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अ॒यो॒द्धेव॑ दु॒र्मद॒ आ हि जु॒ह्वे म॑हावी॒रं तु॑विबा॒धमृ॑जी॒षम् । नाता॑रीदस्य॒ समृ॑तिं व॒धानां॒ सं रु॒जानाः॑ पिपिष॒ इन्द्र॑शत्रुः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ayoddheva durmada ā hi juhve mahāvīraṁ tuvibādham ṛjīṣam | nātārīd asya samṛtiṁ vadhānāṁ saṁ rujānāḥ pipiṣa indraśatruḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒यो॒द्धाइ॑व॑ । दुः॒मदः॑ । आ । हि । जु॒ह्वे । म॒हा॒वी॒रम् । तु॒वि॒बा॒धम् । ऋ॒जी॒षम् । न । अ॒ता॒री॒त् । अ॒स्य॒ । सम्ऋ॑तिम् । व॒धाना॑म् । सम् । रु॒जानाः॑ । पि॒पि॒षे॒ । इन्द्र॑शत्रुः॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:32» मन्त्र:6 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:37» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:6


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे कैसे युद्ध करते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - (दुर्मदः) दुष्ट अभिमानी (अयोद्धेव) युद्ध की इच्छा न करनेवाले पुरुष के समान मेघ (ऋजीषम्) पदार्थों के रस को इकट्ठे करने और (तुविबाधम्) बहुत शत्रुओं को मारनेहारे के तुल्य (महावीरम्) अत्यन्त बल युक्त शूरवीर के समान सूर्य्यलोक को (आजुह्वे) ईर्ष्या से पुकारते हुए के सदृश वर्त्तता है जब उसको रोते हुए के सदृश सूर्य ने मारा तब वह मारा हुआ (इन्द्रशत्रुः) सूर्य्य का शत्रु मेघ (पिपिषे) सूर्य से पिसजाता है और वह (अस्य) इस सूर्य की (बधानाम्) ताड़नाओं के (समृतिम्) समूह को (नातारीत्) सह नहीं सकता और (हि) निश्चय है कि इस मेघ के शरीर से उत्पन्न हुई (रुजानाः) नदियाँ पर्वत और पृथिवी के बड़े २ टीलों को छिन्न-भिन्न करती हुई बहती हैं वैसे ही सेनाओं में प्रकाशमान सेनाध्यक्ष शत्रुओं में चेष्टा किया करे ॥६॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे मेघ संसार के प्रकाश के लिये वर्त्तमान सूर्य के प्रकाश को अकस्मात् पृथिवी से उठा और रोक कर उसके साथ युद्ध करते हुए के समान वर्त्तता है तो भी वह मेघ सूर्य के सामर्थ्य का पार नहीं पाता जब यह सूर्य मेघ को मारकर भूमि में गिरा देता है तब उसके शरीर के अवयवों से निकले हुए जलों से नदी पूर्ण होकर समुद्र में जा मिलती हैं। वैसे राजा को उचित हैं कि शत्रुओं को मारके निर्मूल करता रहे ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इन्द्र - वृत्र - संग्राम

पदार्थान्वयभाषाः - १. (अयोद्धा इव) - यह कामवासना अप्रशस्त योद्धा की भाँति (दुर्मदः) - दुष्ट मदवाली होती हुई (महावीरम्) - उस महान् वीर इन्द्र को (हि) - निश्चय से (आजुह्वे) - युद्ध के लिए ललकारती है, उस इन्द्र को जो (तुविबाधम्) - महान् शत्रुओं का वाधन करनेवाला है तथा (ऋजीषम्) - [शत्रूणामपार्जकम्] शत्रुओं को दूर भगानेवाला है । इन्द्र, अर्थात् जितेन्द्रिय पुरुष के सम्मुख काम की क्या शक्ति ! परन्तु जैसे जो योद्धा जितना कम वीर होता है, वह उतना ही अधिक अभिमानवाला होता है, उसी प्रकार यह कामदेव भी उस इन्द्र के सम्मुख अत्यन्त तुच्छ स्थितिवाला है, तदपि गर्जता है, इसे अपनी प्रबल शक्ति का अत्यन्त गर्व है ।  २. परन्तु इसका यह सारा गर्व चूर - चूर हो जाता है जबकि इसे इस इन्द्र से टक्कर लेनी पड़ती है, यह (अस्य) - इस इन्द्र के (वधानाम्) - क्रियाशीलतारूप वज्रों के (समृतिम्) - संगम व सम्प्राप्ति को (न अतारीत्) - पार नहीं कर पाता, अर्थात् इन्द्र के अस्त्रों के प्रहार से यह अपने को बचा नहीं पाता ।  ३. (इन्द्रशत्रुः) - इन्द्र है शासन करनेवाला जिसका ऐसा वह 'वासनाओं का सेनानी' काम (संरुजानाः) - [रुजो भंगे] कामवासना के साथ ही रणांगण में भग्नीभूत व्यूहवाली, अतएव भाग खड़ी हुई वासनाओं को ही (पिपिषे) - पीस डालता है । काम के नष्ट होने पर अन्य वासनाएँ आप ही नष्ट हो जाती हैं । जैसे एक दुर्मद हस्ती रण में भाग खड़ा होने पर अपनी ही सेना को कुचलने लगता है, उसी प्रकार यह 'काम' इन्द्र से पराजित होकर अपनी ही सेना को पीस डालता है । काम के भाग खड़े होने पर क्रोधादि उसी पराजित व भागते हुए काम से पिस - पिसा जाते हैं । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम वस्तुतः इन्द्र बनें । शत्रुओं के भगानेवाले हम 'काम' पर प्रबल आक्रमण करें, यह नष्ट होता हुआ 'काम' अपने अन्य क्रोधादि साथियों को आप ही नष्ट कर दे । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(अयोद्धेव) न योद्धा अयोद्धा त्द्वत् (दुर्मदः) दुष्टो मदो यस्य सः (आ) समन्तात् (हि) खलु (जुह्वे) आह्वत वानस्मि वा छन्दसि सर्वेविधयो भवन्ती इत्युवङादेशो न। (महावीरम्) महांश्चासौ वीरश्च तमिव महाकर्षणप्रकाशादिगुणयुक्तं सूर्य्यलोकम् (तुविबाधम्) यो बहून् शत्रून् बाधते तम् (ऋजीषम्) उपार्जकम्। अत्र। अर्जेर्ऋज्च। उ० ४।२९। इत्यर्जधातोरीषन् प्रत्यय ऋजादेशश्च। (न) निषेधार्थे (अतारीत्) तरत्युल्लंङ्घयति वा। अत्र वर्त्तमाने लुङ्। (अस्य) सूर्यलोकस्य। (समृतिम्) संगतिम्। (बधानाम्) हननानाम् (सम्) सम्यगर्थे (रुजानाः) नद्यः। रुजाना इति नदीनामसु पठितम्। निघं० १।१३। (पिपिषे) पिष्टः। अत्र व्यत्ययेनात्मनेपदं च। (इन्द्रशत्रुः) इन्द्रः शचुर्यस्य वृत्रस्य सः ॥६॥

अन्वय:

पुनस्तौ कथं युध्येते इत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - यथा दुर्मदोऽयोद्धेवायं मेघ ऋजीषन्तु विबाधं महावीरमिन्द्रं सूर्यलोकमाजुह्वे यदा सर्वतो रुतवानिव हतोयमिन्द्रशत्रुः संपिपिषे स मेघोऽस्ये बधानां समृतिं नातःरीत्समंतान्नोल्लंघितवान् हि खल्वस्य वृत्रस्य शरीरादुत्पन्नारुजानाः नद्यः पर्वतपृथिव्यादि कूलान् छिन्दन्त्यश्चलन्ति तथा सेनासुविराजमानोऽध्यक्षः शत्रुषु चेष्टेत ॥६॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। यथा मेघोजगत्प्रकाशाय प्रवर्त्तमानस्य सूर्य्यस्य प्रकाशमकस्मादुत्थायावृत्य च तेन सह युद्ध्यत इव प्रवर्त्तते ऽपितुसूर्य्यस्य सामर्थ्य नालं भवति। यदायं सूर्येण हतो भूमौ निपतति तदातच्छरीरावयवेन जलेन नद्यः पूर्णाभूत्वा समुद्रं गच्छन्ति तथा राजा शत्रून् हत्वाऽस्तं नयेत् ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like a naive warrior gone mad, Vrtra, the cloud dared and challenged the sun, great and valiant Indra, vanquisher of many, reducing them to juice. But he could not take the force of the blows of Indra, failed and lay crushed. The streams flow over hills breaking down mounds of earth.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How do they (Indra and Vritra) fight is taught in the 6th Mantra.

अन्वय:

1. (Vritra) The cloud like a mad weak warrior, challenges Indra (the mighty sun) the destroyer of all darkness and helper by his light in earning much wealth. It has been crushed by the mighty sun. It has been unable to withstand the rays of the sun. The rivers born of this crushed cloud flow breaking the banks. A Commander of the army should behave like the mighty sun. He should smite down all his wicked foes vigorously and should attain reputation as a great hero, destroyer of his un- righteous enemies.

पदार्थान्वयभाषाः - ( तुविबाधम् ) यो बहून शत्रून् बाधते तम् = Destroyer of many ( enemies or clouds). (ऋजषम् ) उपार्जकम्, अत्र अर्जे र्ऋज् च ( उणा०४.२९) इत्यर्जधातोरीषन प्रत्ययः ऋजादेशश्च ( समृतिम् ) संगतिम् । = Association. (रुजाना: ) नद्यः, रुजाना इति नदीनामसु पठितम् । (निघ० १.१२) = Rivers.
भावार्थभाषाः - There is simile used in the Mantra. As the cloud fights with the sun giving light to the world and covers him for the time being, but cannot stand before the powerful sun for a long time; when destroyed by the sun, it falls down on the earth, then by the water which is a part of its body, the rivers are filled and they flow towards the sea; so should a king or a Commander of the army destroy his enemies with his might, so that they may never raise their heads.
टिप्पणी: तृवीति बहुनामसुपठितम् ( निघ० ३.१ ) = many समृतिम् ऋगतौ = To go.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसा मेघ जगत्प्रकाशक सूर्याच्या प्रकाशाला अकस्मात पृथ्वीवर झाकून टाकतो व त्याला रोखतो, त्याच्याबरोबर युद्ध केल्यासारखे वागतो. तरीही तो मेघ सूर्याच्या सामर्थ्याचा अंदाज घेऊ शकत नाही. जेव्हा हा सूर्य मेघाला मारतो व त्याचे भूमीवर पतन होते तेव्हा त्याच्या शरीराच्या अंगांपासून निघालेल्या जलधारांनी नदी पूर्ण भरते व ती वाहून समुद्राला मिळते. तसे राजाने शत्रूला मारून निर्मूल करावे. ॥ ६ ॥