स॒मा॒नयो॑जनो॒ हि वां॒ रथो॑ दस्रा॒वम॑र्त्यः। स॒मु॒द्रे अ॑श्वि॒नेय॑ते॥
samānayojano hi vāṁ ratho dasrāv amartyaḥ | samudre aśvineyate ||
स॒मा॒नऽयो॑जनः। हि। वा॒म्। रथः॑। द॒स्रौ॒। अम॑र्त्यः। स॒मु॒द्रे। अ॒श्वि॒ना॒। ईय॑ते॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वे किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
समविकास - अमर्त्यता व प्रभु - प्राप्ति
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते॥
हे दस्रौ मार्गगमनपीडोपक्षेतारावश्विना अश्विनौ विद्वांसौ ! यो वां युवयोर्हि खलु समानयोजनोऽमर्त्यो रथः समुद्र ईयते यस्य वेगेनाश्वावत्या शवीरया गत्या समुद्रस्य पारावारौ गन्तुं युवां शक्नुतस्तं निष्पादयतम्॥१८॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How are the Ashvinau is further taught in the 18th Mantra.
O destroyers of the suffering of journey, O learned expert artists, your balanced Chariot or conveyance goes to the sea and the sky without men-drivers. Manufacture such a vehicle by whose speedy movement you can go to the end of the sea without any difficulty.
