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दा॒सप॑त्नी॒रहि॑गोपा अतिष्ठ॒न्निरु॑द्धा॒ आपः॑ प॒णिने॑व॒ गावः॑ । अ॒पां बिल॒मपि॑हितं॒ यदासी॑द्वृ॒त्रं ज॑घ॒न्वाँ अप॒ तद्व॑वार ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

dāsapatnīr ahigopā atiṣṭhan niruddhā āpaḥ paṇineva gāvaḥ | apām bilam apihitaṁ yad āsīd vṛtraṁ jaghanvām̐ apa tad vavāra ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दा॒सप॑त्नीः॒ । अहि॑गोपाः । अ॒ति॒ष्ठ॒न् । निरु॑द्धाः । आपः॑ । प॒णिना॑इव । गावः॑ । अ॒पाम् । बिल॑म् । अपि॑हितम् । यत् । आसी॑त् । वृ॒त्रम् । ज॒घ॒न्वान् । अप॑ । तत् । व॒वा॒र॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:32» मन्त्र:11 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:38» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:11


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर सूर्य उस मेघ के प्रति क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सभापते ! (पाणिनेव) गाय आदि पशुओं के पालने और (गावः) गौओं को यथायोग्य स्थानों में रोकनेवाले के समान (दासपत्नीः) अति बल देनेवाला मेघ जिनका पति के समान और (अहिगोपाः) रक्षा करनेवाला है वे (निरुद्धाः) रोके हुए (आपः) (अतिष्ठन्) स्थित होते हैं उन (अपाम्) जलों का (यत्) जो (बिलम्) गर्त्त अर्थात् एक गढ़े के समान स्थान (अपहितम्) ढ़ापसा रक्खा (आसीत्)* उस (वृत्रम्) मेघ को सूर्य (जघन्वान्) मारता है मारकर (तत्) उस जल की (अपववार) रुकावट तोड़ देता है वैसे आप शत्रुओं को दुष्टाचार से रोक के न्याय अर्थात् धर्ममार्ग को प्रकाशित रखिये ॥११॥ जल अर्थ छूट गया है। सं० *है अर्थ छूट गया है। सं०
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे गोपाल अपनी गौओं को अपने अनुकूल स्थान में रोक रखता और फिर उस स्थान का दरवाजा खोल के निकाल देता है और जैसे मेघ अपने मंडल में जलों का द्वार रोक के उन जलों को वश में रखता है वैसे सूर्य्य उस मेघ को ताड़ना देता और उस जल की रुकावट को तोड़ के अच्छे प्रकार उसे बरसाता है वैसे ही राजपुरुषों को चाहिये कि शत्रुओं को रोकेकर प्रजा का यथायोग्य पालन किया करें ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कैद में रखना, न कि रहना

पदार्थान्वयभाषाः - १. पिछले मन्त्र की समाप्ति इन शब्दों पर हुई थी कि यह भस्मीभूत काम घने अँधेरे में पड़ा है और हमें सावधान रहना चाहिए कि यह कहीं जाग न जाए; यदि यह जाग जाता है तो हमारा अधिपति बन जाता है और हमारा नाश ही कर देता है, अतः मन्त्र में कहते हैं कि (दासपत्नीः) - [दसु उपक्षये] सबके क्षय का कारणभूत यह वृत्र जब हमारा पति बन जाता है और यह (अहिगोपाः) - सबका हनन करनेवाला 'अहि' नामक काम ही हमें अपने कैदखाने में रखनेवाला होता है, तो ये दासपत्नी अहिगोपा (आपः) - प्रजाएँ [आपो वै नरसूनवः] (निरुद्धाः) - इस काम से कैद की हुई (अतिष्ठन्) - रहती हैं, उसी प्रकार इस काम की कैद में वे रहती हैं (इव( - जैसे कि (गावः पणिना) - गौवें किसी बणिये से बाड़े में रोकी जाती हैं ।  २. (अपां बिलम्) - इन प्रजाओं का इस काम के ऊदखाने का द्वार (यत्( - जो (अपिहितम्) - वृत्र के द्वारा बन्द किया हुआ (आसीत्) - था, (तत्) - उस ब्रह्मद्वार को (अपववार) - वही पुरुष खोल पाता है जो (वृत्रं जघन्वान्) - इस वृत्र [कामदेव] को नष्ट करता है । वृत्र के नाश से ही हम इसके कैदखाने से मुक्त हो सकते हैं । वृत्र के साथ किसी समझौते की आशा करना व्यर्थ है । यह तो जागते ही हमें मारेगा ।  ३. मरा हुआ यह काम हमारे जीवन का कारण होगा; तब यह प्रेम में परिणत होकर हमारी स्वाध्याय व यज्ञादि की रुचि का साधन होगा - 'काम्यो हि वेदाधिगमः कर्मयोगश्च वैदिकः' । यदि तनिक भी यह जीवित हुआ तो हमें मार डालेगा । इसीलिए मनु कहते हैं कि 'कामात्मता न प्रशस्ता' काममय हो जाना अच्छा नहीं । इसकी कैद में न रहकर इसे कैद में रखना ही ठीक है । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - काम ध्वंसक है, घातक है । इसकी कैद से निकलना ही ठीक है । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(दासपत्नीः) दास आश्रयदाता पतिर्यासां ताः। अत्र सुपांसुलुग इति पूर्वसवर्णादेशः। (अहिगोपाः) अहिना मेघेन गोपा गुप्ता अच्छादिताः (अतिष्ठन्) तिष्ठन्ति। अत्र वर्त्तमाने लङ्। (निरुद्धाः) संरोधं प्रापिताः (आपः) जलानि (पणिनेव) गोपालेन वणिग्जनेनेव (गावः) पशवः (अपाम्) जलानाम् (विलम्) गर्त्तम् (अपिहितम्) आच्छादितम् (यत्) पूर्वोक्तम् (आसीत्) अस्ति। अत्र वर्त्तमाने लङ्। (वृत्रम्) सूर्यप्रकाशावरकं मेघम् (जघन्वान्) हन्ति। अत्र वर्त्तमाने लिट्। (अप) दूरीकरणे (तत्) द्वारम् (ववार) वृणोत्युद्घाटयति। अत्र वर्त्तमाने लिट् यास्कमुनिरिमं मंत्रमेवं व्याचष्टे दासपत्नीर्दासाधिपत्न्यो दासो दस्यते रूपं *दासयति कर्म्माण्यहिगोपा अतिष्ठन्नहिना गुप्ताः। अहिरवनादेत्यन्तरिक्षे ऽयमपीतरोऽहिरेतस्मादेव निर्ह्वसितोपसर्ग आहंतीति। निरुद्धा आपः पणिनेव गावः। पणिर्वणिग्भवति पणिः पणनाद्वणिक् पण्यं नेनेक्ति। अपां बिलमपिहितं यदासीत्। बिलं भरं भवति बिभर्त्तेवृत्रं जघ्निवानपववार। निरु० २।१७। ॥११॥ *[वै० यं० निरुक्ते ‘रूपदासयतीति’ पाठो वर्तते।सं०]

अन्वय:

पुनः सूर्यस्तं प्रति किं करोतीत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सभापते यथा पणिनेव गावो दासपत्न्योऽहिगोपा येन वृत्रेण निरुद्धा आपोऽतिष्ठन् तिष्ठन्ति तासामपां यद्बिलमपिहितमासीदस्ति तं सविता जघन्वान् हन्ति हत्त्वा तज्जलगमनद्वारमपववारापवृणोत्युद्घाटयति तथैव दुष्टाचाराञ् शत्रून्निरुध्य न्यायद्वारं प्रकाशितं रक्ष ॥११॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। यथा गोपालः स्वकीया गाः स्वामीष्टे स्थाने निरुणद्धि पुनर्द्वारं चोद्घाट्य मोचयति यथा वृत्रेण मेघेन स्वकीयमण्डलेऽपां द्वारमावृत्य ता वशं नीयन्ते यथा सूर्यस्तं मेघं ताडयति तज्जलद्वारमपावृत्यापोविमोचयति तथैव राजपुरुषैः शत्रून्निरुध्य सततं प्रजाः पालनीयाः ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like women supported by their husbands, the waters stay supported by the cloud, hidden in its darkness like cows in the stall guarded by the cowherd or the trader. The water-hold that was hidden and closed was opened and released through the door by the slayer of Vrtra, Indra, the sun.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What does the Sun do towards the cloud is taught further in the 11th Mantra.

अन्वय:

O President of the Assembly, as the cows are confined by the cowherd or a trader in a cowshed, the waters, whose husband is the cloud by which they are covered, stand obstructed, but by slaying Vritra (Cloud), Indra (the Sun) sets open the cave that confines them and after he (Sun) has killed the cloud, he sets open the door of their going out, in which the floods had been imprisoned, in the same manner, you should captivate and keep in prison un-righteous enemies and should keep open always the door of justice.

पदार्थान्वयभाषाः - ( दासपत्नी:) दास आश्रयदाता पतिर्यासां ताः । = Waters whose husband (cloud) is giver of shelter to them (अहिगोपाः) अहिना मेघेन गोपाः-गुप्ता: आच्छादिताः = Covered by the cloud. विलम्-गर्तम् = Pit or hole. (वृत्रम्) सूर्यप्रकाशावरकं मेघम् = The cloud which covers the light of the sun. (पणिना) गोपालेन वणिग्जनेन वा = By cowherd or a trader. पण-व्यवहारे = A dealer.
भावार्थभाषाः - As a cowherd keeps his cows confined for some time in a suitable place and sets them free by opening the door of the cowshed, as by Vritra ( cloud) the waters are kept under control (so to speak ) by imprisoning them in a way, as the Sun destroys the cloud and sets free the imprisoned waters by opening their door, in the same way, the officers of the state should captivate and keep under subjugation their un-righteous enemies and should constantly guard and preserve their subjects.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमा व वाचकलुप्तोपमालंकार आहेत. जसा गोपाल आपल्या गाईंना नियंत्रणाखाली योग्य स्थानी ठेवतो व नंतर बाहेर काढतो, जसे मेघ जलाला नियंत्रणात ठेवतात व सूर्य मेघांना प्रताडित करतो व अडथळा नष्ट करून वृष्टी करवितो तसेच राजपुरुषांनी शत्रूंना ताब्यात ठेवावे व प्रजेचे यथायोग्य पालन करावे. ॥ ११ ॥