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अति॑ष्ठन्तीनामनिवेश॒नानां॒ काष्ठा॑नां॒ मध्ये॒ निहि॑तं॒ शरी॑रम् । वृ॒त्रस्य॑ नि॒ण्यं वि च॑र॒न्त्यापो॑ दी॒र्घं तम॒ आश॑य॒दिन्द्र॑शत्रुः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

atiṣṭhantīnām aniveśanānāṁ kāṣṭhānām madhye nihitaṁ śarīram | vṛtrasya niṇyaṁ vi caranty āpo dīrghaṁ tama āśayad indraśatruḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अति॑ष्ठन्तीनाम् । अ॒नि॒वे॒श॒नाना॑म् । काष्ठा॑नाम् । मध्ये॑ । निहि॑तम् । शरी॑रम् । वृ॒त्रस्य॑ । नि॒ण्यम् । वि । च॒र॒न्ति॒ । आपः॑ । दी॒र्घम् । तमः॑ । आ । अ॒श॒य॒त् । इन्द्र॑शत्रुः॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:32» मन्त्र:10 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:37» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:10


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उस मेघ का शरीर कैसा और कहाँ स्थित होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सभा स्वामिन् ! तुम को चाहिये कि जिस (वृत्रस्य) मेघ के (अनिवेशनानाम्) जिनको स्थिरता नहीं होती (अतिष्ठन्तीनाम्) जो सदा बहनेवाले हैं उन जलों के बीच (निण्यम्) निश्चय करके स्थिर (शरीरम्) जिसका छेदन होता है ऐसा शरीर है वह (काष्ठानाम्) सब दिशाओं के बीच (निहितम्) स्थित होता है। तथा जिसके शरीर रूप (अपः) जल (दीर्घम्) बड़े (तमः) अन्धकार रूप घटाओं में (विचरन्ति) इधर-उधर जाते आते है वह (इन्द्रशत्रुः) मेघ उन जलों में इकट्ठा वा अलग-२ छोटा-२ बदल रूप होके (अशयत्) सोता है। वैसे ही प्रजा के द्रोही शत्रुओं को उनके सहायियों के सहित बांध के सब दिशाओं सुलाना चाहिये ॥१०॥
भावार्थभाषाः - इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सभापति को योग्य है कि जैसे यह मेघ अन्तरिक्ष में ठहरानेवाले जलों में सूक्ष्मपन में नहीं दीखता फिर जब घन के आकार वर्षा के द्वारा जल का समुदाय रूप होता है तब वह देखने में आता है और जैसे वे जल एक क्षणभर भी स्थिति को नहीं पाते हैं किन्तु सब काल में ऊपर जाना वा नीचे आना इस प्रकार घूमते ही रहते हैं और जो मेघ के शरीर रूप हैं वे अन्तरिक्ष में रहते हुए अति सूक्ष्म होने से नहीं दीख पड़ते वैसे बड़े-२ बलवाले शत्रुओं को भी अल्प बलवाले करके वशीभूत किया करे ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

न ठहरना, न बैठना

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र में वृत्र की मृत्यु का वर्णन किया गया था । यह मरकर भी तो विद्यमान रहता है - इस बात का वर्णन प्रस्तुत मन्त्र में करते हैं । कामदेव भस्म होकर भी है ही । इस (वृत्रस्य) - कामदेव का (शरीरम्) - यह मृत शरीर (अतिष्ठन्तीनाम्) - अपने कार्यक्रम में न रुकती हुई, अर्थात् निरन्तर अपनी दैनिकचर्या में लगी हुई (अनिवेशनानाम्) - [उपवेशनरहितानां - सा०] न बैठ जानेवाली (काष्ठानाम्) - [काष्ठा - दिशः - तत्रस्थाः प्रजाः] इन विस्तृत दिशाओं में स्थित प्रजाओं के (मध्ये) - अन्दर (निण्यम्) - [निर्नामधेयम् - नि० अन्तर्हितम्] छिपा हुआ (निहितम्) - रखा है, अर्थात् कामदेव नष्ट हो गया । अब उसका स्वरूप दिखता तो नहीं, परन्तु इसे एकदम मृत समझ लेना भी भूल है, यह काम तो अन्तर्निहित - सा हुआ [प्रसुप्त चेतना में Subconscious spirit में] अन्दर है ही । यह (इन्द्रशत्रुः) - जितेन्द्रिय पुरुष जिसका नष्ट करनेवाला है, ऐसा कामदेव (दीर्घ तमः) - घने अँधेरे में, अर्थात् अत्यन्त दबी हुई अवस्था में (आशयत्) - शरीर में निवास कर रहा है ।  २. यह फिर से प्रबुद्ध न हो जाए इस दृष्टिकोण से (आपः) - व्यापक कर्मों में लगनेवाली प्रजाएँ (विचरन्ति) - विशेषरूप से कर्म करती हैं । ये प्रजाएँ जानती हैं कि जबतक हम अन्य कर्मों में लगी रहेंगी तब तक यह 'काम' सुप्त रहेगा । सो ये न तो ठहरती हैं न बैठती हैं, अपितु कार्य में लगी ही रहती हैं । ठहरी व बैठी और काम जगा । क्रिया ही काम का विध्वंसक अस्त्र है । कर्म ही काम का कृन्तन करता है, इसलिए प्रभु ने जीव से कहा कि (कर्मासि) - तू तो कर्म ही है, कर्म नहीं तो तू भी नहीं, तब तो यह 'काम' तेरा काम - तमाम कर देगा । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम उत्तम कार्यों में लगे रहें ताकि यह 'काम' भस्म बना हुआ अत्यन्त अन्धकार में ही पड़ा रहे, जाग न जाए । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

(अतिष्ठन्तीनाम्) चलन्तीनामपाम् (अनिवेशनानाम्) अविद्यमानं निवेशनमेकत्रस्थानं यासां तासाम् (काष्ठानाम्) काश्यन्ते प्रकाश्यन्ते यासु ता दिशः। काष्ठा इति दिङ्नामसु पठितम्। निघं० १।६। अत्र हनिकुषिना० उ० २।२। इति क्थन् प्रत्ययः। (मध्ये) अन्तः (निहितम्) स्थापितम् (शरीरम्)। शीर्यते हिंस्यते यत्तत (वृत्रस्य) मेघस्य (निण्यम्) निश्चितान्तार्हितम्। निण्यमिति निर्णीतांतर्हितनामसु पठितम्। निघं० ३।२५। (वि) (चरन्ति) विविधतया गच्छंत्यागच्छन्ति (अपः) जलानि (दीर्घम्) महान्तम् (तमः) अन्धकारम् (आ) समन्तात् (अशयत्) शेते। बहुलं छन्दसि इति शपोलुङ् न। (इन्द्रशत्रुः) इन्द्रः शत्रुर्यस्य स मेघः यास्कमुनिरेवमिमं मंत्रं व्याचष्टे। अतिष्ठतीनामनिविशमानानामित्यस्यावराणां काष्ठानां मध्ये निहितं शरीरं मेघः। शरीरं शृणातेः शम्नातेर्वा। वृत्रस्य निण्यं निर्णामं विचरन्ति विजानंत्याप इति दीर्घ द्राघतेस्तमस्तनीते राशयदा शेतेरिन्द्रशत्रु रिंद्रोऽस्यशमयिता वा शातयिता वा तस्मादिन्द्रशत्रुस्तत्का वृत्रोमेघ इति नैरुक्ताः। निरु० २।१६। ॥१०॥

अन्वय:

पुनस्तस्य शरीरं कीदृशं क्व तिष्ठतीत्युपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - भोः सभेश त्वया यथा यस्य मेघस्य निवेशनानामतिष्ठन्तीनामपां निण्यं शरीरं काष्टानां दिशां मध्ये निहितमस्ति यस्य च शरीराख्या आपो दीर्घं तमो विचरन्ति स इन्द्रशत्रुर्मेघस्तासामपां मध्ये समुदायावयविरूपेणाशयत्समन्ताच्छेते तथा प्रजायाः द्रोग्धारः ससहायाश्शत्रवो बध्वा काष्ठानां मध्ये शाययितव्याः ॥१०॥
भावार्थभाषाः - अत्रवाचकलुप्तोपमालङ्कारः। सभापतेर्योग्यमस्ति यथाऽयं मेघोऽन्तरिक्षस्थास्वप्सु सूक्ष्मत्वान्न दृश्यते पुनर्यदा घनाकारो वृष्टिद्वारा जलसमुदायरूपो भवति तदा दृष्टिपथमागच्छति। परन्तु या इमा आप एकं क्षणमपि स्थितिं न लभन्ते किन्तु सर्वदैवोपर्यधोगच्छन्त्यागच्छन्ति च याश्च वृत्रस्य शरीरं वर्तन्ते ता अन्तरिक्षेस्थिता अतिसूक्ष्मा नैव दृश्यन्ते। तथा महाबलान् शत्रून् सूक्ष्मबलान् कृत्वा वशं नयेत् ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - In the non-stop ever flowing streams of the tracks of the sky is diffused the mysterious body of Vrtra, the cloud, in the deepest dark. The same rival of Indra which covered the sun now lies flat on earth and the water-streams flow (open and beautiful).$(Indra, the ruler, should strike the hidden forces which cover the light of the order, condense them and make them flow out openly for the good of the nation.)
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is the body of that Vritra (Cloud) and where does it stand is taught further in the 10th Mantra.

अन्वय:

O President of the Assembly, as the nameless hidden body of the never-stopping, never resting currents of the Vritra (Cloud) lies in the midst of various directions and whose body in the form of the waters is covered by long-lasting darkness (is in un-conscious and inanimate state ), that Vritra (Cloud) the enemy of the Sun lies among the waters on all sides) in the same manner, all enemies of the people (who come in the way of their real progress) should be captivated along with all their helpmates and should be kept in prisons.

पदार्थान्वयभाषाः - (निण्यम् ) निश्चितान्तर्हितम् । नियमिति निर्णीतान्तर्हितनामसु पठितम (निघ० ३.२५ ) = Hidden or secret. (काष्ठानाम् ) काश्यन्ते प्रकाश्यन्ते यासु ता दिशः काष्ठा इतिदिङ्नाम पठितम् । (निघ० १.६) अत्र हनि कुषिनी उणा २.२ इति क्थन् प्रत्ययः || = Directions. (अनिवेशनानाम्) अविद्यमानंनिवेशनम् एकत्र स्थानं यासां तासाम् । = Never stopping at a place.
भावार्थभाषाः - It is the duty of the President of the Assembly, to minimize the force of the mighty enemies and keep them under his subjection. As the cloud is not visible when it is lying among the waters of the sky in subtle form, but then through rain it takes a concrete form as a mass of waters, it becomes visible. But these waters which never stop for a moment, but always go up and down below and which form the body of the Vritra (Cloud) are not seen in the firmament, as they are very subtle, similarly the mighty foes should be overcome by making their power less and less day by day.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. अंतरिक्षात असलेले मेघ सूक्ष्मतेमुळे जलाच्या रूपात दिसत नाहीत; परंतु जेव्हा ते घनाचा आकार घेतात तेव्हा वृष्टीद्वारे जलाचा समुदाय दिसून येतो. जसे जल एक क्षणभरही स्थिर राहत नाही तर सर्वकाळी वर-खाली फिरत असते; परंतु मेघाचे रूप धारण केले जाते तेव्हा अतिसूक्ष्मतेमुळे ते दिसत नाही. तसे सभापतीने प्रचंड बल असणाऱ्या शत्रूंनाही नामोहरम करून वशीभूत करावे. ॥ १० ॥