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वधी॒र्हि दस्युं॑ ध॒निनं॑ घ॒नेनँ॒ एक॒श्चर॑न्नुपशा॒केभि॑रिन्द्र । धनो॒रधि॑ विषु॒णक्ते व्या॑य॒न्नय॑ज्वानः सन॒काः प्रेति॑मीयुः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vadhīr hi dasyuṁ dhaninaṁ ghanenam̐ ekaś carann upaśākebhir indra | dhanor adhi viṣuṇak te vy āyann ayajvānaḥ sanakāḥ pretim īyuḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वधीः॑ । हि । दस्यु॑म् । ध॒निन॑म् । घ॒नेन॑ । एकः॑ । चर॑न् । उ॒प॒शा॒केभिः॑ । इ॒न्द्र॒ । धनोः॑ । अधि॑ । वि॒षु॒णक् । ते॒ । वि । आ॒य॒न् । अय॑ज्वानः । स॒न॒काः । प्रइ॑तिम् । ई॒युः॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:33» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:1» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अगले मन्त्र में इन्द्रशब्द से उसीके गुणों का उपदेश किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्द्र) ऐश्वर्ययुक्त शूरवीर ! एकाकी आप। जैसे ईश्वर वा सूर्य्यलोक (उपशाकेभिः) सामर्थ्यरूपी कर्मों से (एकः) एक ही (चरन्) जानता हुआ दुष्टों को मारता है वैसे (घनेन) वज्ररूपी शस्त्र से (दस्युम्) बल और अन्याय से दूसरे के धन को हरनेवाले दुष्ट को (वधीः) नाश कीजिये और (विषुणक्) अधर्म से धर्मात्माओं को दुःख देनेवालों के नाश करनेवाले आप (धनोः) धनुष् के (अधि) ऊपर बाणों को निकाल कर दुष्टों को निवारण करके (धनिनम्) धार्मिक धनाढ्य की वृद्धि कीजिये जैसे ईश्वर की निन्दा करनेवाले तथा सूर्यलोक के शत्रु मेघावयव (घनेन) सामर्थ्य वा किरण समूह से नाश को (व्यायन्) प्राप्त होते हैं वैसे (हि) निश्चय करके (ते) तुम्हारे (अयज्वानः) यज्ञ को न करने तथा (सनकाः) अधर्म से औरों के पदार्थों का सेवन करनेवाले मनुष्य (प्रेतिम्) मरण को (ईयुः) प्राप्त हों वैसा यत्न कीजिये ॥४॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ईश्वर शत्रुओं से रहित तथा सूर्यलोक भी मेघ से निवृत्त हो जाता है वैसे ही मनुष्यों को चोर, डाकू, वा शत्रुओं को मार और धनवाले धर्मात्माओं की रक्षा करके शत्रुओं से रहित होना अवश्य चाहिये ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दस्यु - वध

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (इन्द्र) - जितेन्द्रिय पुरुष ! तू (उपशाकेभिः) - शक्ति को प्राप्त करानेवाले इन समीपस्थ मरुतों - प्राणों के साथ (चरन्) - विचरण करता हुआ (एकः) - [इ गतौ] गतिशील, दृढ़ [firm, unchanged] व सत्य स्वभाववाला [true] तू (धनिनम्) - इस सांसारिक धन को ही सम्पत्ति समझनेवाले (दस्युम्) - नाशक लोभ के भाव को (घनेन) - ज्ञान की वाणियों के पाठ - विशेष से, विशेष प्रकार के जप से (हि) - निश्चयपूर्वक (वधीः) - नष्ट करता है । प्राणसाधना से हममें एकत्व 'गतिशीलता, दृढ़ता व सत्य' की उत्पत्ति होती है । इस एकत्व के होने पर हम लोभ को नष्ट कर पाते हैं, यह लोभ ही तो सब व्यसनों का मूल है, इसके नाश से सब व्यसन समाप्त हो जाते हैं, लोभ की समाप्ति 'घन' से होती है, जैसे एक शत्रु की समाप्ति एक कठोर अस्त्रविशेष से होती है, उसी प्रकार यहाँ लोभ की समाप्ति ज्ञान की वाणियों के पाठविशेष व जप से होती है । इन वाणियों के द्वारा निरन्तर प्रभुस्मरण चलता है तथा तात्त्विक दृष्टि बनाकर यह वाणी हमें लोभ से ऊपर उठाती है ।  २. हे इन्द्र ! (धनोः अधि) - 'प्रणवो धनुः' प्रणव - ओङ्कार - प्रभु के नामरूप धनुष पर पड़नेवाले (ते) - वे लोभादि के भाव (विषुणक्) - [वि सु नश्] विशेषरूप से पूर्णतया नष्ट होनेवाले होकर (व्यायन्) - विविध दिशाओं में भाग खड़े होते हैं । प्रभु का नाम तेरा धनुष बनता है और तब आक्रमण करनेवाले ये लोभादि के भाव विनष्ट होकर भाग खड़े होते हैं ।  ३. इस इन्द्र को यह तात्विक दृष्टि प्राप्त हो जाती है कि (अयज्वानः) - जो यज्ञशील नहीं हैं तथा (सनकाः) - [सनन्ति सेवन्ते परपदार्थान् - द०] दूसरों के धनों का भी अन्याय से अपहरण करनेवाले हैं, देवों से दिये हुए पदार्थों को उनके लिए न देकर स्वयं सब खा जानेवाले हैं, वे (प्रेतिम् ईयुः) - मरण, नाश को प्राप्त होते हैं । 'यज्ञशील न होना व दान न देना' यह मृत्यु का ही मार्ग है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम प्राणसाधना के द्वारा अपने को दृढ़ बनाएँ; लोभादि भावों को तात्विक दुष्टि से नष्ट करने के लिए यत्नशील हों; 'ओम्' रूप प्रभु - नाम को अपना धनुष बनाएँ; यह समझें कि अयज्ञियता व परस्वादान हिंसा का मार्ग है ।   
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(बधीः) हिन्धि। अत्र लोडर्थे लुङडभावश्च। (हि) निश्चयार्थे (दस्युम्) बलान्यायाभ्यां परस्वापहर्त्तारम् (धनिनम्) धार्मिकं धनाढ्यम् (घनेन) वज्राख्येन शस्त्रेण मूर्तौ घनः। अ० ३।३।७७। इति घनशब्दोनिपातितस्तेन काठिन्यादिगुणयुक्तो हि शस्त्रविशेषो गृह्यते। अत्र। ईषाअक्षादिषु च छन्दसि प्रकृतिभावमात्रंद्रष्टव्यम्। अ० ६।१।१२७। इति वार्त्तिकेन प्रकृतिभावः। अत्र सायणाचार्य्येण द्रष्टव्यमिति भाष्यकारपाठमबुध्या वक्तव्यमित्यशुद्धः पाठो लिखितः। मूलवार्त्तिकस्यापि पाठो न बुद्धः। (एकः) यथैकोपि परमेश्वरः सूर्यलोको वा। (चरन्) जानन् प्राप्तः सन् (उपशाकेभिः) उपशक्यन्ते यैः कर्मभिस्तैः। बहुलं छन्दसि इति भिस ऐस् न। (इन्द्र) ऐश्वर्ययुक्त शूर वीर (धनोः) धनुषो ज्यायाः (अधि) उपरि भावे (विषुणक्) वेविषत्यधर्मेण ये ते विषवस्तान् नाशयति सः। अत्र अन्तर्गतो ण्यर्थः। (ते) तव (वि) विशेषार्थे (आयन्) यन्ति प्राप्नुवन्ति। अत्र लडर्थे लङ्। (अयज्वानः) अयाक्षुस्ते यज्वानो न यज्वानोऽयज्वानः। (सनकाः) सनन्ति सेवन्ते परपदार्थान् ये ते। अत्र क्कुन् शिल्पिसंज्ञयोरपूर्वस्यापि। उ० २।३२। (प्रेतिम्) प्रयन्ति भ्रियन्ते येन तं मृत्युम् (ईयुः) प्राप्नुयुः। अत्र लङर्थे लिट् ॥४॥

अन्वय:

इन्द्रशब्देन पुनः स एवार्थ उपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे इन्द्र शूरवीर यथेश्वरः सूर्य्यलोकश्चोपशाकेभिरेकश्चरन् दुष्टान् हिनस्ति तथैकाकी त्वं घनेन दस्युं बधीर्हिन्धि विनाशय विषुणक् त्वं धनो रधिवाणान् सूत्वा दस्यून्निवार्य धनिनं वर्द्धय। यथेश्वरस्य निन्दकाः सूर्यलोकस्य शत्रवो घनेन सामर्थ्येन किरणसमूहेन वा नाशं व्यायन् वियंति तथा हिते तवायज्वानः सनकाः प्रेतिमीयुर्यथा प्राप्नुयुस्तथैव यतस्व ॥४॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथेश्वरो जातशत्रुः सूर्यलोकोऽपि निवृतवृत्रो भवति। तथैव मनुष्यैर्दस्यून् हत्वा धनिनो ह्यवित्वाऽजातशत्रुभिर्भवितव्यमिति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of power and justice, marching ahead by yourself, strike down the wicked affluent hoarder alongwith his supporters with a single blow of the thunderbolt. Eliminator of smugglers and infiltrators, fix the selfish fun-lovers on the point of your arrow and let them meet their end.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

O hero, as God destroys with His Powers the wicked, so you should even if alone or singly, slay an un-righteous person taking away others' wealth with force and injustice with your adamantine weapon. Being destroyer of unrighteous persons with your destructive bow and other arms, drive away the wicked and support the righteous wealthy persons. As atheistic un-righteous persons who revile God are ruined by His Powers or germs are destroyed by the rays of the sun, in the same manner, you should endeavor to put an and to the lives of those wicked persons who forcibly take away and enjoy others' articles and who do not perform Yajnas and other noble deeds who are utterly selfish.

पदार्थान्वयभाषाः - ( दस्युम् ) बलान्यायाभ्यां परस्बापहर्तारम् = Taker of other's property and wealth with force and injustice. ( विषुणक् ) वेविषति अधर्मेण ये ते विषवः तान् नाशयति सः । अत्रान्तर्गतो ण्यर्थः ॥ Destroyer of un-righteous persons. (सनका:) सनन्ति सेवन्ते परपदार्थान् ये ते अत्र क्वुन् शिल्पिसंज्ञयोरपूर्वस्यापि -[उणा० २.३२] = Those who enjoy other's articles. षण-संभक्तौ [ प्रेतिम् ] प्र यन्ति म्रियन्ते येन तं मृत्युम् = Death. [घनेन] वज्राख्येन शस्त्रेण मूर्तेघन: [अष्टा० ३.३.७७] इति घनशब्दो निपातित तेन काठिन्यादि गुणयुक्तो हि शस्त्रविशेषो गृह्यते । = Destructive weapon like the thunderbolt.
भावार्थभाषाः - As God is without any enemies or as the sun overcomes all clouds that cover his light, so men should also destroy all thieves and plunderers, protect righteous wealthy persons and should become so popular as to be without any enemies.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसा ईश्वर अजातशत्रू आहे व सूर्यलोकही मेघापासून दूर होतो तसेच माणसांनी चोर, डाकू, शत्रू यांचे हनन करून धनवान धर्मात्म्याचे रक्षण करून शत्रूरहित झाले पाहिजे. ॥ ४ ॥