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त्वं त्येभि॒रा ग॑हि॒ वाजे॑भिर्दुहितर्दिवः। अ॒स्मे र॒यिं नि धा॑रय॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvaṁ tyebhir ā gahi vājebhir duhitar divaḥ | asme rayiṁ ni dhāraya ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम्। त्येभिः॑। आ। ग॒हि॒। वाजे॑भिः। दु॒हि॒तः॒। दि॒वः॒। अ॒स्मे इति॑। र॒यिम्। नि। धा॒र॒य॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:30» मन्त्र:22 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:31» मन्त्र:7 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:22


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसी है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे काल के माहात्म्य को जाननेवाले विद्वान् (त्वम्) तू जो (दिवः) सूर्य किरणों से उत्पन्न हुई उनकी (दुहितः) लड़की के समान प्रातःकाल की वेला (त्येभिः) उसके उत्तम अवयव अर्थात् दिन महीना आदि विभागों से वह हम लोगों को (वाजेभिः) अन्न आदि पदार्थों के साथ प्राप्त होती और धनादि पदार्थों की प्राप्ति का निमित्त होती है, उससे (अस्मे) हम लोगों के लिये (रयिम्) विद्या, सुवर्णादि धनों को (निधारय) निरन्तर ग्रहण कराओ और (आगहि) इस प्रकार इस विद्या की प्राप्ति कराने के लिये प्राप्त हुआ कीजिये कि जिससे हम लोग भी समय को निरर्थक न खोवें॥२२॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य कुछ भी व्यर्थ काल नहीं खोते, उन का सब काल सब कामों की सिद्धि का करनेवाला होता है॥२२॥इस मन्त्र में पिछले सूक्त के अनुषङ्गी (इन्द्र) (अश्वि) और (उषा) समय के वर्णन से पिछले सूक्त के अनुषङ्गी अर्थों के साथ इस सूक्त के अर्थ की संगति जाननी चाहिये।
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शक्ति व सम्पत्ति

पदार्थान्वयभाषाः - १. अयि (दिवः दुहितः) - द्युलोक व सूर्य की पुत्री - आकाश का पूरण करने [दुहप्रपूरणे] - वाली उषः ! (त्वम्) - तू (त्येभिः) - उन प्रसिद्ध (वाजेभिः) - शक्तियों व धनों के साथ (आगहि) - हमें प्राप्त हो और (अस्मे) - हमारे लिए (रयिम्) - धन का (निधारय) - निश्चय से धारण कर अथवा नम्रता के साथ धारण कर ।  २. उषः काल सूर्योदय होने के बिल्कुल प्रारम्भिक समय में आता है मानो यह उषा उस सूर्य की पुत्री ही है । यह स्वाध्यायशील पुरुष में ज्ञान के प्रकाश को परिपूर्ण करनेवाली है [दिवः दुहिता]  ३. यह शक्तियों को प्राप्त कराती है । इस समय सोये रह जानेवाले पुरुषों के तेज को सूर्य अपहत कर लेता है [उद्यन् सूर्य इव सुप्तानां द्विषतां वर्च आददे] ४. यह हममें उत्कृष्ट धनों का धारण करनेवाली है । इस समय उठकर ठीक से तैयार होकर मनुष्य पुरुषार्थ में लगता है और उत्तमवृत्ति से धनार्जन करने में प्रवृत्त होता है । यह इस धन के साथ नम्रता को नष्ट नहीं होने देती । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उषः जागरण से शक्ति [वाजेभिः] प्राप्त होती है । ज्ञान बढ़ता है [दिवः दुहिता] ऐश्वर्य की वृद्धि होती है । 
टिप्पणी: विशेष—इस सूक्त का प्रारम्भ इस प्रकार होता है कि प्रभु जितेन्द्रिय पुरुष को सोम से सिक्त कर देते हैं [१] । यह उसके लिए आनन्द की नाव के समान होता है [४] । यह सोम का रक्षण करनेवाला पुरुष प्रभु के साथ इस प्रकार बात करता है जैसे पुत्र पिता से मिलकर [६] जितना - जितना यह प्रभु के सम्पर्क में आता है उतनी - उतनी प्रभु इसकी शक्ति को बढ़ाते हैं [७] । यह भक्त चाहता तो यह है कि इसे एकमात्र प्रभु - प्राप्ति की ही कामना हो [११] । वे प्रभु उसे वे अन्न व धन प्राप्त कराएँ जिनको वह सबके साथ मिलकर सेवन करे [१३] । इस प्रकार जीवन बिताता हुआ यह समानरूप से शरीर , मन व मस्तिष्क की उन्नति कर पाता है [१८] । इसके शरीर - रथ का चक्र उस अगम्य प्रभु के परमपद [मूर्धन्] पर जाकर ही विश्रान्त होता है [१९] । यह सदा उषः काल में जागता है । इस ब्राह्ममुहूर्त में प्रभु का ही स्मरण करता है [२१] । इस स्मरण से इसे शक्ति व सम्पत्ति प्राप्त होती है [२२] । इस प्रभु - स्मरण से वासना - विनाश के द्वारा यह अपने हिरण्य - वीर्य की स्तूप - ऊर्ध्वगति करनेवाला बनकर अंग - अंग में रसवाला आंगिरस बनता है और यह "हिरण्यस्तूप" आंगिरस प्रभु का आराधन निम्न शब्दों में प्रारम्भ करता है -  
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः सः कीदृशीत्युपदिश्यते॥

अन्वय:

हे कालमाहात्म्यवित् विद्वंस्त्वं या दिवो दुहितर्दुहितोषाः संसाधिता सती त्येभिः कालावयवैरस्मे अस्मान् वाजेभिरन्नादिभिश्च सहानन्दाय समन्तात् प्राप्नोति तथाऽस्मभ्यं रयिर्निधारय धारय नित्यं सम्पादयैवमागहि सर्वथा तद्विद्यां ज्ञापय यतो वयमपि कालं व्यर्थं न नयेम॥२२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (त्वम्) कालकृत्यवित् (त्येभिः) शोभनैः कालावयवैः सह। अत्र बहुलं छन्दसि इति भिस ऐस् न। (आ) समन्तात् (गहि) प्राप्नुहि। अत्र बहुलं छन्दसि इति शपो लुक्। (वाजेभिः) अन्नादिभिः पदार्थैः। अत्रापि पूर्ववद् भिस ऐस् न। (दुहितः) दुहिता पुत्रीव। दुहिता दुर्हिता दूरे हिता दोग्धेर्वा। (निरु०३.४) (दिवः) दिवो द्योतनकर्मणामादित्यरश्मीनाम्। (निरु०१३.२५) अनेन सूर्यप्रकाशस्य दिव इति नामास्ति। (अस्मे) अस्मभ्यम् (रयिम्) विद्यासुवर्णादिधनम् (नि) नितरां क्रियायोगे (धारय) सम्पादय॥२२॥
भावार्थभाषाः - ये मनुष्याः कालं व्यर्थं न नयन्ति तेषां सर्वः कालः सर्वकार्यसिद्धिप्रदो भवति नेतरेषामिति॥२२॥अत्र पूर्वसूक्तोक्तविद्यानुषङ्गिणामिन्द्राश्व्युषसामर्थानां प्रतिपादनात् पूर्वसूक्तार्थेनैतत् सूक्तार्थस्य सङ्गतिरस्तीति बोध्यम्॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Come, daughter of the light of Heaven, with all the light and speed and message of time and space. Bear all the wealth and knowledge and bring us the blessings of the Divine.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is the Usha (Dawn) is further taught in the 22nd Mantra.

अन्वय:

O learned person who know the value of Time, the Usha (dawn) who is like the daughter of the sun approaches us with days and months and with food and other articles. you come and nourish us by all means with the parts of time and give us that knowledge by which we may never waste our time.

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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे थोडाही वेळ व्यर्थ घालवीत नाहीत त्यांचा संपूर्ण काळ कामाची सिद्धी करण्यात जातो. ॥ २२ ॥
टिप्पणी: या मंत्राच्याच मागच्या सूक्ताच्या अनुषंगी (इन्द्र) (अश्वि) व (उषा) या वेळेच्या वर्णनाने मागच्या सूक्ताच्या अनुषंगी अर्थाबरोबर या सूक्ताच्या अर्थाची संगती जाणली पाहिजे. ॥