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न॒दं न भि॒न्नम॑मु॒या शया॑नं॒ मनो॒ रुहा॑णा॒ अति॑ य॒न्त्यापः॑ । याश्चि॑द्वृ॒त्रो म॑हि॒ना प॒र्यति॑ष्ठ॒त्तासा॒महिः॑ पत्सुतः॒शीर्ब॑भूव ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nadaṁ na bhinnam amuyā śayānam mano ruhāṇā ati yanty āpaḥ | yāś cid vṛtro mahinā paryatiṣṭhat tāsām ahiḥ patsutaḥśīr babhūva ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

न॒दम् । न । भि॒न्नम् । अ॒मु॒या । शया॑नम् । मनः॑ । रुहा॑णाः । अति॑ । य॒न्ति॒ । आपः॑ । याः । चि॒त् । वृ॒त्रः । म॒हि॒ना । प॒रि॒अति॑ष्ठत् । तासा॑म् । अहिः॑ । प॒त्सु॒तः॒शीः । ब॒भू॒व॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:32» मन्त्र:8 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:37» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:8


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे दोनों परस्पर क्या करते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - भो राजाधिराज आप जैसे यह (वृत्रः) मेघ (महिना) अपनी महिमा से (पर्यतिष्ठत्) सब ओर से एकता को प्राप्त और (अहिः) सूर्य के ताप से मारा हुआ (तासाम्) उन जलों के बीच में स्थित (पत्सुतःशीः) पादों के तले सोनेवाला सा (बभूव) होता है उस मेघ का शरीर (मनः) मननशील अन्तःकरण के सदृश (रुहाणाः) उत्पन्न होकर चलनेवाली नदी जो अन्तरिक्ष में रहनेवाले (चित्) ही (याः) जल (भिन्नम्) विदीर्ण तटवाले (शयानं) सोते हुए के (न) तुल्य (नदम्) महाप्रवाहयुक्त नद को (यन्ति) जाते और वे जल (न) (अमुया) इस पृथिवी के साथ प्राप्त होते हैं वैसे सब शत्रुओं को बाँध के वश में कीजिये ॥८॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमा और उपमालङ्कार हैं। जितना जल सूर्य से छिन्न-भिन्न होकर पवन के साथ मेघमण्डल को जाता है वह सब जल मेघरूप ही हो जाता है जब मेघ के जल का समूह अत्यन्त बढ़ता है तब मेघ घनी-२ घटाओं से घुमड़ि-२ के सूर्य के प्रकाश को ढांप लेता है उसको सूर्य अपनी किरणों से जब छिन्न-भिन्न करता है तब इधर-उधर आए हुए जल बड़े-२ नद ताल और समुद्र आदि स्थानों को प्राप्त होकर सोते हैं वह मेघ भी पृथिवी को प्राप्त होकर जहां तहां सोता है अर्थात् मनुष्य आदि प्राणियों के पैरों में सोता सा मालूम होता है वैसे अधार्मिक मनुष्य भी प्रथम बढ़ के शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पावों - तले न कि सिर पर

पदार्थान्वयभाषाः -   १. जब वृत्र पराजित हो जाता है तब उस स्थिति का चित्रण करते हुए कहते हैं कि (नदं न भिन्नम्) - वह नदी जिसके कि किनारे टूट जाते हैं, जिस प्रकार भूमि पर बिखरी - सी पड़ी होती है, अर्थात् जिस प्रकार उसका जल इधर - उधर फैलकर नष्ट वेगवाला हो जाता है उसी प्रकार (अमुया शयानम्) - [नष्ट होकर] इस पृथिवी के साथ सोते हुए इस काम को (आपः) - कर्मों में लगी हुई प्रजाएँ [आपो वै नरसूनवः] (अति यन्ति) - लाँधकर पार हो जाती हैं । कोई समय था जबकि किनारों के अन्दर चलती हुई नदी के वेग के समान काम का वेग भी प्रबल था, परन्तु अब तो इन्द्र के क्रियाशीलतारूप वज्र के द्वारा इस वृत्र पर आघात करके इसके अवयवों को इधर - उधर फेंक दिया है । यह अब टूटे हुए किनारोंवाली नदी के समान हो गया है । इसके छिन्न हो चुके वेग को लाँघना अब कठिन नहीं रहा ।  २. इसके आक्रमण से अब तक प्रजाएँ दबी - सी हुई थीं, परन्तु अब इसके विनाश से (मनो रुहाणाः) - वे प्रजाएँ अपने मनो को फिर से उन्नति - पथ पर आरोहण करनेवाला बना पाई हैं । उनका मन अब दबा हुआ नहीं, अपितु खूब उत्साहयुक्त है । काम के आक्रमण से जो उन्नति रुकी हुई थी वह अब इस काम के विनाश से फिर दिन दूनी रात चौगुनी होने लगी है ।  ३. यह (वृत्रः) - काम (याः चित्) - जिनकी प्रजाओं को (महिना) - अपनी शक्ति की महिमा से (पर्यतिष्ठत्) - पूरी तरह से चारों ओर से घेर - घारकर टिका हुआ था, आज वह (अहिः) - [आहन्ति] आक्रमण करनेवाला काम (तासाम्) - उन्हीं प्रजाओं के (पत्सुतः शीः) - [पादस्याधः शयानः] पावों - तले सोनेवाला (बभूव) - हो गया है, अर्थात् आज उन प्रजाओं ने इस काम को पावों - तले कुचल दिया है । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - काम का पराजय होने पर प्रजाओं के मन पुनः उन्नति - पथ पर आरोहण करनेवाले बनते हैं । यह सिर पर चढ़नेवाला काम आज पाँवों - तले सोया पड़ा है । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(नदम्) महाप्रवाहयुक्तम् (न) इव (भिन्नम्) विदीर्णतटम् (अमुया) पृथिव्या सह (शयानम्) कृतशयनम् (मनः) अन्तःकरणमिव (रुहाणाः) प्रादुर्भवन्त्यबलन्त्योनद्यः (अति) अतिशयार्थे (यन्ति) गच्छन्ति (आपः) जलानि। आप इत्युदकनामसु पठितम्। निघं० १।१२। (याः) मेघमण्डलस्थाः (चित्) एव (वृत्रः) मेघः (महिना) महिम्ना। अत्र छान्दसोवर्णलोपोवा इतिमकारलोपः। (पर्यतिष्ठत्) सर्वत आवृत्यस्थितः (तासाम्) अपां समूहः (अहिः) मेघः (पत्सुतःशीः) यः पादेष्वधःशेते सः। अत्र सप्तम्यन्तात्पादशब्दात्। इतराभ्योपि दृश्यन्ते। अ० ५।३।१४। इति तसिल्। वाछन्दसिसर्वेविधयोभवन्ति इति विभक्त्यलुक्। शौङ्धातोःक्विप् च। (बभूव) भवति। अत्र लडर्थे लिट् ॥८॥

अन्वय:

पुनस्तौ परस्परं किं कुरुत इत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - भो महाराज त्वं यथायं वृत्रो मेघो महिना स्वमहिम्ना पर्यतिष्ठन्निरोधको भूत्वा सर्वतः स्थितोहिर्हतः सन् तासामपां मध्ये स्थितः पत्सुतःशीर्बभूव भवति तस्य शरीरं मनोरुहाणा याश्चिदेवान्तरिक्षस्था आपो भिन्नशयानं यन्ति गच्छन्ति नदं नेवामुया भूम्या सह वर्त्तन्ते तथैव सर्वान् शत्रून् बद्ध्वा वशं नय ॥८॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। यावज्जलं सूर्येण छेदितं वायुना सह मेघमण्डलं गच्छति तावत्सर्वं मेघ एव जायते यदा जलाशयोऽतीव वर्द्धते तदा सघनपृतनः सन् स्वविस्तारेण सूर्यज्योतिर्निरुणद्धि तं यदा सूर्यः स्वकिरणैश्छिनत्ति तदायमितस्ततो जलानि महानंद तडागं समुद्रं वा प्राप्य शेरते सोपि पृथिव्यां यत्र तत्र शयानः सन् मनुष्यादीनां पादाध इव भवत्येवमधार्मिकोप्येधित्वा सद्यो नश्यति ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like a flood let loose, the showers of rain, so soothing and beautiful to the mind, defy Vrtra, the cloud, which is now lying shattered on the ground — waters which, earlier, the cloud had held up with its own might. Their master now lies trampled under feet on the ground. (This is the fate of a presumptuous man who proudly and foolishly challenges the Almighty.)
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What do they ( Indra and Vritra) do is taught in the 8th Mantra.

अन्वय:

O great king, as the cloud with its greatness tries to cover the sun, and then vanquished by the sun, lies down recumbent on this earth, as a river bursts through its broken banks. This Ahi (cloud) has been prostrated beneath the feet of the waters that delight the minds of men and which Vritra (cloud) by its might had obstructed. In the same manner, you should subdue all your wicked enemies by captivating them.

पदार्थान्वयभाषाः - ( रुहाणा:) प्रादुर्भवन्त्यश्चलन्त्यो नद्यः, = Flowing rivers. (पत्सुतः) य: पदेष्वधः शेते सः । अत्र सप्तम्यन्तात् पादशब्दात् इतराभ्योऽपि दृश्यन्ते अष्टा ५.३.१४) इति तसिल् वा छन्दसि सर्वे विधयो भवन्तीति विभक्त्यलुक् । शीङ्धातो: क्विप् च ।। = Prostrated beneath the feet.
भावार्थभाषाः - The water that goes to the sky with air, disintegrated by the Sun, becomes cloud. When the tanks and rivers become full of water, the cloud covers the light of the sun. When the sun, smites it into pieces with his rays, then it enters the banks, big rivers or the sea and sleeps there (so to say ). It may be said that it is trampled under the feet of men. In the same manner, an un-righteous person goes to ruin, having grown much for some time.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा व उपमालंकार आहेत. जितके जल सूर्याद्वारे छिन्नभिन्न होऊन वायूबरोबर मेघमंडलात जाते ते सर्व मेघरूपच बनते. जेव्हा मेघाच्या जलाचा समूह खूप वाढतो तेव्हा मेघ दाट ढगांद्वारे सूर्याच्या प्रकाशाला झाकतो. त्याला सूर्य जेव्हा आपल्या किरणांनी छिन्नभिन्न करतो तेव्हा इकडे तिकडे पसरलेले जल मोठमोठ्या नद्या, तलाव व समुद्र इत्यादी स्थानी शयन करते व मेघही पृथ्वीवर येऊन जिकडे तिकडे शयन करतो. अर्थात माणसे इत्यादी प्राण्यांच्या पायात शयन केल्यासारखा दिसून येतो. तसे अधार्मिक माणूसही प्रथम वाढतो व नंतर लवकरच नष्ट होतो. ॥ ८ ॥