तं त्वा॑ व॒यं वि॑श्ववा॒रा शा॑स्महे पुरुहूत। सखे॑ वसो जरि॒तृभ्यः॑॥
taṁ tvā vayaṁ viśvavārā śāsmahe puruhūta | sakhe vaso jaritṛbhyaḥ ||
तम्। त्वा॒। व॒यम्। वि॒श्व॒ऽवा॒र॒। आ। शा॒स्म॒हे॒। पु॒रु॒ऽहू॒त॒। सखे॑। व॒सो॒ इति॑। ज॒रि॒तृऽभ्यः॑॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब ईश्वर की प्रार्थना के विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
घर की याद
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथोक्तस्येश्वरस्य प्रार्थनाविषय उपदिश्यते॥
हे विश्ववार पुरुहूत वसो सखे जगदीश्वर ! पूर्वप्रतिपादितं त्वां वयं जरितृभ्य आशास्महे भवद्विज्ञानप्रकाशमिच्छाम इति यावत्॥१०॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
Now the subject of the prayer to God is taught.
We desirous of Thy communion, long for thee O God, invoked by many, present in all beings and things and their Support, Chosen by all as Dispenser of Justice and our Friend. Be gracious to Thy righteous learned praises or devotees.
