of an Apta i. e. a man truthful in thought, word and deed.
टिप्पणी: Rishi Dayananda has interpreted Yama (यमः ) here as वायु: or air for which he has given the derivation नियन्ता यमु-उपरमे or controller, but has not quoted an authority which is clearly available as in the following passage of the Shatapath Brahmana. अयं वै यमः योऽयं (वायु:) पवते (शतपथ ब्राह्मणे १४.२.२.११) Rishi Dayananda has interpreted आणि as संग्राम or battle on the authority of the Vedic Lexicon Nighantu 2.17 भाणाविति संग्रामनामसु ( निघण्टौ २.१७ ) Other Commentators have overlooked this authority and have taken it to mean. रथाद् बहिः अक्षछिद्रे प्रक्षिप्तः कोलविशेष आणिरुच्यते [ सायणाचार्य स्कन्द स्वामिनौ] or the Pin of the axle (Wilson). "Chariot's axle." (Maxmuller) Linch-pin (Griffith). Rishi Dayananda's interpretation is therefore well-authenticated. Shri Madhvacharya and Raghavendra Yati take Savita here also as Hari or God and show the dependence of all on Him
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. ज्या ईश्वराने अग्निरूपी कारणाने सूर्य अग्नी व विद्युतरूपी तीन प्रकारची दीप्ती निर्माण केलेली आहे, ज्यांच्याद्वारे सर्व कार्य सिद्ध होते. जर एखाद्याने प्रश्न विचारला की जीव आपल्या शरीराला सोडून ज्या यमाजवळ जातात ते स्थान कोणते? तर तेव्हा उत्तर द्यावे की, अंतरिक्षात राहणाऱ्या वायूत राहतात. जसे युद्धात रथ, सेवक इत्यादी सेनेच्या अंगात स्थित असतात तसे मेलेले व जिवंत असलेले जीव वायूचा अवलंब करून स्थित होतात. पृथ्वी, चंद्र व नक्षत्र इत्यादी गोल सूर्यप्रकाशाच्या आश्रयाने स्थित होतात. जो विद्वान आहे तोच प्रश्नांची उत्तरे देऊ शकतो, मूर्ख नाही. त्यासाठी माणसांनी मूर्ख अर्थात् अनाप्ताच्या सांगण्यावर विश्वास व विद्वानांच्या सांगण्यावर कधी अश्रद्धा ठेवू नये. ॥ ६ ॥