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त्रयः॑ प॒वयो॑ मधु॒वाह॑ने॒ रथे॒ सोम॑स्य वे॒नामनु॒ विश्व॒ इद्वि॑दुः । त्रयः॑ स्क॒म्भासः॑ स्कभि॒तास॑ आ॒रभे॒ त्रिर्नक्तं॑ या॒थस्त्रिर्व॑श्विना॒ दिवा॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

trayaḥ pavayo madhuvāhane rathe somasya venām anu viśva id viduḥ | trayaḥ skambhāsaḥ skabhitāsa ārabhe trir naktaṁ yāthas trir v aśvinā divā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्रयः॑ । प॒वयः॑ । मधु॒वाहे॑न । रथे॑ । सोम॑स्य । वे॒नाम् । अनु॑ । विश्वे॑ । इत् । वि॒दुः॒ । त्रयः॑ । स्क॒म्भासः॑ । स्क॒मि॒तासः॑ । आ॒रभे॑ । त्रिः । नक्त॑म् । या॒थः । त्रिः । ऊँ॒ इति॑ । अ॒श्वि॒ना॒ । दिवा॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:34» मन्त्र:2 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:4» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उनसे क्या-२ सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्वि अर्थात् वायु और बिजुली के समान संपूर्ण शिल्प विद्याओं को यथावत् जाननेवाले विद्वान् लोगो ! आप जिस (मधुवाहने) मधुर गुणयुक्त द्रव्यों की प्राप्ति होने के हेतु (रथे) विमान में (त्रयः) तीन (पवयः) वज्र के समान कला घूमने के चक्र और (त्रयः) तीन (स्कम्भासः) बन्धन के लिये खंभ (स्कभितासः) स्थापित और धारण किये जाते हैं, उसमें स्थित और अग्नि और जल के समान कार्य्यसिद्धि करके (त्रिः) तीन बार (नक्तम्) रात्रि और (त्रिः) तीन बार (दिवा) दिन में इच्छा किये हुए स्थान को (उपयाथः) पहुंचो वहां भी आपके विना कार्य्य सिद्धि कदापि नहीं होती मनुष्य लोग जिसमें बैठके (सोमस्य) ऐश्वर्य की (वेनां) प्राप्ति को करती हुई कामना वा चन्द्रलोक कीइकान्ति को प्राप्त होते और जिसके (आरभे) आरम्भ करने योग्य गमनागमन व्यवहार में (विश्वे) सब विद्वान् (इत्) ही (विदुः) जानते हैं उस (उ) अद्भुत रथ को ठीक-२ सिद्ध कर अभीष्ठस्थानों में शीघ्र जाया आया करो ॥२॥
भावार्थभाषाः - भूमि समुद्र और अन्तरिक्ष में जाने की इच्छा करनेवाले मनुष्यों को योग्य है कि तीन-२ चक्र युक्त अग्नि के घर और स्तंभयुक्त यान को रचकर उसमें बैठ कर एक दिन-रात में भूगोल समुद्र अन्तरिक्ष मार्ग से तीन-२ बार जानेको समर्थ हो सकें उस यान में इस प्रकार के खंभ रचने चाहिये कि जिसमें कलावयव अर्थात् काष्ठ लोष्ठ आदि खंभों के अवयव स्थित हो फिर वहां अग्नि जल का संप्रयोग कर चलावें। क्योंकि इनके विना कोई मनुष्य शीघ्र भूमि समुद्र अन्तरिक्ष में जाने आने को समर्थ नहीं हो सकता इससे इनकी सिद्धि के लिये सब मनुष्यों को बड़े-२ यत्न अवश्य करने चाहियें ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तीन प्राणायाम

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (अश्विना) - प्राणापानो ! तुम्हारी साधना के चलने पर इस (मधुवाहने रथे) - माधुर्य का ही वहन करनेवाले शरीररूप रथ में (त्रयः पवयः) - इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि ये तीनों अपने को पवित्र करनेवाले होते हैं, अथवा ये तीनों वासनाओं के लिए वज्र के समान होते हैं - वासनाओं के अधिष्ठान न बनकर ये तीनों वासनाओं के नष्ट करनेवाले होते हैं ।  २. और प्राणसाधना से शरीर में ऊर्ध्वगतिवाले (सोमस्य) - वीर्यशक्ति की (वेनाम्) - कान्ति के (अनु) - अनुपात में (विश्वे) - ये सब, अर्थात् इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि (इत्) - निश्चय से (विदुः) - ज्ञानवाले होते हैं । प्राणसाधना से वीर्य की ऊर्ध्वगति होती है । इस ऊर्ध्वगति से शरीर कान्तिसम्पन्न व नीरोग बनता है । इस कान्ति के अनुपात में ही इन्द्रियों, मन व बुद्धि अपने - अपने कार्य करने में सशक्त होकर ज्ञान का वर्धन करते हैं । ३. ये ज्ञान का वर्धन करनेवाली 'इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि (त्रयः) - तीन (स्कम्भासः) - खम्बे ही मानो (स्कभितासः) - स्थापित किये गये हैं, ताकि इस तीव्रगति से चलते हुए शरीररूप रथ में (आरभे) आलम्बन के लिए हों, इसके कारण ही हम झटके लगने व गिरने से बच जाते हैं ।  ४. इसलिए हे प्राणापानो ! तुम (त्रिः नक्तं याथः) - तीन बार रात्रि में गति करते हो (उ) - और (त्रिः) - तीन बार (दिवा) - दिन में, अर्थात् में प्रातः व सायं दोनों समय अर्थात् दिन के प्रारम्भ में और रात्रि के प्रारम्भ में तीन बार प्राणायाम अवश्य करता हूँ ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से शरीर का रक्षण होकर [क] शरीर माधुर्यवाला होता है, अर्थात् हमारे सब कार्य माधुर्य को लिये हुए होते हैं, [ख] सोम की रक्षा होकर शरीर कान्तिसम्पन्न बनता है, [ग] इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि ज्ञानवर्धन करनेवाले होकर शरीररूप रथ में सहारे के लिए तीन स्कम्भ - से होते हैं, [घ] अतः प्रातः व सायं तीन प्राणायाम अवश्य करने ही चाहिएँ ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(त्रयः) त्रित्वसंख्याविशिष्टाः (पवयः) वज्रतुल्यानि चालनार्थानि कलाचक्राणि। पविरिति वज्रनामसु पठितम्। निघं० २।२०। (मधुवाहने) मधुरगुणयुक्तानां द्रव्याणां वेगानां वा वाहनं प्रापणं यस्मात्तस्मिन् (रथे) रमंते येन यानेन तस्मिन् (सोमस्य) ऐश्वर्यस्य चन्द्रलोकस्य वा। अत्र षुप्रसवैश्वर्ययोरित्यस्य प्रयोगः। (वेनाम्) #कामिना यात्रां धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः। उ० ३।६। इत्यजधातोर्नः प्रत्ययः* (अनु) आनुकूल्ये (विश्वे) सर्वे (इत्) एव (विदुः) जानन्ति (त्रयः) त्रित्वसंख्याकाः (स्कम्मासः) धारणार्थाः स्तंभविशेषाः (स्कभितासः) स्थापिता धारिताः। अत्रोभयत्र ¤आजसेरसुग् इत्यसुगागमः। (आरभे) आरब्धव्ये गमनागमने (त्रिः) त्रिवारम् (नक्तम्) रात्रौ। नक्तमिति रात्रिनामसु पठितम्। निघं० १।७। (याथः) प्राप्नुतम् (त्रिः) त्रिवारम् (ऊँ) वितक्रे (अश्विना) अश्विनाविव सकलशिल्पविद्याव्यापिनौ। अत्र सुपां सुलुग् इत्याकारादेशः। (दिवा) दिवसे ॥२॥ #[कमनीयाम्। सं०] *[अजेर्व्यघञपोः अ० २।४।५६। इत्यनेन चाज्धातोः स्थाने व्यादेशः सं०] ¤[अ० ७।१।५०।]

अन्वय:

पुनस्ताभ्यां तत्र किं किं साधनीयमित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विना विवसमग्रशिल्पविद्याव्यापिनौ पुरुषौ युवां यस्मिन् मधुवाहने रथ त्रयः पवस्त्रयः स्कंभासः स्कभितासो भवन्ति तस्मिन् स्थित्वा त्रिर्नक्तं रात्रौ त्रिर्दिवा दिवसे चाभीष्टं स्थानं याथो गच्छथस्तत्रापि युवाभ्यां विना कार्य्यसिद्धिर्न जायते। मनुष्या यस्य मध्ये स्थित्वा सोमस्य चंद्रस्य वा वेनां कमनीयां कान्तिं सद्यः प्राप्नुवन्ति। यं चारभे विश्वेदेवा इदेव विदुर्जानन्ति तमु रथं संसाध्य यथावदभीष्टं क्षिप्रं प्राप्नुतम् ॥२॥
भावार्थभाषाः - भूमिसमुद्रान्तरिक्षगमनं चिकीर्षुभिर्मनुष्यैस्त्रिचक्राग्न्यागारस्तम्भयुक्तानि विमानादीनि यानानि रचयित्वा तत्र स्थित्वैकस्मिन् दिन एकस्यां रात्रौ भूगोलसमुद्रान्तरिक्षमार्गेण त्रिवारं गंतुं शक्येरन्। तत्रेदृशास्त्रयस्स्कंभा रचनीया यत्र सर्वे कलावयवाः काष्ठलोष्ठादिस्तम्भावयवा वा स्थितिं प्राप्नुयुः। तत्राग्निजले संप्रयोज्य चालनीयानि। नैतैर्विना कश्चित्सद्यो भूमौ समुद्रेऽन्तरिक्षे वा गंतुमागंतुं च शक्नोति तस्मादेतेषां सिद्धये विशिष्टाः प्रयत्नाः कार्या इति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, scientists and engineers of eminence, three are the thunderous wheels and dynamos in the chariot which brings you honey-sweets of wealth and comfort. The scholars of eminence know the pleasure of soma and beauty of the moon. Three are the sustaining beams and pillars fixed in its motive system. By this you can reach your destination thrice in the day and thrice in the night.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should be accomplished by wise artists is taught further in the 2nd Mantra.

अन्वय:

O highly educated persons, behaving like the sun and the moon, for the production of smooth, graceful motion in a car and for swift locomotion, there should be attached three sets of strong wheels and mechanical appliances and the artisans should construct three supports to make it firm and steady and to keep the various mechanical parts in their places. The learned mechanics know that these cars lead to comfort and the fulfilment of desires. They should construct these cars with the help of the Ashvinau (fire and water etc.) because by their use alone, they can obtain success in manufacturing such cars as will traverse the greatest distances within three days and three nights.

पदार्थान्वयभाषाः - (पवय:) वज्नतुल्यानि चालनार्थानि कलाचक्राणि । पविरिति वज्रनामसु पठितम् ( निघ० २.२०) । = The wheels of the machines for locomotion like the thunderbolt.( वेनाम् ) कामितां यात्राम् । घाप्ल वस्यज्यतिभ्यो नः ॥ ( उणादि० ३.६) इत्यजधातोर्नः प्रत्ययः The desired journey. ( अश्विना ) अश्विनाविव सकलशिल्पविद्याव्यापिनौ । = Expert artisans behaving like the Sun and the moon. (मधुवाहने ) मधुरगुणयुक्तानां द्रव्याणां वेगानां वा वाहनं प्रापणं यस्मात् तस्मिन् । = Causing the attainment of seet substances or speed. (रथे) रमन्ते येन यानेन तस्मिन् । = Car, chariot, aero plane or any other vehicle by which a persons can get enjoyment.
भावार्थभाषाः - Those persons who desire to travel on the earth, the ocean and the firmament, should construct aero planes and other vehicles with three sets of wheels and supports. Sitting in such cars, they can travel by the route of the earth, the ocean and the firmament thrice in a day and a night. The pillars or supports should be of such a nature that all parts of the machines and the parts of the pillars made of wood and iron may have their proper place. These cars or vehicles should be moved None can travel on with the proper use of the fire and water. the earth, the ocean and the middle regions, without such vehicles. Therefore special efforts should be made for the construction of such cars.
टिप्पणी: This mantra is very significant showing the most advanced views on the scientific and technical subjects found in the Vedas-admittedly ‘the oldest books in the library of mankind. Such a vehicle or conveyance by which a man can comfortably travel on the earth, the sea and the sky round the world thrice in a' day has not yet (1973 A. D.) been invented, so far as I know.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - भूमी, समुद्र व अंतरिक्षात जाण्याची इच्छा करणाऱ्या माणसांनी तीन तीन चक्र असलेल्या अग्नीचे गृह व स्तम्भयुक्त यान निर्माण करून त्यातून एका दिवस रात्रीत भूगोल, समुद्र अंतरिक्ष मार्गाने तीन तीन वेळा जाण्यास समर्थ व्हावे. त्या यानात या प्रकारचे स्तंभ तयार केले पाहिजेत की ज्यात कलावयव अर्थात काष्ठ लोष्ठ इत्यादी खांबांचे अवयव सिद्ध व्हावेत. पुन्हा तेथे अग्नी जलाचा संप्रयोग करून ते चालवावे. कारण त्याशिवाय कोणताही माणूस तात्काळ भूमी, समुद्र, अंतरिक्षात जाण्या-येण्यास समर्थ होऊ शकत नाही. त्यामळे त्यांच्या सिद्धीसाठी सर्व माणसांनी खूप प्रयत्न अवश्य केले पाहिजेत. ॥ २ ॥