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त्रिर्नो॑ अश्विना दि॒व्यानि॑ भेष॒जा त्रिः पार्थि॑वानि॒ त्रिरु॑ दत्तम॒द्भ्यः । ओ॒मानं॑ शं॒योर्मम॑काय सू॒नवे॑ त्रि॒धातु॒ शर्म॑ वहतं शुभस्पती ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

trir no aśvinā divyāni bheṣajā triḥ pārthivāni trir u dattam adbhyaḥ | omānaṁ śaṁyor mamakāya sūnave tridhātu śarma vahataṁ śubhas patī ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्रिः । नः॒ । अ॒श्वि॒ना॒ । दि॒व्यानि॑ । भे॒ष॒जा । त्रिः । पार्थि॑वान् । त्रिः । ऊँ॒ इति॑ । द॒त्त॒म् । अ॒त्भ्यः । ओ॒मान॑म् । श॒म्योः । मम॑काय । सू॒नवे॑ । त्रि॒धातु॑ । शर्म॑ । व॒ह॒त॒म् । शु॒भः॒ । प॒ती॒ इति॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:34» मन्त्र:6 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:4» मन्त्र:6 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:6


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उनसे क्या करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (शुभस्पती) कल्याणकारक मनुष्यों के कर्मों की पालना करने और (अश्विना) विद्या की ज्योति को बढ़ानेवाले शिल्पि लोगो ! आप दोनों (नः) हम लोगों के लिये (अद्भ्यः) जलों से (दिव्यानि) विद्यादि उत्तम गुण प्रकाश करनेवाले (भेषजा) रसमय सोमादि ओषधियों को (त्रिः) तीनताप निवारणार्थ (दत्तम्) दीजिये (उ) और (पर्थिवानि) पृथिवी के विकार युक्त ओषधी (त्रिः) तीन प्रकार से दीजिये और (ममकाय) मेरे (सूनवे) औरस अथवा विद्यापुत्र के लिये (शंयोः) सुख तथा (ओमानम्) विद्या में प्रवेश और क्रिया के बोध करानेवाले रक्षणीय व्यवहार को (त्रिः) तीन बार कीजिये और (त्रिधातु) लोहा ताँबा पीतल इन तीन धातुओं के सहित भूजल और अन्तरिक्ष में जानेवाले (शर्म) गृहस्वरूप यान को मेरे पुत्र के लिये (त्रिः) तीन बार (वहतम्) पहुंचाइये ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को चाहिये कि जो जल और पृथिवी में उत्पन्न हुई रोग नष्ट करनेवाली औषधी हैं उनका एक दिन में तीन बार भोजन किया करें और अनेक धातुओं से युक्त काष्ठमय घर के समान यान को बना उसमें उत्तम-२ जव आदि औषधी स्थापन अग्नि के घर में अग्नि को काष्ठों से प्रज्वलित जल के घर में जलों को स्थापन भाफ के बल से यानों को चला व्यवहार के लिये देशदेशान्तरों को जा और वहां से आकर जल्दी अपने देश को प्राप्त हों इस प्रकार करने से बड़े-२ सुख प्राप्त होते हैं ॥६॥ यह चौथा वर्ग समाप्त हुआ ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मानसशान्ति व शारीरिक स्वास्थ्य

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (अश्विना) - प्राणापानो ! (नः) - हमें (त्रिः) - तीन बार (दिव्यानि भेषजा) - दिव्य ओषधियों को (दत्तम्) - दीजिए । यहाँ दिव्य ओषधियों से अभिप्राय मस्तिष्क के लिए हितकर ओषधियों से है । ये ओषधियाँ हमारे मस्तिष्क के दोषों को दूर करके उन्हें प्रकृति, जीव व परमात्मा के ज्ञानों से परिपूर्ण करनेवाली हों । इस त्रिविध ज्ञान को प्राप्त करने के लिए ही ओषधियों को तीनबार देने की प्रार्थना की गई है ।  २. इसी प्रकार (त्रिः) - तीन बार (पार्थिवानि) - पृथिवी - सम्बन्धी ओषधियों को (दत्तम्) - दीजिए । 'पृथिवी' शरीर है, वे ओषधियाँ दीजिए जोकि हमारे शरीरों को 'वात, पित्त, कफ' के विकार से होनेवाले रोगों से बचाएँ, इसीलिए ओषधि के तीन बार देने की प्रार्थना की है चूँकि रोग त्रिविध हैं ।  ३. (उ) - और (अद्भ्यः) - अन्तरिक्ष से [आपः अन्तरिक्ष, 'नि०] (त्रिः) - तीन बार ओषधियों को दीजिए । हृदयान्तरिक्ष की भी ओषधियाँ काम - क्रोध - लोभ' रूप तीन हैं । ये तीन ही गीता में नरक के द्वार कहे गये हैं । इनको भी दूर करने के लिए प्राणसाधना मुख्य उपाय है । एवं, प्राणसाधना [क] मस्तिष्क को उज्ज्वल करके उसे त्रिविध ज्ञान से परिपूर्ण करती है, [ख] शरीर को त्रिविध व्याधियों से बचाती है और [ग] मानस को त्रिविध [*मम कः' इति वदति इति ममकः] 'मेरा तो यह आनन्दस्वरूप प्रभु है' इस प्रकार का जप करनेवाले तथा (सूनवे) - सदा अपने अन्दर वेदवाणी को प्रेरित करनेवाले के लिए (शंयोः ओमानम्) - शान्ति को प्राप्त करनेवाले के आनन्दविशेष को तथा (त्रिधातु शर्म) - वात, पित्त, कफ - तीनों के ठीक समन्वय से धारण किये गये स्वस्थ शरीर के सुख को (वहतम्) - प्राप्त कराइए, अर्थात् प्राणापान की साधना से मेरा मानस शान्त हो तथा शरीर स्वस्थ हो ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणापान की साधना से हमारे शरीर की त्रिलोकी अपने - अपने ऐश्वर्य से युक्त हो तथा मानस शान्ति के साथ शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त हो ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(त्रिः) त्रिवारम् (नः) अस्मभ्यम् (अश्विना) अश्विनौ विद्याज्योतिर्विस्ता रमयौ (दिव्यानि) विद्यादि शुभगुणप्रकाशकानि (भेषजा) सोमादीन्यौषधानि रसमयानि (त्रिः) त्रिवारम् (पार्थिवानि) पृथिव्याविकारयुक्तानि (त्रिः) त्रिवारम् (ऊँ) वितर्के (दत्तम्) (अद्भ्यः) सातत्यगन्तृभ्यो वायुविद्युदादिभ्यः (ओमानम्) रक्षन्तम् विद्याप्रवेशकं क्रियागमकं व्यवहारम्। अत्रावधातोः। अन्येभ्योपि दृश्यन्त इति मनिन्। (शंयोः) शं सुखं कल्याणं विद्यते यस्मिँस्तस्य (ममकाय) ममायं ममकस्तस्मै। अत्र संज्ञापूर्वको विधिरनित्यः। अ० ६।४।१४६। इति‡ वृद्ध्यभावः (सूनवे) औरसाय विद्यापुत्राय वा (त्रिधातु) त्रयोऽयस्ताम्रपित्तलानि धातवे यस्मिन् भूसमुद्रान्तरिक्षगमनार्थे याने तत (शर्म) गृहस्वरूपं सुखकारकं वा। शर्मेति गृहनामसु पठितम्। निघं० ३।४। (वहतम्) प्रापयतम् (शुभः) यत् कल्याणकारकं मनुष्याणां कर्म तस्य। अत्र संपदादित्वात् क्विप्। (पती) पालयितारौ। पष्ठ्याःपतिपुत्र०। अ० ८।३।५३। इति संहितायां◌ विसर्जनीयस्य सकारादेशः ॥६॥ ‡[अनया परिभाषया। सं०] ◌[शुभ् शब्दस्य। सं०]

अन्वय:

पुनस्ताभ्यां किं कार्यमित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे शुभस्पती अश्विनौ युवां नोऽस्मभ्यमद्भ्यो दिव्यानि भेषजौषधानि त्रिर्दत्तं ऊँइति वितर्के पार्थिवानि भेषजौषधानि त्रिर्दत्तं ममकाय सूनवे शंयोः सुखस्यदानमोमानं च त्रिर्दत्तं त्रिधातु शर्म ममकाय सूनवे त्रिर्वहतं प्रापयतम् ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैर्जलपृथिव्योर्मध्ये यानि रोगनाशकान्यौषधानि संति तानि त्रिविधतापनिवारणाय भोक्तव्यान्यनेक धातुकाष्ठमयं गृहाकारं यानं रचयित्वा तत्रोत्तमानि यवादीन्यौषधानि संस्थाप्याग्निगृहेग्नि पार्थिवैरिंधनैः प्रज्वाल्यापः स्थापयित्वा बाष्पबलेन यानानि चालयित्वा व्यवहारार्थं देशदेशान्तरं गत्वा तत आगत्य सद्यः स्वदेशः प्राप्तव्य एवं कृते महांति सुखानि प्राप्तानि भवन्तीति ॥६॥ इति चतुर्थो वर्गः ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, scholars of knowledge, light and progressive expansion, protectors of all that is good and blissful, create for us and give us threefold heavenly essences such as soma, three earthly ones and three from waters. For my child create something soothing and all round protective, a three-metal tonic panacea for a healthy and comfortable state of health in which the three humors of vitality are balanced in peace, without agitation, anywhere.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued-

अन्वय:

O Protectors of the auspicious good actions of men, O learned men, full of the light of knowledge, thrice grant us the medicaments like Soma etc. which manifest good virtues like knowledge, by increasing intellect and those got from the earth and those got from the water, ever moving air and electricity. Grant unto our sons (whether physical or spiritual) prosperity, happiness and peace which protect and help in the acquisition of wisdom. Grant unto us the conveyances that enable us to travel on earth, sea and firmament which give us happiness and are made like our home.

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विनौ) विद्याज्योतिविस्तारमयौ = Learned persons full of the light of vast knowledge. ( दिव्यानि ) विद्यादिशुभगुणप्रकाशकानि = Which manifest good virtues like knowledge. ( अद्भ्यः) सातत्यगन्तृभ्यो वायुविद्युदादिभ्यः = From ever moving air, electricity and other articles. [शंयो:] शं सुखं कल्याणं विद्यते यस्मिन् तस्य = Of possessing happiness. [त्रिधातु] त्रयोऽयस्ताम्र पित्तलानि धातवो यस्मिन् भूसमुद्रान्तरिक्षगमनार्थे याने तत् । = Made of iron, copper and brass. A vehicle by which one can travel on earth, sea and firmament. [ शर्म ] गृहस्वरूपं सुखकारकं वा । शर्मेति गृहनामसु [निघ० ३.४] = Home.
भावार्थभाषाः - Men should take for health, medicines which are in the water or on the earth, which destroy diseases. They should manufacture conveyances like the home of iron, copper and brass etc. store there barley and other corns, should burn fire, place water and by their combination should make them to move fast, going to distant places for business and work and coming back soon. In this way, they can enjoy much happiness.
टिप्पणी: Rishi Dayananda has interpreted शर्म as गृहस्विरूपं सुखकारकं वा Home and happiness though he has quoted from Nighantu to show that the word शर्म means home. He thought perhaps that the other meaning of सुख or happiness was too well-known and therefore did ot deem it necessary to quote from the Vedic Lexicon. शर्म इति सुखनामसु [निघ० ३.६] ( Sayanacharya has wrongly taken शयो: to be the name of a person named Shanyu who was the son of Brihaspati. Wilson and Griffith have committed the same mistake. As has been pointed out several times, such interpretation is against the fundamental principles of the Vedic terminology as given in the meemansa in aphorisms like. परन्तु श्रुति सामन्य्मात्रम् ( मी० मां १. ३१ ) In the Nirukta has been explained as शमनं च रोगाणां यावनं मयानाम् ( निरुक्ते ४.३ ) = Removal of diseases and of fear. has been explained by Sayanacharya as वातपित्त श्लेष्मधातुत्रय शमनविषयं सुखम् The happiness derived from the proper position of the wind, bile and phlegm in the body. Though Rishi Dayananda has interpreted त्रिधातु शर्म here differently as given above, he has also given that meaning in his commentary on Rig.1.85.12 saying त्रिधातु-त्रिथातूनि वातपित्त्कफ़ायेषु शरीरेषु तानि This is akin to Sayanacharyas" interpretation. As in this hymn, there is clear reference to various fast going conveyances, Rishi Dayananda has given the above interpretation.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी जल व पृथ्वीवर उत्पन्न झालेला रोग नष्ट करणाऱ्या औषधींचे प्रत्येक दिवशी तीन वेळा सेवन करावे व अनेक धातूंनी युक्त काष्ठमय घराप्रमाणे यान तयार करून त्यात उत्तमोत्तम जव इत्यादी औषधी ठेवून द्यावी. अग्नीच्या घरात अग्नीला काष्ठांनी प्रज्वलित करावे. जलघरात जलाला स्थित करून वाफेच्या शक्तीने याने चालवावीत. व्यवहारासाठी देशदेशान्तरी जावे व तेथून लवकर आपल्या देशात यावे. याप्रकारे वागण्याने खूप सुख मिळते. ॥ ६ ॥