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सं यन्मदा॑य शु॒ष्मिण॑ ए॒ना ह्य॑स्यो॒दरे॑। स॒मु॒द्रो न व्यचो॑ द॒धे॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

saṁ yan madāya śuṣmiṇa enā hy asyodare | samudro na vyaco dadhe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सम्। यत्। मदा॑य। शु॒ष्मिणे॑। ए॒ना। हि। अ॒स्य॒। उ॒दरे॑। स॒मु॒द्रः। न। व्यचः॑। द॒धे॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:30» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:28» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:3


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह किस प्रकार का है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पदार्थान्वयभाषाः - मैं (हि) अपने निश्चय से (मदाय) आनन्द और (शुष्मिणे) प्रशंसनीय बल और ऊर्जा जिस व्यवहार में हो, उसके लिये (समुद्रः) (न) जैसे समुद्र (व्यचः) अनेक व्यवहार (न) सैकड़ों हजार गुणों सहित (यत्) जो क्रिया हैं, उन क्रियाओं को (सन्दधे) अच्छे प्रकार धारण करूं॥३॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे समुद्र के मध्य में अनेक गुण, रत्न और जीव-जन्तु और अगाध जल है, वैसे ही अग्नि और जल के सकाश से प्रयत्न के साथ बहुत प्रकार का उपकार लेना चाहिये॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शक्ति , हर्ष व विशालता

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र में वर्णित 'सोम' वह है (यत्) - जो कि (शुष्मिणे) - शत्रुशोषक बलवाले पुरुष के लिए (सं मदाय) - उत्कृष्ट हर्ष के लिए होता है , अर्थात् यह सोम उसे बलवान् बनाता है और हर्ष प्राप्त कराता है । इस सोम के रक्षण के अभाव में , भोग - विलास के कारण इसकी अधोगति होने पर न तो हममें शक्ति रहती है , न उल्लास ; जीवन का सब आनन्द समाप्त हो जाता है ।  २. (एना हि) - इस सोम के द्वारा ही (अस्य उदरे) - इसके मध्यदेश में , अर्थात् हृदयान्तरिक्ष में (समद्रो न) - समुद्र के समान (व्यचः) - विस्तार (दधे) - धारण किया जाता है । जैसे समद्र विशाल है , उसी प्रकार इसका हृदय विशाल होता है ।     
भावार्थभाषाः - भावार्थ - सोम के सुरक्षित होने पर हम बल , हर्ष व विशालता को अपने में धारण करते हैं । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥

अन्वय:

अहं हि खलु मदाय शुष्मिणे समुद्रो व्यचो नो वाऽस्येन्द्राख्यस्याग्नेरुदर एना एनेन शतेन सहस्रेण च गुणैः सह वर्त्तमाना यत् याः क्रियाः सन्ति ताः सन्दधे॥३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सम्) सम्यगर्थे (यत्) याः (मदाय) हर्षाय (शुष्मिणे) शुष्मं प्रशस्तं बलं विद्यते यस्मिन् व्यवहारे तस्मै। शुष्ममिति बलनामसु पठितम्। (निघं०२.९) अत्र प्रशंसार्थ इनिः। (एना) एनेन शतेन सहस्रेण वा। अत्र सुपां सुलुग्० इत्याकारादेशः। (हि) खलु (अस्य) इन्द्राख्यस्याग्नेः (उदरे) मध्ये (समुद्रः) जलाधिकरणः (न) इव (व्यचः) विविधं जलादिवस्त्वञ्चन्ति ताः। अत्र व्युपपदादञ्चेः क्विन् ततो जस्। (दधे) धरेयम्॥३॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। यथा समुद्रस्योदरेऽनेके गुणा रत्नानि सन्त्यगाधं जलं वास्ति तथैवाग्नेर्मध्येऽनेके गुणा अनेकाः क्रिया वसन्ति। तस्मान्मनुष्यैरग्निजलयोः सकाशात् प्रयत्नेन बहुविध उपकारो ग्रहीतुं शक्य इति॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For the creation of life’s joy and for the development of food and energy for life, I take on these hundreds of powers of Indra implicit in the potentials of fire, water and electricity just like the jewels hidden in the depths of the wide wide sea.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

For mighty delight, I unite many water-creating processes which are there in this Agni (fire) which is also called Indra, within which there are hundreds or even thousands of attributes as there are hundreds of jewels within the ocean.

पदार्थान्वयभाषाः - ( मदाय ) हर्षाय = For delight. (शुष्मिणे) शुष्मं प्रशस्तं बलं विद्यते यस्मिन् व्यवहारे तस्मै । शुष्ममिति बलनामसु पठितम् ( निघ० २.९ ) अत्र प्रशंसार्थ इनिः ॥ = For mighty dealing. ( अस्य) इन्द्राख्यस्य अग्नेः = Of the fire known as Indra also. (व्यच:) विविधं जलादि वस्तु अंचन्ति ताः । अत्र व्युपपदादंचे: क्विन् ततो जस् । = Pervading water and various other things.
भावार्थभाषाः - There is Upamalankar or simile in this Mantra. As in the ocean, there is deep infinite water and there are many jewels and attributes, in the same way, in the fire, there are many attributes and there are many processes. Therefore by the conjunction of the fire and water, men can take various benefits with laboure.
टिप्पणी: Here Rishi Dayananda has taken Indra which is the devata or subject matter of the Mantra to mean Agni (fire) for which the following is the clear authority. अथ यत्रैतत् प्रदीप्तो भवति उच्चैधूमः परमया जूत्या बल्बलीति तर्हि हैष: ( अग्निः ) भवति इन्द्रः ॥ ( शतपथ ब्राह्मणे २.३.२.११ ) । = Which clearly denotes that bright Agni (fire) is called Indra.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसे समुद्रात अनेक गुण असतात तसेच रत्ने, जीवजंतू आणि अगाध जल असते. अग्नीतही अनेक गुण व क्रिया असतात, त्यासाठी माणसांनी अग्नी व जलाच्या साह्याने प्रयत्नपूर्वक त्यांचा अनेक प्रकारे उपयोग करून घ्यावा. ॥ ३ ॥