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त्रिर्व॒र्तिर्या॑तं॒ त्रिरनु॑व्रते॒ जने॒ त्रिः सु॑प्रा॒व्ये॑ त्रे॒धेव॑ शिक्षतम् । त्रिर्ना॒न्द्यं॑ वहतमश्विना यु॒वं त्रिः पृक्षो॑ अ॒स्मे अ॒क्षरे॑व पिन्वतम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

trir vartir yātaṁ trir anuvrate jane triḥ suprāvye tredheva śikṣatam | trir nāndyaṁ vahatam aśvinā yuvaṁ triḥ pṛkṣo asme akṣareva pinvatam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्रिः । व॒र्तिः । या॒त॒म् । त्रिः । अनु॑व्रते । जने॑ । त्रिः । सु॒प्र॒अ॒व्ये॑ । त्रे॒धाइ॑व । शि॒क्ष॒त॒म् । त्रिः । ना॒न्द्य॑म् । व॒ह॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । यु॒वम् । त्रिः । पृक्षः॑ । अ॒स्मे इति॑ । अ॒क्षरा॑इव । पि॒न्व॒त॒म्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:34» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:4» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उनसे क्या कार्य करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अश्विना) विद्या देने वा ग्रहण करनेवाले विद्वान् मनुष्यो ! (युवम्) तुम दोनों (अस्मे) हम लोगों के (वर्त्तिः) मार्ग को (त्रिः) तीन बार (यातम्) प्राप्त हुआ करो। तथा (सुप्राव्ये) अच्छे प्रकार प्रवेश करने योग्य (अनुव्रते) जिसके अनुकूल सत्याचरण व्रत है उस (जने) बुद्धि के उत्पादन करनेवाले मनुष्य के निमित्त (त्रिः) तीन बार (यातम्) प्राप्त हूजिये और शिष्य के लिये (त्रेधेव) तीन प्रकार अर्थात् हस्तक्रिया रक्षा और यान चालन के ज्ञान को शिक्षा करते हुए अध्यापक के समान (अस्मे) हम लोगों को (त्रिः) तीन बार (शिक्षतम्) शिक्षा और (नाद्यम्) समृद्धि होने योग्य शिल्प ज्ञान को (त्रिः) तीन बार (वहतम्) प्राप्त करो और (अक्षरेव) जैसे नदी तलाब और समुद्र आदि जलाशय मेघ के सकाश से जल को प्राप्त होते हैं वैसे हम लोगों को (पृक्षः) विद्यासंपर्क को (त्रिः) तीन बार (पिन्वतम्) प्राप्त करो ॥४॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में दो उपमालङ्कार हैं। शिल्प विद्या के जाननेवाले मनुष्यों को योग्य है कि विद्या की इच्छा करनेवाले अनुकूल बुद्धिमान मनुष्यों को पदार्थ विद्या पढ़ा और उत्तम-२ शिक्षा बार-२ देकर कार्यों को सिद्ध करने में समर्थ करें और उनको भी चाहिये कि इस विद्या को संपादन करके यथावत् चतुराई और पुरुषार्थ से सुखों के उपकारों को ग्रहण करें ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रेचक - पूरक - कुम्भक

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (अश्विना) - प्राणापानो ! आप (त्रिः) - तीन प्रकार से 'रेचक, पूरक व कुम्भक' के रूप में (वर्तिः यातम्) - मार्ग का आक्रमण करो । श्वास का वेग से बाहर फेंकना ही 'रेचक' है । धीमे - धीमे अन्दर लेना 'पूरक' है और उसे कुछ देर तक रोकना 'कुम्भक' है । प्राण के ये ही तीन मार्ग हैं ।  २. (अनुव्रते जने) - अनुकूल व्रतवाले मनुष्य में ये प्राणापान (त्रिः) - तीन बार चलें, अर्थात् प्राणसाधना करनेवाले के लिए यह आवश्यक है कि वह प्राणायाम के साथ सात्विक अन्न के सेवनादि व्रत का अवश्य लें । पथ्य के न होने पर प्राणायाम का इष्ट लाभ नहीं हो पाता ।  ३. (सु) - उत्तमता से [स] खूब ही [प्र] वीर्य का रक्षण करनेवाले [अव्य] में (त्रिः) - तीन बार मार्ग का आक्रमण करें । प्राणसाधना के साथ ब्रह्मचर्य आवश्यक ही है । प्राणायाम वीर्यरक्षण में सहायक होता है । इसके साधक को - प्राणायाम के अभ्यासी को भोग से बचना ही चाहिए । ४. ये प्राणापान (त्रेधा इव) - तीन प्रकार से (शिक्षतम्) - हमें शक्तिसम्पन्न करते हैं । इनकी साधना 'शरीर, बुद्धि व मन' तीनों का बल बढ़ाती है । इनमें क्रमशः नीरोगता, निर्मलता व तीव्रता उत्पन्न होती है ।  ५. हे प्राणापानो ! (युवम्) - आप दोनों (त्रिः) - तीन प्रकार से( नान्द्यम्) - समृद्धि को तुर्कमेनिस्तान [टुनदि समृद्धौ] (वहतम्) - प्राप्त कराओ । आपके अनुग्रह से हमें शरीर में स्वास्थ्य की समृद्धि प्राप्त हो, मन में सत्य की समृद्धि मिले तथा मस्तिष्क में स्वाध्याय की समृद्धिवाले हम हों ।  ६. हे प्राणापानो ! आप (अस्मे) - हमारे लिए (त्रिः) - तीन बार (अक्षरा इव) - जलों की भाँति (पृक्षः) अन्नों को (पिन्वतम्) - सींचो, अर्थात् प्राप्त कराओ, अर्थात् हम अधिक - से - अधिक तीन बार जल व अन्न का प्रयोग करनेवाले हों ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम रेचक, पूरक व कुम्भक के क्रम से प्राणायाम के अभ्यासी हों । इस साधना में पथ्य - सेवन व वीर्य - रक्षण का ध्यान करें । हमारे शरीर, मन व मस्तिष्क सशक्त हों । हमें स्वास्थ्य, सत्य व स्वाध्याय की समृद्धि प्राप्त हो । हम दिन में अधिक - से - अधिक तीन बार अन्न - जल का सेवन करें ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(त्रिः) त्रिवारम् (वर्त्तिः) वर्त्तन्ते व्यवहरन्ति यस्मिन्मार्गे हृपिषिरुहिवृति। उ० ४।१२४#। इत्यधिकरण इप्रत्ययः। अत्र सुपां सुलुग् इति द्वितीयैकवचनस्य स्थाने सोरादेशः। (यातम्) प्रापयतम् (त्रिः) त्रिवारम् (अनुव्रते) अनुकूलं सत्याचरणं व्रतं यस्य तस्मिन् (जने) यो जनयति बुद्धिं तस्मिन्। अत्र पचाद्यच्। (त्रिः) त्रिवारम् (सुप्राव्ये) सुष्ठु प्रकृष्टमवितुं प्रवेशितुं योग्यस्तस्मिन् अत्र वाच्छन्दसि सर्वे० इति वृद्धिनिरोधः। (त्रेधेव) यथा त्रिभिः पाठनज्ञापनहस्तक्रियादिभिः प्रकारैस्तथा। इवेन सह नित्यसमासो विभक्त्यलोपः पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वं च*। अ० २।१।४। अत्र सायणाचार्य्येण त्रेधैव त्रिभिरेवप्रकारैरित्येवशब्दोऽशुद्धो व्याख्यातः पदपाठ इव शब्दस्य प्रत्यक्षत्वात्। (शिक्षतम्) सुशिक्षया विद्यां ग्राहयतम् (त्रिः) त्रिवारम् (नान्द्यम्) नंदयितुं समर्धयितुं योग्यं शिल्पज्ञानम् (वहतम्) प्रापयतम् (अश्विना) विद्यादाताग्रहीतारावध्वर्यू (युवम्) युवाम् (त्रिः) त्रिवारम् (पृक्षः) पृंक्ते येन तत्। अत्र पृचीधातोः सर्वधातुभ्योऽसुन्। बाहुलकात्सुडागमश्च। (अस्मे) अस्मान् (अक्षरेव) यथाऽक्षराणि जलानि तथा। अत्र शेश्छन्दसि इति शेर्लोपः। अक्षरमित्युदकनामसु पठितम्। निघं० १।१२। (पिन्वतम्) प्रापयतम् ॥४॥ #[उ० ४।११९।] *[वार्तिकमिदम्। सं०]

अन्वय:

पुनस्ताभ्यां किं कार्यं कर्त्तव्यमित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विना युवं युवामस्मे अस्माकं वर्त्तिर्मार्गं त्रिर्यातम् तथा सुप्राव्येऽनुव्रते जने त्रिर्यातं त्रिवारं प्रापयतम् शिष्याय त्रेधा हस्तक्रियारक्षणचालनज्ञानाढ्यां शिक्षन्नध्यापक इवास्मान् त्रिः शिक्षतमस्मान्नांद्यं त्रिर्वहतं त्रिवारं प्रापयतम् यथा नदीतड़ागसमुद्रादयो जलाशया मेघस्य सकाशादक्षराणि जलानि व्याप्नुवन्ति तथाऽस्मान् पृक्षो विद्यासंपर्क त्रिः पिन्वतम् ॥४॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालंकारौ। शिल्पविद्याविदां योग्यतास्ति विद्यां चिकीर्षूननुकूलान् बुद्धिमतो जनान् हस्तक्रियाविद्यां पाठयित्वा पुनः पुनः सुशिक्ष्य कार्यसाधनसमर्थान् संपादयेयुः। ते चैतां संपाद्य यथावच्चातुर्यपुरुषार्थाभ्यां बहून् सुखोपकारान् गृह्णीयुः ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Asvins, scholars of knowledge and practice, come our way thrice to guide us. Follow thrice in the way of an easily accessible man of noble discipline and dedication and lead us too, teaching us three ways the art of defence, industry and automation. Conduct the programmes of joy and celebration three ways for body, mind and soul. And like the flowing waters augmented by showers of rain, develop the knowledge of mixing, compounds and mutual contact threefold.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

O givers and receivers of education, please lead us to the path of righteousness thrice. Come also and take us to the desirable man who is well-disposed towards us, has taken the vow of truth and gives good advice. Like a teacher who gives practical education in works of art with hand, its preservation and theoretical knowledge, you kindly teach us in three ways by giving instruction, by giving suitable advice and by practical training. Give us thrice the knowledge of art and industry which is to be always developed. As rivers, tanks and oceans, get water from the clouds, impart us proper education in the above three kinds and thrice a day.

पदार्थान्वयभाषाः - ( वर्ति:) वर्तन्ते व्यवहरन्ति यस्मिन् मार्गे हृ पिषिरुहि वृतिविदिछिदिकीर्तिभ्यश्च ॥ ( उणादि० ४.११९ ) इत्यधिकरणे इ प्रत्ययः = Path. ( त्रेधा इव ) यथा त्रिभिः पाठनज्ञापनहस्त क्रियादिभिः प्रकारैस्तथा । = By three methods of teaching, advising and giving practical training. ( नान्धम् ) नन्दयितुं योग्यं शिल्पज्ञानम् | = The knowledge of art that is always to be developed. (अश्विना) विद्यादाता प्रतिग्रहीतारौ अध्वर्यू । = The givers and receivers of education. ( अक्षरा इव ) यथा अक्षराणि जलानि तथा अत्र शेश्छन्दसीति शेर्लोपः | अक्षरम् इत्युदकनामसु पठितम् । (निघ० १.१२) = Like the waters. (पिन्वतम्) प्रापयतम् = Cause to attain.
भावार्थभाषाः - It is the duty of the persons well-versed in various arts, to make those intelligent men who desire to acquire the knowledge of these arts, to give proper theoretical and practical training and thereby enable them to accomplish many works by acquiring the knowledge of these arts, with dexterity and Laboure.
टिप्पणी: Here Ashvinau (अश्विना ) has been interpreted by Rishi Dayananda as विद्यादातताप्रतिग्रहीतारौ अध्वर्यू = Givers and receivers of education. The expression अश्विनाध्वर्यू' is found in the Yajurveda (14. 2. 3). In the Aitareya Brahmana 1.18 in Shatapath Br. 1.1.2.17 Taittiriya Br. 3.2.2.1 and Gopath Br. 11.2.6 we come across the significant passage. अश्विनावध्वर्यू ( ऐत० १.१८, शत० १.१.२.१७ तैत्ति० ब्रा० ३.२.२.१ गोपथ उ० २.६ ) The word Adhvaryu (अध्वर्यु ) has been explained by Yaskacharya in Nirukta 1.38 as अध्वर्यु अध्वरयुः अध्वरं युक्ति अध्वरस्य नेता अध्वरं कामयते इति वा ( नि० १.३.८ ) According to this interpretation, Adhvaryu means one who desires the Yajna (non-violent sacrifice) and one who organizes it and is its leader. Among the five daily great Yajnas the first is ब्रह्मयज्ञ which includes Sandhya and Svadhyaya or study of the Vedas. The students who desire it and teachers who are its leaders both are Adhvaryus of this first Yajna and therefore Rishi Dayananda's interpretation of अश्विनौ अध्वर्यू as विद्यदाताप्रतिग्रहितारौ the givers and receivers of knowledge is well-authenticated. पिन्बतम् is from पिवि-सेचने sprinkle and establish contact. वर्तिः has been interpreted as वर्तन्ते व्यवहरन्ति यस्मिन् मार्गे Path. Sayanacharya has explained it as अस्मदीय वर्तन साधनं गृहम् Which Prof. Wilson has translated as “Dwelling" and Griffith as "home". It is very significant to find the Vedas lay so much stress on theoretical and practical knowledge of various arts and industries along with spiritual education. This harmony is not found in any other so-called religious book.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात दोन उपमालंकार आहेत. शिल्पविद्या जाणणाऱ्या माणसांनी जिज्ञासू बुद्धिमान माणसांना पदार्थविज्ञान शिकवून वारंवार उत्तम शिक्षण द्यावे व कार्य करण्यास समर्थ करावे व त्यांनीही या विद्येचे संपादन करून यथायोग्य, चतुराईने व पुरुषार्थाने सुखाचे उपकार स्वीकारावेत. ॥ ४ ॥