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वृ॒षा॒यमा॑णोऽवृणीत॒ सोमं॒ त्रिक॑द्रुकेष्वपिबत्सु॒तस्य॑ । आ साय॑कं म॒घवा॑दत्त॒ वज्र॒मह॑न्नेनं प्रथम॒जा मही॑नाम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vṛṣāyamāṇo vṛṇīta somaṁ trikadrukeṣv apibat sutasya | ā sāyakam maghavādatta vajram ahann enam prathamajām ahīnām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वृ॒ष॒यमा॑णः । अ॒वृ॒णी॒त॒ । सोम॑म् । त्रिक॑द्रुकेषु । अ॒पि॒ब॒त् । सु॒तस्य॑ । आ । साय॑कम् । म॒घवा॑ । अ॒द॒त्त॒ । वज्र॑म् । अह॑न् । ए॒न॒म् । प्र॒थ॒म॒जाम् । अही॑नाम्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:32» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:36» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:3


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - जो (वृषायमाणः) वीर्य्यवृद्धि का आचरण करता हुआ सूर्य्यलोक मेघ के समान (सुतस्य) इस उत्पन्न हुए जगत् के (त्रिकद्रुकेषु) जिनकी उत्पत्ति स्थिरता और विनाश ये तीन कला व्यवहार में वर्त्तानेवाले हैं उन पदार्थों में (सोमम्) उत्पन्न हुए रस को (अवृणीत) स्वीकार करता (अपिबत्) उसको अपने ताप में भर लेता और (मघवा) यह बहुत सा धन दिलानेवाला सूर्य (सायकम्) शस्त्ररूप (वज्रम्) किरण समूह को (आदत्त) लेते हुए के समान (अहीनाम्) मेघों में (प्रथमजाम्) प्रथम प्रगट हुए (एनम्) इस मेघ को (अहन्) मारता है। वैसे गुण, कर्म, स्वभाव युक्त पुरुष सेनापति का अधिकार पाने योग्य होता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे बैल वीर्य को बढ़ा बलवान् हो सुखी होता है वैसे सेनापति दूध आदि पीकर बलवान् हो के सुखी होवे और जैसे सूर्य्य रस को पी अच्छे प्रकार वरसाता है वैसै शत्रुओं के बल कों खींच अपना बल बढ़ा के प्रजा में सुखों की वृष्टि करे ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

त्रिकद्रुकों में सोमपान

पदार्थान्वयभाषाः - १. (वृषायमाणः) - शक्तिशाली पुरुष की भांति आचरण करता हुआ, अर्थात् एक वीर पुरुष की भांति कायरता से ऊपर उठकर कार्यों को करता हुआ यह इन्द्र (सोमम्) - सोम को (अवृणीत) - वरता है, सोम के वरण का भाव सोम - शक्ति, वीर्य - प्राप्ति को अपनाने से है । इस शक्ति को अपनाकर ही वह बुद्धि की सूक्ष्मता का सम्पादन करता हुआ प्रभु का दर्शन करता है । एवं, इस सोम [शक्ति] के वरण से वह उस सोम [प्रभु] का भी वरण कर पाता है । यह इन्द्र (सुतस्य) - उत्पन्न हुए सोम का (त्रिकद्रुकेषु) - 'ज्योतिः गौः तथा आयु' नामक यज्ञों के चलने पर, अर्थात् जीवन का कार्यक्रम इस प्रकार बनाने पर कि [क] मैं स्वाध्याय के द्वारा निरन्तर ज्ञानज्योति का वर्धन करूंगा, [ख] मैं अपनी ज्ञानप्राप्ति की साधनभूत इन्द्रियों [गावः इन्द्रियाणि] को सदा क्रियाशील रखूंगा , [ग] तथा अपने जीवन को क्रियाशीलता के द्वारा [एति इति आयुः] दीर्घ बनाऊँगा, (अपिबत्) - पान करता है, सोम को शरीर में सुरक्षित करने के ये तीन साधन हैं - [क] स्वाध्याय, [ख] इन्द्रियों को अपने कार्य में लगाये रखना, [ग] तथा दीर्घ जीवन का संकल्प । ये तीन ही त्रिकद्रुक नामक यज्ञ हैं ।  २. यह (मघवा) - [मख - मय] यज्ञरूप ऐश्वर्यवाला इन्द्र (सायकम्) - [षोऽन्तकर्मणि] सब वासनाओं के अन्त करने पर (वज्रम्) - क्रियाशीलतारूप वन को (आदत्त) - हाथ में लेता है । (एनम्( - इस (अहीनाम्) - नाश करनेवालों में [आहन्ति] (प्रथमजाम्) - सबसे पूर्व उत्पन्न होनेवाले इस कामरूप शत्रु को (अहन्) - नष्ट कर देता है । सबसे प्रथम शत्रु काम ही है, अतः हम प्रभु - स्मरणपूर्वक कर्म करें - यही वासनाओं को जीतने का उपाय है, वासना को जीतने पर ही हम सोम का पान कर पाएंगे । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम हाथ में क्रियाशीलतारूप वज्र को लेकर काम का विध्वंस करें ताकि शरीर में सोम को सुरक्षित कर सकें । हमारा जीवन स्वाध्याय [ज्योति], इन्द्रियों की गतिमयता [गौः] तथा दीर्घायुष्य के संकल्प - [आयुः] - वाला हो । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(वृषायमाणः) वृष इवाचरन् (अवृणीत) स्वीकरोति। अत्र लडर्थे लङ (सोमम्) सूयत उत्पद्यते यस्तं रसम्। (त्रिकद्रु केषु) त्रय उत्पत्तिस्थितिप्रलयाख्याः कद्रवोविविधकला येषां तेषु कार्यपदार्थेषु। अत्र कदिधातोरौणादिकः क्रुन्प्रत्ययः। पुनः समासान्तः कप् च। (अपिबत्) स्वप्रकाशेन पिबति। अत्र लडर्थे लङ् (सुतस्य) उत्पन्नस्य जगतो मध्ये (आ) क्रियायोगे। (सायकम्) शस्त्रविशेषम् (मघवा) मघं बहुविधं पूज्यं धनं यस्य सः। अत्र भूम्न्यर्थे मतुप्। (अदत्त्) ददाति वा। अत्र वर्त्तमाने लङ्। (वज्रम्) किरणसमूहमिवास्त्रम् (अहन्) हन्ति। अत्र वर्त्तमाने लङ्। (एनम्) मेघम् (प्रथमजाम) प्रथमं जायते तम्। अत्र जनसन०। अ० ३।२।६७। अनेन जनधातोर्विट् प्रत्ययः। (अहीनाम्) मेघानाम् ॥३॥

अन्वय:

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - यथा वृषायमाण इन्द्रः सूर्य्यलोको मेघ इव सुतस्य त्रिकद्रु केषु सोमं रसमवृणीत स्वीकरोति अपिबत् पिबति मधवा सायकं वज्रमादत्ते वाहिनां प्रथमज्जमेनं मेघमहन् हन्ति। एतादृशगुणकर्मस्वभावपुरुषः सैनापत्यमर्हति ॥३॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। यथा वृषभो वीर्य्यवृद्धिं कृत्वा बलिष्ठो भूत्वा सुखी जायते तथैवायं सेनापतिः रसं पीत्वा बलीभूत्वा सुखी जायेत यथा सूर्यःस्वकिरणैर्जलमाकृष्यान्तरिक्षे स्थापयित्वा वर्षयति तथा शत्रुबलान्याकृष्य स्वबलमुन्नीय प्रजासुखान्यभिवर्षयेत् ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, generous lord of showers of light and rain, receives and drinks up the vital essences present in heaven, earth and sky, three regions of the created world. The sun, glorious possessor of heat and water, takes up the thunderbolt of electric energy and strikes and breaks up the first born of the dense clouds of vapours.$(So does the ruler hold and rule and enjoy the rule over his dominion. He takes up his forces and deploys them to destroy the worst of the nation’s enemies. And just as the sun is mighty and generous for the earth, so should the ruler be for his subjects and dominions.)
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is that Indra is further taught in the third Mantra.

अन्वय:

Impetuous like a bull, the Sun takes with his rays the sap of all substances in the world which have their birth, sustenance and disintegration like the cloud. He smites the first formed cloud with his rays. A person acting like the Sun and possessing 'sun-like vigor and splendor, deserves to be the commander of an army.

पदार्थान्वयभाषाः - [त्रिकद्रुकेषु] त्रयः उत्पत्तिस्थितिप्रलयाख्याः कद्रवः विविध कला येषां तेषु कार्यपदार्थेषु । अत्र कदिधातोः औणादिकः क्रन प्रत्ययः पुनः समासान्तः कप् च । = In the substances which have their birth, sustenance and disintegration. ( सुतस्य) उत्पन्नस्य जगतो मध्ये = In the world created by God. ( वज्रम् ) किरणसमूहम् इव अस्त्रम् = The band of weapons like the rays of the sun. [अहीनाम्] मेघानाम् = Of the clouds.
भावार्थभाषाः - There is Upamalankar or simile in this Mantra. As a bull' increasing his vitality becomes powerful and happy, in the same way, this commander of an army should become mighty by taking the juice of the fruits and other substances and enjoy happiness and health. As the Sun draws the water with his beams, keeps it in the firmament and causes it to rain, in the same manner, the commander of an army should draw out or lessen the power of his enemies, should cause to grow or develop the power of his own army and should shower happiness on the people.
टिप्पणी: Rishi Dayananda has interpreted महीनाम् here as मेवानाम् for which there is the clear authority of the Vedic Lexicon Nighantu 1.10 अहिरिति मेघनाम ( निघ० १.१० ) (सोमम्) = has been explained by the Rishi as. सूयते उत्पद्यते यस्तं रसम् = The sap or juice that is produced. It is derived from षू-प्रसवैश्वर्ययो: Here the first meaning of producing has been taken.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसा बैल वीर्यवृद्धी करून बलवान होतो व सुखी होतो तसेच सेनापतीने दुग्धपान इत्यादी करून बलवान व्हावे आणि सुखी व्हावे. जसे सूर्य जल प्राशन करून वृष्टी करतो तसे शत्रूचे बल कमी करून आपले बल वाढवून प्रजेच्या सुखाची वृद्धी करावी. ॥ ३ ॥