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आ व॒ इन्द्रं॒ क्रिविं॑ यथा वाज॒यन्तः॑ श॒तक्र॑तुम्। मंहि॑ष्ठं सिञ्च॒ इन्दु॑भिः॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā va indraṁ kriviṁ yathā vājayantaḥ śatakratum | maṁhiṣṭhaṁ siñca indubhiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ। वः॒। इन्द्र॑म्। क्रिवि॑म्। य॒था॒। वा॒ज॒ऽयन्तः॑। श॒तऽक्र॑तुम्। मंहि॑ष्ठं सि॒ञ्चे॒। इन्दु॑ऽभिः॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:30» मन्त्र:1 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:28» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:1


स्वामी दयानन्द सरस्वती

इसके पहले मन्त्र में इन्द्र शब्द से शूरवीरों के गुणों का प्रकाश किया है॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे सभाध्यक्ष मनुष्य ! (यथा) जैसे खेती करनेवाले किसान (क्रिविम्) कुएँ को खोद कर उसके जल से खेतों को (सिञ्च) सींचते हैं और जैसे (वाजयन्तः) वेगयुक्त वायु (इन्दुभिः) जलों से (शतक्रतुम्) जिससे अनेक कर्म होते हैं (मंहिष्ठम्) बड़े (इन्द्रम्) सूर्य को सींचते, वैसे तू भी प्रजाओं को सुखों से अभिषिक्त कर॥१॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य पहिले कुएँ को खोद कर उसके जल से स्नान-पान और खेत बगीचे आदि स्थानों के सींचने से सुखी होते हैं, वैसे ही विद्वान् लोग यथायोग्य कलायन्त्रों में अग्नि को जोड़ के उसकी सहायता से कलों में जल को स्थापन करके उनको चलाने से बहुत कार्य्यों को सिद्ध करके सुखी होते हैं॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इन्द्र - क्रिवि - शतक्रतु - मंहिष्ठ

पदार्थान्वयभाषाः - १. प्रभु अपने इन सुपुत्र जीवों से कहते हैं कि (वाजयन्तः) - [शतृ नदी , स्त्रैणादिक शतृ प्रत्यय से एकवचन] शक्तिशाली बनाने की कामना करते हुए मैं (वः) - तुममें से (इन्द्रम्) - इन्द्रियों के अधिष्ठाता जितेन्द्रिय पुरुष को और (यथा क्रिविम्) - जितना - जितना वह क्रियाशील है [कृ करणे] अथवा जितना - जितना वह वासनाओं का छेदन करनेवाला है [कृती छेदने] उतना ही (मंहिष्ठम्) - वृद्धिशील पुरुष अथवा दानशील पुरुष को तथा (शतक्रतुम्) - सौ के सौ वर्ष यज्ञों में व्यतीत करनेवाले पुरुष को (इन्दुभिः) - [बिन्दुभिः] सोमकणों से (सिञ्चे) - सींचता हूँ ।  २. यहाँ मन्त्रार्थ से यह स्पष्ट है कि शक्तिशाली बनने के लिए आवश्यक है कि सोमकणों का सेचन व व्यापन शरीर में ही हो । इनका अपव्यय ही हमें जीर्ण - शीर्ण करता है ।  ३. इन सोमकणों का व्यापन उन्हीं के शरीरों में होता है जोकि  [क] (इन्द्रम्) - जितेन्द्रिय बनें । जितेन्द्रियता ही वस्तुतः मूल वस्तु है । यही 'ब्रह्मचर्य' शब्द से कही जाती है । प्रभु की ओर चलना [ब्रह्म - चर] यही है । इसी के द्वारा हम प्रभु तक पहुँचेंगे ।  [ख] (क्रिविम्) - हम सदा क्रियाशील बने रहें और इस क्रियाशीलता के द्वारा [कृती] वासनाओं का छेदन करनेवाले बनें । वासनाओं के साथ सोमरक्षण का शाश्वतिक विरोध है ।  [ग] हमारे सौ के सौ वर्ष यज्ञों में व्यतीत हों , हमारा जीवन यज्ञमय हो ।  [घ] (मंहष्ठिम्) - हम 'वृद्धि' को जीवन का सूत्र बनाएँ तथा खूब दानशील हों । दान ही दिव्यताओं का वर्धन करता है - देवो दानात् [यास्क] । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभुकृपा से हम इन्द्र , क्रिवि , शतक्रतु व मंहष्ठि' बनें और इस बात के पात्र हों कि प्रभु हमें सोमकणों से सिक्त कर दें । 

स्वामी दयानन्द सरस्वती

तत्रादिमे इन्द्रशब्देन शूरवीरगुणा उपदिश्यन्ते।

अन्वय:

हे सभाध्यक्ष ! मनुष्या यथा कृषीवलाः क्रिविं कूपं सम्प्राप्य तज्जलेन क्षेत्राणि सिञ्चन्ति यथा वाजयन्तो वायव इन्दुभिः शतक्रतुं मंहिष्ठमिन्द्रं च तथा त्वमपि प्रजाः सुखैः सिञ्च संयोजय॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (आ) सर्वतः (वः) युष्माकम् (इन्द्रम्) परमैश्वर्यहेतुप्रापकम् (क्रिविम्) कूपम्। क्रिविरिति कूपनामसु पठितम्। (निघं०३.२३) (यथा) येन प्रकारेण (वाजयन्तः) जलं चालयन्तो वायवः (शतक्रतुम्) शतमसंख्याताः क्रतवः कर्म्माणि यस्मात्तम् (मंहिष्ठम्) अतिशयेन महान्तम् (सिञ्च) (इन्दुभिः) जलैः॥१॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। यथा मनुष्याः पूर्वं कूपं खनित्वा तज्जलेन स्नानपानक्षेत्रवाटिकादिसिञ्चनादि व्यवहारं कृत्वा सुखिनो भवन्ति, तथैव विद्वांसो यथावत् कलायन्त्रेष्वऽग्निं योजयित्वा तत्सम्बन्धेन जलं स्थापयित्वा चालनेन बहूनि कार्य्याणि कृत्वा सुखिनो भवन्ति॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Just as strong winds carry the cloud for rain on the earth, just as men dig the well for irrigating the field, so you serve Indra, most generous and powerful hero of a hundred acts of creation and growth, with each drop of your powers and energies.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

In the first Mantra, by the use of the term Indra, the attributes of a hero are taught.

अन्वय:

O President of the Assembly; as farmers dig a well and use its water for watering fields and as winds moving waters sprinkle along waters the fire mighty and accomplishing hundreds of works, in the same manner, you should sprinkle your subjects with happiness, make them happy and contented.

पदार्थान्वयभाषाः - (क्रिविम्) कूपम् क्रिविरिति कूपनाम ( निघ० ३.२३ ) | = Well. ( वाजयन्तः ) जलं चालयन्तो वायवः = Winds or airs. ( शतक्रतुम् ) शतम् असंख्याता ऋतवः-कर्माणि यस्मात् तम् = Accomplishing hundreds of works. (इन्दुभिः ) जलै: = With waters.( मंहिष्ठम् ) अतिशयेन महान्तम् = Very mighty
भावार्थभाषाः - There is simile in this Mantra. As men dig a well first and by using its water for bathing, drinking and watering their fields and gardens, enjoy happiness, in the same manner, learned scientists derive happiness by using the fire in machines and putting water there in proper proportion and position and accomplishing many works with their conjunction and movement.
टिप्पणी: वाजयन्तः is derived from वज-गतौ hence Rishi Dayananda taking it as the adjective वायव: of or winds which is implied by the simile has interpreted it as चालयन्त: taking the first meaning of the verb vaj in causative form. इन्दुभि: has been translated by Rishi Dayananda as जलै: with waters. It is according to the Vedic Lexicon Nighantu where it is stated in 1.12 इन्दुरिति उदकनाम (निघ० १.१२)

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या मंत्राच्याच मागच्या सूक्ताच्या अनुषंगी (इन्द्र) (अश्वि) व (उषा) या वेळेच्या वर्णनाने मागच्या सूक्ताच्या अनुषंगी अर्थाबरोबर या सूक्ताच्या अर्थाची संगती जाणली पाहिजे. ॥

भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. माणसे जशी प्रथम विहीर खोदतात, त्यातील जलाने स्नान, पान करतात, शेती व बाग इत्यादी ठिकाणी सिंचन करून सुखी होतात तसे विद्वान लोक अग्नीच्या साह्याने कलायंत्रात जल स्थित करून त्यांना चालवितात व अनेक प्रकारची कार्ये करून सुखी होतात. ॥ १ ॥