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इन्द्रो॑ या॒तोऽव॑सितस्य॒ राजा॒ शम॑स्य च शृ॒ङ्गिणो॒ वज्र॑बाहुः । सेदु॒ राजा॑ क्षयति चर्षणी॒नाम॒रान्न ने॒मिः परि॒ ता ब॑भूव ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indro yāto vasitasya rājā śamasya ca śṛṅgiṇo vajrabāhuḥ | sed u rājā kṣayati carṣaṇīnām arān na nemiḥ pari tā babhūva ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्रः॑ । या॒तः । अव॑सितस्य । राजा॑ । शम॑स्य । च॒ । शृ॒ङ्गिणः॑ । वज्र॑बाहुः । सः । इत् । ऊँ॒ इति॑ । राजा॑ । क्ष॒य॒ति॒ । च॒र्ष॒णी॒नाम् । अ॒रान् । न । ने॒मिः । परि॑ । ता । ब॒भू॒व॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:32» मन्त्र:15 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:38» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:15


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उक्त सूर्य कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - सूर्य के समान (वज्रबाहुः) शस्त्रास्त्रयुक्तबाहु (इन्द्रः) दुष्टों का निवारण कर्ता (यातः) गमन आदि व्यवहार को वर्त्तानेवाला सभापति ! (अवसितस्य) निश्चित चराचर जगत् (शमस्य) शान्ति करनेवाले मनुष्य आदि प्राणियों (शृङ्गिणः) सींगोंवाले गाय आदि पशुओं और (चर्षणीनाम्) मनुष्यों के बीच (अरान्) पहियों को धारनेवाले (नेमिः) धुरी के (न) मान (राजा) प्रकाशमान होकर (ता) उत्तम तथा नीच कर्मों के कर्त्ताओं सुख दुःखों को तथा (राजांसि) उक्त लोकों को (परिक्षयति) पहुंचाता और निवास करता है (उ) (इत्) वैसे ही (सः) वह सभी के (राजा) न्याय का प्रकाश करनेवाला (बभूव) होवे ॥१५॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में उपमालङ्कार और पूर्व मंत्र से (रजांसि) इस पद की अनुवृत्ति आती है। राजा को चाहिये कि जैसे रथ का पहिया धुरियों को चलाता और जैसे यह सूर्य चराचर शांत और अशांत संसार में प्रकाशमान होकर सब लोकों को धारण किये हुए उन सभों को अपनी-२ कक्षा में चलाता है जैसे सूर्य के विना अति निकट मूर्त्तिमान् लोक की धारणा आकर्षण प्रकाश और मेघ की वर्षा आदि काम किसी से नहीं हो सकते हैं। वैसे धर्म से प्रजा को पालन किया करें ॥१५॥ इस सूक्त में सूर्य और मेघ के युद्ध वर्णन करने से इस सूक्त की पिछले सूक्त में प्रकाशित किये अग्नि शब्द के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह पहिले अष्टक के दूसरे अध्याय में अड़तीसवां वर्ग और पहिले मण्डल के सातवें अनुवाक में बत्तीसवां सूक्त और दूसरा अध्याय भी समाप्त हुआ ॥३२॥ इति श्रीमत्परिव्राजकाचार्य श्रीविरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण दयानन्दसरस्वतीस्वामिनो विरचिते संस्कृतभाषार्य्याभाषाभ्यां विभूषिते सुप्रमाणयुक्ते वेद भाष्ये द्वितीयोऽध्यायः पूर्त्तिमगमत् ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शासक व रक्षक प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र में कहा था कि तेरी वासनाओं का संहार करनेवाला तेरा वह मित्र प्रभु ही है । उस प्रभ के लिए कहते हैं कि (इन्द्रः) - सब ऐश्वर्यों का स्वामी वह प्रभु (यातः) - जंगम तथा (अवसितस्य) - एक स्थान में बद्ध अर्थात् स्थावरः सब चराचर जगत् का (राजा) - स्वामी है तथा उनको व्यवस्थित करनेवाला है [राज् - to regulate]|  २. (सः) - वह (वज्रबाहुः) - [वज् गतौ] वज्रहस्त प्रभु ही, स्वाभाविकी क्रियावाले प्रभु ही (शमस्य) - शान्त स्वभाववाले प्राणियों के (च श्रृङ्गिणः) - और सींगवाले, अर्थात् क्रूर व अभिमानी पुरुषों के (इत्) - निश्चय से (राजा) - शासन करनेवाले हैं ।  ३. ये प्रभु ही (चर्षणीनाम्) - सब श्रमशील मनुष्यों को (क्षयति) - [अन्तर्भावितण्यर्थः] उत्तम निवास देनेवाले हैं । वस्तुतः उन सबकी गतियों के स्रोत भी वे प्रभु हैं ; कार्य करने की सब शक्ति उस प्रभु से ही प्राप्त होती है ।  ४. (अरान् न नेमिः) - जिस प्रकार (नेमि) - हाल अरों के चारों ओर होकर उनकी रक्षा की जाती है, इसी प्रकार वे प्रभु (ताः) - उन सब प्रजाओं को (परिबभूव) - चारों ओर से व्यापन करनेवाले हैं । वे प्रभु ही सबके रक्षक हैं । प्रभु से रक्षित होने पर हमारा नाश हो ही कैसे सकता है ? वासनाएँ भी हमपर आक्रमण कैसे कर सकती हैं ऋरध? 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - वे प्रभु ही चराचर के राजा हैं । वे हमारे उत्तम निवास का कारण हैं और हमारे रक्षक हैं । 
टिप्पणी: विशेष - इस सूक्त में इन्द्र के वीरतापूर्ण कार्यों का वर्णन है । इन्द्र का सर्वमहान् कार्य यही है कि उसने 'वासना' का विनाश किया है, अविद्या के प्रवाहों को विदीर्ण कर दिया है [१] । वासनाओं को नष्ट करनेवाली प्रजाएँ प्रभु को प्राप्त करती हैं [२] । काम के विनाश से ही ज्ञान के सूर्य का प्रकाश प्रकट होता है [४] । वृत्र की माता अविद्या इस इन्द्र के द्वारा नष्ट की जाती है [९] । जीवात्मा का मित्र प्रभु है । वस्तुतः वह प्रभु ही जीव के लिए वासना का विनाश करता है [१४] । इस वासना - विनाश के द्वारा प्रभु ही कर्मशील मनुष्यों को उत्तम निवास प्राप्त कराते हैं [१५] । इसलिए अगले सूक्त में 'हिरण्यस्तूप' इस प्रभु की ही आराधना करता है -
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(इन्द्रः) सूर्यलोक इव सभासेनापती राज्यं प्राप्तः (यातः) गमनादिव्यवहारप्रापकः (अवऽसितस्य) निश्चितस्य चराचरस्य जगतः (राजा) यो राजते दीप्यते प्रकाशते सः (शमस्य) शाम्यन्ति येन तस्य शान्तियुक्तस्य मनुष्यस्य (च) समुच्चये (शृङ्गिणः) शृङ्गयुक्तस्य गवादेः पशुसमूहस्य (वज्रबाहुः) वज्रः शस्त्रसमूहो बाहौ यस्य सः (सः) (इत्) एव (उ) अप्यर्थे (राजा) न्यायप्रकाशकः सभाध्यक्षः (क्षयति) निवासयति गमयति वा (चर्षणीनाम्) मनुष्याणाम्। (अरान्) चक्रावयवान् (न) इव (नेमिः) रथाङ्गम् (परि) सर्वतोऽर्थे (ता) तानि यानि जगतो दुष्टानि कर्माणि पूर्वोक्ताँल्लोकान्वा। अत्र शेश्छन्दसि बहुलम् इति शेर्लोपः। (बभूव) भवेः। अत्र लिङर्थे लिट् ॥१५॥

अन्वय:

पुनः सूर्यः कीदृश इत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - सूर्य्य इव वज्रबाहुरिन्द्रो यातः सभापतिरवसितस्य शमस्य शङ्गिणश्चर्षणीनां च मध्येऽरान्नेमिर्नेव ता तानि रजांसि परिक्षयति स चेदु-उतापि सर्वेषां राजा बभूव भवतु ॥१५॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। अत्र पूर्वमन्त्रात् रजांसीति पदमनुवर्त्तते। राजा यथा रथचक्रमरान् धृत्वा चालयति यथायं सूर्य्यश्चराचरस्य शान्ताशान्तस्य जगतो मध्ये प्रकाशमानः सन् सर्वाँल्लोकान् धरन् स्वस्वकक्षासु चालयति न चैतस्माद्विना कस्यचित्संनिहितस्य मूर्त्तिमतो लोकस्य धारणाकर्षणप्रकाशमेघवर्षणादीनि कर्माणि संभवितुमर्हन्ति तथा धर्मेण राज्यं पालयेत् ॥१५॥ अत्रेन्द्रवृत्रयुद्धालङ्कारवर्णनेनास्य पूर्वसूक्तोक्ताग्निशब्दार्थेन सह संगतिरस्तीति वेदितव्यम् ॥ इति प्रथमस्य द्वितीयेऽष्टात्रिंशो वर्गः ३८ प्रथम मण्डले सप्तमेऽनुवाके द्वात्रिंशं च सूक्तमध्यायश्च द्वितीयः समाप्तः ॥२॥ श्रीमत्परिव्राजकाचार्य श्रीविरजानन्दसरस्वतीस्वामिनांशिष्येण दयानन्दसरस्वतीस्वामिनाविरचिते संस्कृत भाषार्थ भाषाभ्यां विभूषिते सुप्रमाणयुक्त ऋग्वेदभाष्ये द्वितीयोऽध्यायः पूर्त्तिमगमत् ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of thunder force of arms, is the ruler and illuminator of the moving world, settled and peaceful humanity and the animals. The same ruler holds and sustains the order of humanity and the world together and keeps it going.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is the sun is taught in the fifteenth Mantra.

अन्वय:

The President of the Assembly who like the sun is shining among all men of peaceful nature and of horned creatures like the cattle, wielder of the thunderbolt and other weapons in his arms, king of the whole world-moving and un-moving, causing or controlling the movement of all, containing all as spokes within the felly, be our protector.

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) सूर्यलोकः इव सभासेनापतिः राज्यं प्राप्तः = The President of the Assembly or Commander of the army shining like the Sun. (अवसितस्य) निश्चितस्य चराचरस्य जगतः ॥ = Of the world moving and un-moving. (राजा) न्यायप्रकाशक : सभाध्यक्षः = The President of the Assembly as dispenser of justice. (क्षयति) निवासयति गमयति = Controls or moves.
भावार्थभाषाः - There is Upamalankara or simile used in this Mantra. As the felly moves the spokes, as the Sun shining in the whole universe whether peaceful or otherwise, upholding all worlds, causes them to move in their axis and without him the sustenance, attraction, heat and rain etc. are not possible, so the king or the President of the Assembly should rule over all righteously. This hymn is connected with the previous hymn as there is figurative description of the battle between Indra (sun) and Vritra (cloud) or good and evil here Here ends the 32nd hymn and the seventh Anuvaka of the 1st Mandala and the second chapter.
टिप्पणी: क्षि-निवास गत्योः राजृ-दीप्तौ Sayanacharya and other orthodox commentators take this hymn to be the description of the battle between Indra (the Chief of the Gods) and Vritra (a demon). Prof. Wilson and Griffith have also followed them, only mentioning in their foot-notes the allegorical or figurative nature of this fight between the Sun and the cloud. Rishi Dayananda has given both the natural senses as battle between the Sun and the cloud, and also a political sense representing Indra as a righteous President of the Assembly or सभाध्यक्षः the Commander of the army सेनाध्यक्ष: fighting against un-righteous and wicked persons represented by Vritra or Ahi-men of serpent like nature. It is worthwhile to note how Shri Madhvacharya and his follower-Raghavendra Yati have given a spiritual interpretation to the words used in the Mantras of this hymn besides orthodox or Pauranik interpretation which can not be accepted by rationalists. अहिनामादैत्यो लोकोपद्रवाय पर्वतेषु नदीद्वाराणि रुद्धवा मेघपतितं चोदकम् अन्तरिक्षे प्रतिबध्य स्थितः-तं हत्वा इन्द्रः नद द्वाराणि विवृत्य प्रवाहाय उदकमार्ग खनितवान् ( राघवेन्द्र यती मन्त्रार्थ मंजर्या श्री माध्वभाष्यानुसारिण्याम् ) || = The spiritual interpretation given by Shri Madavacharya and explained by Raghavendra Yati of some important words of this hymn is as follows- (अहिम्) हीति निश्चयवाचिस्यात् इति वचनान्निश्चय विरोधिनम्-भक्तानां संशयम् । = The doubt in the minds of the devotees. ( इन्द्रस्य ) प्रसिद्धस्य, वासुदेवस्य वाम० ४ ( इन्द्र ) परमेश्वर (पर्वतानाम् ) जन्माख्य पर्ववतां जीवानाम् = Of the souls. ( वज्रम् ) ज्ञानाख्यवज्रम् = Weapon of knowledge. ( समुद्रम् ) समुद्रिक्तं देवं प्रति = To God, the Ocean of virtues. (सोमः) मनः = Peaceful mind (त्रिकद्रुकेषु) बुद्धयादिस्थानेषु = In three places like the intellect (सायकम्) अविद्यादीनां लयकृत् ज्ञानम् = Knowledge that dispels ignorance. (वृत्रम्) वृत्रं नाम दैत्यम् अज्ञानम् = A demon named Vritra or ignorance. ( मायिनाम् ) मायावादिनाम् = Of illusionists. (सूर्यम्) ज्ञानहेतुम् आचार्यम् = Preceptor ( उषसम् ) ज्ञानम = Wisdom( द्याम् ) मोक्षम् = Liberation (वृततरम् ) वृतादधिकं वृततरनामकं च दैत्यं, मिथ्याज्ञानं वा (कुलिशेन) वज्रेण, अध्यात्मंतु कुलमस्यास्तीति कुली ब्रह्म ज्ञानी, स्वकुलस्य सुखहेतुतया कुली इत्युच्यते तस्य कुलिनः शं सुखं यस्माद् भवति तेन कुलिशेन ज्ञानेन = By thunderbolt or knowledge. (पृथिव्याः) बुद्धेः = of the intellect Some of these meanings are very significant and suggestive from the spiritual point of view which has been almost ignored by Shri Sayanacharya and Western Scholars. Though Rishi Dayananda has given natural and political interpretation of the Mantras, he has given the spiritual meanings for some of these words. For instance, in his commentary on the Rigveda 1.30.11 he has interpreted वज्र and वज्रिन् as वज्रः अविद्यानिवारक: प्रशस्तो बोधोविद्यते यस्य तत्सम्बुद्धौ । अत्र व्रजेत्यर्थात् ज्ञानार्थं औणादिको रन् तत: प्रशंसायां मतुनथेँ इनिः ॥ = In his commentary on Rig. 1.30.12 also he has interpreted वज्रिन् as वज्र :- सर्वदुः खनाशको बहुविधो दृढोषोधो यस्यास्तीति तत्सम्बुद्धौ । In both these places Rishi Dayananda has taken वज्र to mean knowledge which dispels all ignorance and misery. In his commentary on Rig. 4. 18.11 interpreted वृत्रम्' as मेघमिवाविद्याम् i.e. ignorance like the cloud. Thus we find that Rishi Dayananda's interpretation is very comprehensive giving natural, political, social and spiritual significance of the Vedic words.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. पूर्व मंत्राने (रजांसि) या पदाची अनुवृत्ती होते. जसे रथाच्या चक्रामुळे आरी चालते व जसे सूर्य चराचर शांत-अशांत जगात प्रकाशमान होऊन सर्व गोलांना धारण करून आपापल्या कक्षेत फिरवितो. जसे सूर्याशिवाय जवळ असलेल्या प्रत्यक्ष गोलांची धारणा, आकर्षण, प्रकाश व मेघवृष्टी इत्यादी कामे दुसऱ्या कुणाकडून होऊ शकत नाहीत, तसेच राजाने धर्माने प्रजेचे पालन करावे. ॥ १५ ॥