वांछित मन्त्र चुनें

रे॒वती॑र्नः सध॒माद॒ इन्द्रे॑ सन्तु तु॒विवा॑जाः। क्षु॒मन्तो॒ याभि॒र्मदे॑म॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

revatīr naḥ sadhamāda indre santu tuvivājāḥ | kṣumanto yābhir madema ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

रे॒वतीः॑। नः॒। स॒ध॒ऽमादे॑। इन्द्रे॑। स॒न्तु॒। तु॒विऽवा॑जाः। क्षु॒ऽमन्तः॑। याभिः॑। मदे॑म॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:30» मन्त्र:13 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:30» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:13


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

उसमें क्या-क्या स्थापन करके सब मनुष्यों को सुखयुक्त होना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पदार्थान्वयभाषाः - (क्षुमन्तः) जिनके अनेक प्रकार के अन्न विद्यमान हैं, वे हम लोग (याभिः) जिन प्रजाओं के साथ (सधमादे) आनन्दयुक्त एक स्थान में जैसे आनन्दित होवें, वैसे (तुविवाजाः) बहुत प्रकार के विद्याबोधवाली (रेवतीः) जिनके प्रशंसनीय धन हैं, वे प्रजा (इन्द्रे) परमैश्वर्य के निमित्त (सन्तु) हों॥१३॥
भावार्थभाषाः - यहाँ वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को सभाध्यक्ष सेनाध्यक्ष सहित सभाओं में सब राज्य विद्या और धर्म के प्रचार करनेवाले कार्य स्थापन करके सब सुख भोगना वा भोगाना चाहिये और वेद की आज्ञा से एक से रूप स्वभाव और एकसी विद्या तथा युवा अवस्थावाले स्त्री और पुरुषों की परस्पर इच्छा से स्वयंवर विधान से विवाह होने योग्य हैं और वे अपने घर के कामों में तथा एक-दूसरे के सत्कार में नित्य यत्न करें और वे ईश्वर की उपासना वा उस की आज्ञा तथा सत्पुरुषों की आज्ञा में सदा चित्त देवें, किन्तु उक्त व्यवहार से विरुद्ध व्यवहार में कभी किसी पुरुष वा स्त्री को क्षणभर भी रहना न चाहिये॥१३॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सधमाद अन्न व धन

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र के अनुसार (इन्द्रे) - उस प्रभु के हमारे होने पर , जब प्रभु की ही कामना करेंगे और प्रभु को अपनाएँगे तब (रेवतीः) - प्रशस्त धनोंवाले (तुविवाजः) - प्रभूत अन्न (नः) - हमारे (सन्तु) - हों , जो अन्न कि (सधमादः) - साथ मिलकर हमें आनन्द देनेवाले हों , अर्थात् जिन अन्नों व धनों को हम स्वयं ही सारा - का - सारा खा न जाएँ , औरों के साथ बाँटकर ही उसका उपभोग करें ।  २. ये अन्न (क्षुमन्तः) - भूखवाले हों अर्थात् इन अन्नों का हम इस रूप में सेवन करें कि इनके अतियोग से हमारी भूख ही न समाप्त हो जाए । ये अन्न ऐसे हों कि (याभिः) - जिनसे नीरोग रहते हुए हम (मदेम) - हर्ष का अनुभव करें । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु - प्रवण व्यक्ति को वे अन्न व धन प्राप्त होते हैं जिनका वह औरों के साथ मिलकर उपभोग करता है और जो अन्न व धन उसे अपने में आसक्त कर अतियोग से रुग्ण नहीं कर देते , परिणामतः उनसे वह आनन्द को ही प्राप्त करता है । 
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

तस्मिन्किं किं स्थापयित्वा सर्वैः सुखयितव्यमित्युपदिश्यते॥

अन्वय:

यथा क्षुमन्तो वयं याभिः प्रजाभिः सधमादे मदेम तुविवाजा रेवतीः रेवत्यः प्रजा इन्द्रे परमैश्वर्ये नियुक्ताः सन्तु॥१३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (रेवतीः) रयिः शोभा धनं प्रशस्तं विद्यते यासु ताः (प्रजाः)। अत्र प्रशंसार्थे मतुप्। रयेर्मतौ बहुलम्। (अष्टा०वा०६.१.३७) अनेन सम्प्रसारणम्। छन्दसीर इति मस्य वत्वम्। सुपां सुलुग्० इति पूर्वसवर्णादेशश्च। (नः) अस्माकम् (सधमादे) मादेनानन्देन सह वर्त्तमाने। अत्र सधमादस्थयोश्छन्दसि। (अष्टा०६.३.९६) इति सहस्य सधादेशः। (इन्द्रे) परमैश्वर्ये (सन्तु) भवन्तु (तुविवाजाः) तुवि बहुविधो वाजो विद्याबोधो यासां ताः (क्षुमन्तः) बहुविधं क्ष्वन्नं विद्यते येषां ते। अत्र भूम्न्यर्थे मतुप्। क्ष्वित्यन्ननामसु पठितम्। (निघं०२.७) (याभिः) प्रजाभिः (मदेम) आनन्दं प्राप्नुयाम॥१३॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैः ससभासेनाध्यक्षेषु सभासत्सु सर्वाणि राज्यविद्याधर्मप्रचारकराणि कार्य्याणि संस्थाप्य प्रशस्तं सुखं भोज्यं भोजयतिव्यं च वेदाज्ञया समानविद्यारूपस्वभावानां युवावस्थानां स्त्रीपुरुषाणां परस्परानुमत्या स्वयंवरो विवाहो भवितुं योग्यस्ते खलु गृहकृत्ये परस्परसत्कारे नित्यं प्रयतेरन् सर्व एते परमेश्वरस्योपासने तदाज्ञायां सत्पुरुषसभाज्ञायां च सदा वर्त्तेरन् नैतद्भिन्ने व्यवहारे कदाचित् केनचित्पुरुषेण कयाचित् स्त्रिया च क्षणमपि स्थातुं योग्यमस्तीति॥१३॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May our people, wives and children be rich in wealth, knowledge and grace of culture, so that we, abundant and prosperous, may rejoice with them and live with them in happy homes in a state of honour and glory.
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

May our people be rich in strength and knowledge obedient to the Lord, enjoying together, so that wealthy in food and full of devotion, we may rejoice.

पदार्थान्वयभाषाः - (रेवती:) रयि: शोभा धनं प्रशस्तं विद्यते यासु ताः प्रजाः । अत प्रशंसार्थे मतुप् रयेर्मतौ बहुलम् (अष्टा० ६.१.३७) अनेन सम्पसारणम् । छन्दसीर इति मस्य वत्वम् । सुपां सुलुक् इति पूर्वसवर्णादेशश्च । = The subjects or people possessing good wealth.( सधमादे ) मदेन आनन्देन सह वर्तमाने । अत्र सघमा दस्थयोश्छन्दसि ( अष्टा० ६.३.९६ ) इति सहस्य सधादेशः । = In delightful dealing. (तुविवाजा:) तुवि बहु विधः वाजः-विद्याबोधो यासां ताः = Full of knowledge of various subjects. ( क्षुमन्तः) बहुविधं क्षु-अन्नं विद्यते येषां ते । अत्र भूम्त्यर्थे मतुप् क्षु इत्यन्ननामसु पठितम् ( निघ० २.७) = Full of or endowed with abundant food.
भावार्थभाषाः - Men should appoint the members of the assembly along with the president and the Commander of the Army for the works connected with administration, dissemination of knowledge and propagation of Dharma and thus enjoy admirable happiness themselves and allow others to do so. According to the injunctions of the Vedas, young men and women should marry with mutual consent and of their own accord. After marriage, they should respect each other and should discharge Comes tic duties jointly. All of them should be engaged in meditation on God and acting according to His commandments, and according to the orders of good men and assemblies. It is not proper to behave in violation of these instructions on the part of any man or woman.
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - येथे वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. माणसांनी सभाध्यक्ष सेनाध्यक्षासहित सभेमध्ये सर्व राज्य विद्या व धर्माचा प्रचार करणारे कार्य करून सर्व सुख भोगावे व भोगवावे. वेदाच्या आज्ञेप्रमाणे एकसारखे रूप, स्वभाव, विद्या असणाऱ्या तरुण स्त्री-पुरुषांनी परस्पर इच्छेने स्वयंवर विधान करून विवाह करणे योग्य आहे. त्यांनी आपल्या घराच्या कामात साह्य करून एकमेकांचा सत्कार करण्याचा प्रयत्न करावा. ईश्वराची उपासना व आज्ञा पाळण्यात तसेच सत्पुरुषांच्या आज्ञा पाळण्यात तत्पर असावे. वरील व्यवहाराविरुद्ध कोणत्याही स्त्री-पुरुषाने कधी वागू नये. ॥ १३ ॥