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आवः॒ शमं॑ वृष॒भं तुग्र्या॑सु क्षेत्रजे॒षे म॑घव॒ञ्छ्वित्र्यं॒ गाम् । ज्योक् चि॒दत्र॑ तस्थि॒वांसो॑ अक्रञ्छत्रूय॒तामध॑रा॒ वेद॑नाकः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

āvaḥ śamaṁ vṛṣabhaṁ tugryāsu kṣetrajeṣe maghavañ chvitryaṁ gām | jyok cid atra tasthivāṁso akrañ chatrūyatām adharā vedanākaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आवः॑ । शम॑म् । वृ॒ष॒भम् । तुग्र्या॑सु । क्षे॒त्र॒जे॒षे । म॒घ॒व॒न् । श्वित्र्य॑म् । गाम् । ज्योक् । चि॒त् । अत्र॑ । त॒स्थि॒वांसः॑ । अ॒क्र॒न् । श॒त्रु॒य॒ताम् । अध॑रा । वेद॑ना । अ॒क॒रित्य॑कः॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:33» मन्त्र:15 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:3» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:15


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर इन्द्र का क्या कृत्य है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (मघवन्) बड़े धन के हेतु सभा के स्वामी ! आप जैसे सूर्यलोक (क्षेत्रजेषे) अन्नादि सहित पृथिवी राज्य को प्राप्त कराने के लिये (श्वित्र्यम्) भूमि के ढांप लेने में कुशल (वृषभम्) वर्षण स्वभाववाले मेघ के (तुग्य्रासु) जलों में (गाम्) किरण समूह को (आवः) प्रवेश करता हुआ (शत्रूयताम्) शत्रु के समान आचरण करनेवाले उन मेघावयवों के (अधरा) नीचे के (वेदना) दुष्टों को वेदनारूप पापफलों को (तस्थिवांसः) स्थापित हुए किरणें छेदन (ज्योक्) निरन्तर (अक्रन्) करते हैं (अत्र) और फिर इस भूमि में वह मेघ (अकः) गमन करता है उसके (चित्) समान शत्रुओं का निवारण और प्रजा को सुख दिया कीजिये ॥१५॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अन्तरिक्ष से मेघ के जल को भूमि पर गिरा के सब प्राणियों के लिये सुख देता है वैसे सेनाध्यक्षादि लोग दुष्ट मनुष्य शत्रुओं को बांधकर धार्मिक मनुष्यों की रक्षा करके सुखों का भोग करें और करावें ॥१५॥ इस सूक्त में सूर्य मेघ के युद्धार्थ के वर्णन तथा उपमान उपमेय अलंकार वा मनुष्यों के युद्धविद्या के उपदेश करने से पिछले सूक्तार्थ के साथ इस सूक्तार्थ की संगति जाननी चाहिये। यह तीसरा वर्ग ३ तैतीसवां सूक्त समाप्त हुआ ॥३३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शम व वृषभ का रक्षण

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (मघवन्) - सब ऐश्वर्यों के स्वामिन् प्रभो ! आप (आवः) - रक्षित करते हो । किसको ? [क] (शमम्) - शान्त स्वभाववाले पुरुष को, [ख] (वृषभम्) - श्रेष्ठ व शक्तिशाली को, [ग] (तुग्र्यासु) - [अप्सु, आपः - रेतः] रोग - कृमियों का संहार करनेवाले रेतः कणों के होने पर (क्षेत्रजेषे) - रणभूमि में - विजय के निमित्त (गाम्) - [गतम्] जानेवाले को, अर्थात् वीर्यरक्षा के द्वारा व्याधियों व आधियों के जीतनेवाले को [घ] (श्वित्र्यम्) - अत्यन्त शुद्ध जीवनवाले को ।  २. इस प्रकार प्रभु से रक्षित होने पर (अत्र) - यहाँ इस मानव - योनि में हम (चित्) - निश्चय से (ज्योक्) - खूब देर तक (तस्थिवांसः) - ठहरनेवाले होकर (अक्रन्) - सदा यज्ञादि उत्तम कर्मों को करते हैं  ३. तथा (शत्रूयताम्) - शत्रु की भाँति आचरण करनेवालों को (अधरा वेदना) - तीन पीड़ाएँ (अकः) - करते हो । कामादि को पीड़ित करके ही हम अपने उत्कर्ष के मार्ग पर जा पाते हैं ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम [शम, वृषभ, श्वित्र] तथा रेतः कणों की रक्षा करके शत्रुओं के साथ रणांगण में विजयशील बनें । ऐसा होने पर हम प्रभु की रक्षा के पात्र होंगे और वासनारूप शत्रुओं का पूर्ण पराजय करके इस दीर्घ जीवन में सदा क्रियाशील होंगे ।   
टिप्पणी: विशेष - सूक्त का प्रारम्भ 'उपासना से सुमति - वर्धन' के साथ होता है [१] । उपासित प्रभु ही हमें धनों को देनेवाले है [२] । वे ही हमारे सच्चे स्वामी हैं [३] । उस प्रभु का 'ओम्' नाम ही हमारा धनुष हो [४] । इस धनुष के द्वारा धृतिपूर्वक हम शत्रुओं का संहार करें [५] । हम शत्रुओं का संहार ऐसे करें जैसे कि एक वीर नपुंसकों को नष्ट कर देता है [६] । शत्रुओं को नष्ट करके हम यज्ञशील व स्तोता बनें [७] । शरीर का पूर्ण नियमन करनेवाले बनें [८] । शरीर व मस्तिष्क दोनों का रक्षण करें [९] । धन हमें प्रभु से दूर करनेवाला न हो [१०] । आत्मतत्त्व का धारण हमें वृत्र - विनाश - क्षम बनाये [११] । अनालस्य व ओजस्विता से वृत्ररूप शत्रु का नाश होगा [१२] । वस्तुतः क्रियाशीलता ही वासना को नष्ट करती है [१३] । कुत्स ही प्रभु की रक्षा का पात्र होता है [१४] । शम अर्थात् शान्तस्वभाववाले की प्रभु रक्षा करते हैं । [१५] । इस शान्ति की प्राप्ति के लिए प्राणसाधना आवश्यक है -  
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(आवः) प्रापय (शमम्) शाम्यन्ति येन तम् (वृषभम्) वर्षणशीलं मेघम् (तुग्य्रासु) अप्सु हिंसनक्रियासु (क्षेत्रजेऽषे) क्षेत्रमन्नादिसहितं भूमिराज्यं जेषते प्रापयति तस्मै। अत्र अन्तर्गतो ण्यर्थः क्विबुपपदसमासश्च। (मघवन्) महाधन सभाध्यक्ष (श्वित्र्यम्) श्वित्रायां भूमेरावरणे साधु (गाम्) ज्योतिः पृथिवीं वा (ज्योक्) निरन्तरे (चित्) उपमार्थे (अत्र) अप्सु भूमौ वा (तस्थिवांसः) तिष्ठन्तः (अक्रन्) कुर्वन्ति। मन्त्रे घस#ह्वरणश० इत्यादिना च्लेर्लुक्। (शत्रूयताम्) शत्रुरिवाचरताम् (अधरा) नीचानि (वेदना) वेदनानि अत्रोभयत्र शे*श्छन्दसि बहुलम् इति शेर्ल्लोपः। (अकः) करोति। अत्र लडर्थे लुङ् ॥१५॥ #[अ० २।४।८०।] *[अ० ६।१।७०।]

अन्वय:

पुनरिन्द्रस्य किं कृत्यमित्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मघवन् सभेश त्वं यथा सूर्यः क्षेत्रजेषे श्वित्र्यं वृषभं तुग्य्रास्वप्सु गां किरणसमूहभावः प्रवेशयति शत्रूयतां तेषां मेघावयवानामधरा नीचानि वेदना वेदनानि पापफलानि दुःखानि तस्थिवांसः किरणाश्छेदनं ज्योगक्रन्। अत्र भूमौ निपातनमकः क्षेत्रजेषे आसु क्रियासु श्वित्र्यं वृषभं शमभावः शांतिं प्रापयति गां पृथिवीभावः दुःखान्यक्रंश्चिदिव शत्रून्निवार्य प्रजाः सदा सुखय ॥१५॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सूर्य्योऽन्तरिक्षान्मेघजलं भूमौ निपात्य प्राणिभ्यः शमं सुखं ददाति तथैव सेनाध्यक्षादयो मनुष्या दुष्टान् शत्रून् बध्वा धार्मिकान् पालयित्वा सततं सुखानि भुंजीरन्निति ॥१५॥ पूर्वसूक्तार्थेन सहात्र सूर्यमेघयुद्धार्थवर्णनेनोपमानोपमेयालंकारेण मनुष्येभ्यो युद्धविद्योपदेशार्थस्यैतत्सूक्तार्थस्य संगतिरस्तीति बोध्यम्। इति तृतीयो वर्गस्त्रयस्त्रिंशं सूक्तं च समाप्तम् ॥३३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, Maghavan, lord of power and glory, just as in matters of the prosperity of the various fields of the earth the sun directs its catalytic rays of energy to engage the cloud in battles of precipitation to rain down the soothing life sustaining showers, so may you, like the sun and showers, help the people settled here in peace so that they may for long carry on their earthly chores. Like the sun, bring the hostile elements of the dominion to book and keep them down to suffer as they deserve.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What is the function of Indra is taught further in the fifteenth Mantra.

अन्वय:

O wealthy president of the council of ministers, as the Sun causes his rays to enter the raining clouds which are inimical to him in order to help the enjoyment of the earth with food etc. and causes pain to the wicked as a result of their unrighteous deeds, he causes the cloud to fall down on the earth and gives happiness and peace to all through his action in the waters, protects the earth and removes misery, in the same manner, you should always make your people happy by subduing or removing all your enemies.

पदार्थान्वयभाषाः - ( वृषभम् ) वर्षणशीलं मेघम् = The cloud that rains. ( तुग्यासु ) अप्सु हिंसनक्रियासु = In the waters that destroy diseases. (गाम्) ज्योतिः पृथिवीं वा = The light or the earth.
भावार्थभाषाः - There is implied simile used in the Mantra. As the sun gives happiness to all beings by causing the fall of the water of the cloud from the firmament, in the same manner, the commander of the army and other persons should constantly enjoy happiness by captivating and imprisoning wicked enemies and protecting the righteous people.
टिप्पणी: Here again Sayanacharya has committed the mistake of taking श्वित्र्यम् as the proper noun शिवव्यायाः पुत्रं पूर्वोक्तं पुरुषम् Wilson has followed him by translating "Thou hast protected the excellent son of Shvitra-Griffith followed Sayana and Wilson in taking Dashadyum in the 14th. and Shwitra in the 15th Mantra though admitting in the foot note-Dashadyum is also said to have been a Rishi, but nothing is known of him. The same may be said of Swaitreya or Svitrya, the son of a woman named Shvitra. How un-certain and un-reliable are the explanations of many Western translators in clear from the following note given by Griffith on the word Tugryas which he translates as Tugra's Houses, He says "The meaning of Tugryas in the text is not clear. Sayana explains it in the waters "Benfey Translates "among Tugra's daughters" and the Petersburg Lexicon takes it to moan "among the families of the Tugryas.' P. 47. In this hymn Rishi Dayananda has taken Indra besides God to mean in some Mantras as समेश, राज्यैस्वयं युक्त ( President of the Assembly or the council of ministers and in others as सेनाध्य्क्ष् शत्रुणा दारयिता the Chief Commander of the Army, the destroyer of enemies. Both these meanings are substantiated clearly by the Brahmanic passages like इन्द्रो वै देवामामोजिष्ठो बलिष्ठः सहिष्ठः सत्तमः पारयिष्णुतमः ॥ ऐतरेय ७. १६ ॥ ८.१२ ) These adjectives are applicable to the President of the Assembly or the council of ministers as the mightiest and the best among enlightened persons. इन्द्रो वै देवानामोजिष्ठो बलिष्ठः ॥ (कौषीतकी ब्राह्मणे ६.१४ गोपथ उ० १.३ ) The two adjectives used here are chiefly applicable to the commander-in-Chief of an army as the mightiest or the most powerful among the heroes desiring to conquer. In some mantras the word Indra stands for the sun for which there is the authority of the Brahmnas saying. स यः स इन्द्रः एष एव स य एष ( सूर्य: ) एव तपति ।। (जैमिनीयोपनिषद् ब्रह्मणे १.२८.२) अथयः स इन्द्रोऽसौ स आदित्यः || शतपथ ब्रा०८.५.३.२ एष एवेन्द्र: य एष (सूर्यः) तपति । शतपथ० १.६.४.१८) Concluding remarks of the commentator- पूर्व सूक्तार्थेन सहात्र सूर्यमेघयुद्धार्थवर्णनेनोपमानोपमेयालङ्कारेण मनुष्येभ्यो युद्धविद्योपदेशार्थस्यैतत् सूक्तार्थस्य संगतिरस्तीति बोध्यम् ॥ इति त्रयस्त्रिशं सूक्तम् । In this hymn also by the simile of the battle between the Sun and the cloud, the military science is taught, hence it has direct connection with the previous hymn. Here ends the thirty third hymn of the first Mandala of the Rigveda Sanhita.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसा सूर्य अंतरिक्षातील मेघाच्या जलाला भूमीवर पाडून सर्व प्राण्यांना सुख देतो, तसे सेनाध्यक्ष इत्यादी लोकांनी दुष्ट माणसे व दुष्ट शत्रूंना बंधनात ठेवून धार्मिक माणसांचे रक्षण करून सुखाचा भोग करावा व करवावा. ॥ १५ ॥