व॒यं हि ते॒ अम॑न्म॒ह्यान्ता॒दा प॑रा॒कात्। अश्वे॒ न चि॑त्रे अरुषि॥
vayaṁ hi te amanmahy āntād ā parākāt | aśve na citre aruṣi ||
व॒यम्। हि। ते॒। अम॑न्महि। आ। अन्ता॑त्। आ। प॒रा॒कात्। अश्वे॑। न। चि॒त्रे॒। अ॒रु॒षि॒॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर उस वेला को कैसी जाननी चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
यज्ञ - भजन - स्वाध्याय
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनः सा कीदृशी ज्ञातव्येत्युपदिश्यते॥
हे विद्वन् ! यथा वयं या चित्रेऽरुष्यद्भुतता रक्तगुणाढ्यास्ति तामन्तादाभिमुख्यात् समीपस्थाद् देशादापराकाद् दूरदेशाच्चाश्वेनामन्महि तथा त्वमपि विजानीहि॥२१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How is Usha and how is she to be known is taught further in the 21st Mantra.
O learned person, as we the knowers of the value of time know the dawn which is wonderful, brilliant and red hued from far and near like the rider on a trained horse, so you should also know.
