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आ नो॑ अश्विना त्रि॒वृता॒ रथे॑ना॒र्वाञ्चं॑ र॒यिं व॑हतं सु॒वीर॑म् । शृ॒ण्वन्ता॑ वा॒मव॑से जोहवीमि वृ॒धे च॑ नो भवतं॒ वाज॑सातौ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā no aśvinā trivṛtā rathenārvāñcaṁ rayiṁ vahataṁ suvīram | śṛṇvantā vām avase johavīmi vṛdhe ca no bhavataṁ vājasātau ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । नः॒ । अ॒श्वि॒ना॒ । त्रि॒वृता॑ । रथे॑न । अ॒र्वाञ्च॑म् । र॒यिम् । व॒ह॒त॒म् । सु॒वीर॑म् । शृ॒ण्वन्ता॑ । वा॒म् । अव॑से । जो॒ह॒वी॒मि॒ । वृ॒धे । च॒ । नः॒ । भ॒व॒त॒म् । वाज॑सातौ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:34» मन्त्र:12 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:5» मन्त्र:6 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:12


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर इनसे क्या सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे कारीगरी में चतुरजनो (शृण्वन्ता) श्रवण करानेवाले (अश्विना) दृढ विद्या बल युक्त ! आप दोनों जल और पवन के समान (त्रिवृता) तीन अर्थात् स्थल जल और अन्तरिक्ष में पूर्णगति से जानेके लिये वर्त्तमान (रथेन) विमान आदि यान से (नः) हम लोगों को (अर्वाञ्चम्) ऊपर से नीचे अभीष्ट स्थान को प्राप्त होनेवाले (सुवीरम्) उत्तम वीर युक्त (रयिम्) चक्रवर्त्ति राज्य से सिद्ध हुए धन को (आवहतम्) अच्छे प्रकार प्राप्त होके पहुंचाइये (च) और (नः) हम लोगों के (वाजसातौ) सङ्ग्राम में (वृधे) वृद्धि के अर्थ विजय को प्राप्त करानेवाले (भवतम्) हूजिये जैसे मैं (अवसे) रक्षादि के लिये तुम्हारा (जोहवीमि) वारंवार ग्रहण करता हूँ वैसे आप मुझको ग्रहण कीजिये ॥१२॥
भावार्थभाषाः - जल अग्नि से प्रयुक्त किये हुए रथ के विना कोई मनुष्य स्थल जल और अन्तरिक्षमार्गों में शीघ्र जानेको समर्थ नहीं हो सकता। इससे राज्यश्री, उत्तम सेना, और वीर पुरुषों को प्राप्त होके ऐसे विमानादि यानों से युद्ध में विजय को पा सकते हैं। इस कारण इस विद्या में मनुष्य सदा युक्त हों ॥१२॥ पूर्व सूक्त से इस विद्या के सिद्ध करनेवाले इन्द्र शब्द के अर्थ का प्रतिपादन किया तथा इस सूक्त से इस विद्या के साधक अश्वि अर्थात् द्यावा पृथिवी आदि अर्थ प्रतिपादन किये हैं इससे इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह पांचवां वर्ग और चौतीसवां सूक्त समाप्त हुआ ॥३४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

संग्राम - विजय

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (अश्विना) - प्राणापानो ! आप (त्रिवृता) - 'धर्म, अर्थ व काम' तीनों के वर्तन के लिए - दिये गये (रथेन) - शरीररूप रथ से (सुवीरम्) - उत्तम वीरता से युक्त (रयिम्) - धन को (अर्वाञ्चम्) - 'अस्मदभिमुखं' हमारे सामने (आवहतम्) - प्राप्त कराइए, अर्थात् इस प्राणसाधना से हमारा शरीररूप रथ "धर्म, अर्थ व काम" का समरूप से सेवन करनेवाला हो । हमें वीरतायुक्त धन प्राप्त हो ।  २. (शृण्वन्ता) - हमारी प्रार्थना को सुननेवाले (वाम्) - आप दोनों को (अवसे) - अपने रक्षण के लिये (जोहवीमि) - पुकारता हूँ । प्राणापान से केवल स्थूल शरीर के रोग ही दूर नहीं होते, मन के अशुभ भाव भी नष्ट हो जाते हैं और मस्तिष्क के अशुभ विचार भी दूर हो जाते हैं तथा हमारा पूर्ण रक्षण हो पाता है ।  ३. हे प्राणापानो ! आप (वाजसातौ) - संग्राम में (नः) - हमारे (वृधे) - वर्धन के लिए (भवतम्) - होओ, अर्थात् संग्राम में हम कभी पराजित न हों । अध्यात्मसंग्राम में विजयी होकर हम उन्नत और अधिक उन्नत होते चलें ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से हम धर्म - अर्थ - काम में समरूप से प्रवृत्त होते हैं, हम वीर बनते हैं, उत्तम ऐश्वर्य को प्राप्त करते हैं और अध्यात्मसंग्राम में सदा विजयी होते हैं ।   
टिप्पणी: विशेष—इस सूक्त का प्रारम्भ इस प्रकार होता है कि प्राणसाधना से ज्ञान, शक्ति व उदारता प्राप्त होती है [१] । जीवन में माधुर्य व शरीर में कान्ति होती है [२] । इन्द्रियों, मन व बुद्धि के दोष दूर होते हैं [३] । हमें 'स्वास्थ्य, सत्य व स्वाध्याय' की समृद्धि प्राप्त होती है [४] । इस सौभाग्य को प्राप्त होकर सूर्यसमकान्तिवाले बनते हैं [५] । हमें मानस शान्ति के साथ शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है [६] । हम 'वैश्वानर, तैजस व प्राज्ञ बनते हैं [७] । हमारा जीवन प्रकाशमय स्वर्ग - सदृश बन जाता है [८] । इस शरीररूप रथ में हमारा प्रभु से मेल होता है [९] । हमारा यह शरीर सदा यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त रहता है [१०] । तेंतीस देवों का प्रादुर्भाव होता है [११] । हम जीवन - संग्राम में विजयी होते हैं [१२] । इस विजय के लिए ही हम प्रभु को पुकारते हैं -  
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(आ) समन्तात् (नः) अस्माकम् (अश्विना) जलपवनौ। अत्र सर्वत्र सुपां सुलुग् इत्याकारादेशः। (त्रिवृता) यस्त्रिषु स्थलजलान्तरिक्षेषु पूर्णगत्या गमनाय वर्त्तते तेन (रथेन) विमानादियानस्वरूपेण रमणसाधनेन (अर्वांचम्) अर्वागुपरिष्टादधस्थं स्थानमभीष्टं वांऽचति येन तम् (रयिम्) चक्रवर्त्तिराज्यसिद्धं धनम् (वहतम्) प्राप्नुतः। अत्र लङर्थे लोट्। (सुवीरम्) शोभनां वीरा यस्य तम् (शृण्वन्ता) शृण्वन्तौ (वाम्) युवयोः (अवसे) रक्षणाय सुखावगमाय विद्यायां प्रवेशाय वा (जोहवीमि) पुनः पुनराददामि (वृधे) वर्द्धनाय। अत्र कृतो बहुलम् इति भावे क्विप्। (च) समुच्चये (नः) अस्मान् (भवतम्) भवतः। अत्र लडर्थे लोट्। (वाजसातौ) सङ्ग्रामे ॥१२॥

अन्वय:

पुनरेताभ्यां किं साधनीयमित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे शिल्पविद्याविचक्षणौ शृण्वन्ता भावयितारावश्विनौ युवां द्यावापृथिव्यादिकौ द्वाविव त्रिवृता रथेननोस्मानर्वांचं सुवीरं रयिमावहतं प्राप्नुतम् नोऽस्माकं वाजसातौ वृधे वर्द्धनाय च विजयिनौ भवतं यथाहं वामवसे जोहवीमि पुनः पुनराददामि तथा मां गृह्णीतम् ॥१२॥
भावार्थभाषाः - नैतदश्विसंप्रयोजित रथेन विना कश्चित् स्थलजलान्त रिक्षमार्गान् सुखेन सद्यो गन्तुं शक्नोत्यतो राज्यश्रियमुत्तमां सेनां वीरपुरुषाँश्च संप्राप्येदृशेन यानेन युद्धे विजयं प्राप्तुं शक्नुवंति तस्मादेतस्मिन् मनुष्याः सदा युक्ता भवंत्विति ॥१२॥ पूर्वेण सूक्तेनैतद्विद्यासाधकेन्द्रोर्थः प्रतिपादितोऽनेन सूक्तेन ह्येतस्या विद्याया मुख्यौ साधकावश्विनौ द्यावापृथिव्यादिकौ च प्रतिपादितौ स्त इत्येतदर्थस्य पूर्वार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति विज्ञेयम्। इति पञ्चमो वर्गश्चतुस्त्रिंशं सूक्तं च समाप्तम् ॥३४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, high-priests of nature, science and technology, come by the multipurpose chariot across the land, over the sea and through the skies, and bring us wealth and honour worthy of the brave this side of the horizon. Listeners as you are, I call upon you for protection and promotion. Be favourable to us for advancement and victory in the battles of life.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

O expert artisans! You who are united like the heaven and the earth or water and fire and who listen to our requests, borne in your car or chariot traverse on the earth, the water and the middle region, bring to us present prosperity of vast Government with noble off-spring. I call upon you, listening to me for protection, Knowledge with ease and entry into wisdom. Please accede to my prayer.

पदार्थान्वयभाषाः - ( अविना ) जलपवनौ । अत्र सर्वत्र सुपां सुलुक इत्याकारादेशः = The water and fire. (त्रिवृता ) यः त्रिषु स्थलजलान्तरिक्षेषु पूर्णगत्या गमनाय वर्तते तेन = That can traverse speedily on the earth, in the water and in the firmament. (रथेन) विमानादियानस्वरूपेण रमणसाधनेन = By any means of delight like the aero plane. (अवसे) रक्षणाय, सुखेनावगमाय, विद्यायां प्रवेशाय वा = For protection, for easy learning and entry into wisdom. ( जोहवीमि) पुनः पुनः आददामि । = I call upon you or take you in (remember). ( वाजसातौ) संग्रामे = In the battle.
भावार्थभाषाः - No one can traverse by the paths of the earth, water and firmament without the car or vehicle prepared and yoked by expert learned artisans. Therefore men should attain prosperity of good Government, good army and brave persons and should get victory in battles using such wonderful vehicles. So men should pay attention to this important matter also.
टिप्पणी: The adjective of रथेन as त्रिवृता is very significant Rishi Dayananda has interpreted it in this hymn several times as यः त्रिषु स्थलजलान्तरिक्षेषु पूर्णगत्या गमनाय वर्तते तेन यः त्रिषु विमानादियानस्वरूपेण रमणसाधने । = That can traverse the earth, the water and the firmament. Even Sayanacharya interprets त्रिवृता रथेन as अप्रतिहतगतित्वात् त्रिषु लोकेषु वर्तमानेन रथेन । = By the vehicle which can go in all the three worlds i. e. the earth, the water and the heaven. Prof. Wilson translates it as "Borne in your car that traverses the three worlds." अवसे used in the Mantra has been interpreted by by Sayanacharya as रक्षणार्थम् But Rishi Dayananda agreeing with Sayanacharya that it is derived from अव which has 19 meanings including protection, takes it besides रक्षणाय for सुखावगमाय विद्यायां प्रवेशाय वा । अवगम (Knowledge ) and प्रवेश (entry into wisdom). जोहवीमि is from हु-दानादनयो: आदाने च so Rishi Dayananda has interpreted as पुनः पुनः आददामि = Take you again and again. In the previous hymn, Indra had been described as the accomplisher of this science and in this hymn, the heaven and earth, fire and water etc. have been mentioned as means, so it is connected with that hymn, as the same subject is continued. इति पंचमो वर्गः चतुस्त्रिंशं सूक्तं च समाप्तम् || Here ends the fifth Verga and the thirty-fourth hymn of the first Mandala of Rigveda Sanhita.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जल व अग्नी यांनी प्रयुक्त केलेल्या रथाशिवाय (वाहनाशिवाय) कोणताही माणूस स्थल, जल व अंतरिक्ष मार्गात शीघ्रतेने जाण्यास समर्थ होऊ शकत नाही. त्यामुळे राज्यश्री, उत्तम सेना व वीर पुरुष यांनी युक्त होऊन यानाद्वारे युद्धात विजय प्राप्त केला जाऊ शकतो. त्यासाठी या विद्येत माणसांनी सदैव युक्त असावे. ॥ १२ ॥