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दस्रा॑ यु॒वाक॑वः सु॒ता नास॑त्या वृ॒क्तब॑र्हिषः। आ या॑तं रुद्रवर्तनी॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

dasrā yuvākavaḥ sutā nāsatyā vṛktabarhiṣaḥ | ā yātaṁ rudravartanī ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दस्रा॑। यु॒वाक॑वः। सु॒ताः। नास॑त्या। वृ॒क्तऽब॑र्हिषः। आ। या॒त॒म्। रु॒द्र॒व॒र्त॒नी॒ इति॑ रुद्रऽवर्तनी॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:3» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:1» वर्ग:5» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:1» मन्त्र:3


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी वे अश्वी किस प्रकार के हैं, सो अगले मन्त्र में उपदेश किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - हे (युवाकवः) एक दूसरी से मिली वा पृथक् क्रियाओं को सिद्ध करने (सुताः) पदार्थविद्या के सार को सिद्ध करके प्रकट करने (वृक्तबर्हिषः) उसके फल को दिखानेवाले विद्वान् लोगो ! (रुद्रवर्त्तनी) जिनका प्राणमार्ग है, वे (दस्रा) दुःखों के नाश करनेवाले (नासत्या) जिनमें एक भी गुण मिथ्या नहीं (आयातम्) जो अनेक प्रकार के व्यवहारों को प्राप्त करानेवाले हैं, उन पूर्वोक्त अश्वियों को जब विद्या से उपकार में ले आओगे, उस समय तुम उत्तम सुखों को प्राप्त होवोगे॥३॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर मनुष्यों को उपदेश करता है कि हे मनुष्य लोगो ! तुमको सब सुखों की सिद्धि के लिये तथा दुःखों के विनाश के लिये शिल्पविद्या में अग्नि और जल का यथावत् उपयोग करना चाहिये॥३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वासना - विनाश

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र में वर्णित अश्विना को ही यहाँ (दस्रा) - नाम से स्मरण किया गया है । 'दसु उपक्षये' ये मन के काम - क्रोधादि शत्रुओं का संहार करनेवाले हैं और शरीर के रोगों को नष्ट करनेवाले हैं ।  २. (नासत्या) - ये असत्य से रहित हैं  , सत्य का ही प्रणयन करनेवाले हैं  , अर्थात् प्राणसाधना के होने पर हमारे जीवन से असत्य दूर हो जाता है । शरीर में रोग 'असत्य' हैं  , मन में राग - द्वेष 'असत्य हैं  , बुद्धि में मन्दता असत्य' है । ये प्राणापान इस सम्पूर्ण असत्य को दूर करनेवाले हैं ।  ३. हे प्राणापानो ! तुम्हारे द्वारा ही ये सोमकण (सुताः) - शरीर में उत्पादित किये जाते हैं । प्राणापानों से ही इनका शरीर में रक्षण होता है । रक्षित हुए - हुए ये सोम (युवाकवः) - [यु मिश्रण - अमिश्रण] हमें अशुभ से दूर करते हैं और शुभ से हमारा सम्पर्क कराते हैं । इस प्रकार (वृक्तबर्हिषः) [वृक्तानि - मूलैर्विजितानि - सा०] - ये वासनाओं की जड़ों को भी हृदयान्तरिक्ष में से उखाड़ फेंकते हैं और हृदयों को बड़ा निर्मल बना देते हैं ।  ४. हे प्राणापानो ! इस प्रकार सोमरक्षा के द्वारा वासनाओं व रोगों से संग्राम करनेवाले (रुद्रवर्तनी) [रोदयन्ति] - शत्रुओं को रुलानेवालों के मागाँवाले तुम (आयातम्) - हमें प्राप्त होओ । प्राणापानों का मार्ग वह हो जो कि रुद्रों का मार्ग है । रुद्र शत्रुओं को रुलानेवाले हैं । ये प्राणापान भी हमारे वासनात्मक शत्रुओं को रुलानेवाले हैं । इनके द्वारा हमारे हृदयदेश से काम-क्रोध-लोभ आदि शत्रु समूल नष्ट हो जाएँ । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से सब वासनाएँ विनष्ट हो जाती हैं । 

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तावश्विनौ कीदृशावित्युपदिश्यते।

अन्वय:

हे सुता युवाकवो वृक्तबर्हिषो विद्वांसः शिल्पविद्याविदो भवन्तो यौ रुद्रवर्त्तनी दस्रौ नासत्यौ पूर्वोक्तावश्विनावायातं समन्ताद् यानानि गमयतस्तौ यदा यूयं साधयिष्यथ तदोत्तमानि सुखानि प्राप्स्यथ॥३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (दस्रा) दुःखानामुपक्षयकर्त्तारौ। दसु उपक्षये इत्यस्मादौणादिको रक्प्रत्ययः। (युवाकवः) सम्पादितमिश्रितामिश्रितक्रियाः। यु मिश्रणे अमिश्रणे चेत्यस्माद्धातोरौणादिक आकुक् प्रत्ययः। (सुताः) अभिमुख्यतया पदार्थविद्यासारनिष्पादिनः। अत्र बाहुलकात्कर्तृकारक औणादिकः क्तप्रत्ययः। (नासत्या) न विद्यतेऽसत्यं कर्मगुणो वा ययोस्तौ। नभ्राण्नपान्नवेदा०। (अष्टा०६.३.७४) नासत्यौ चाश्विनौ सत्यावेव नासत्यावित्यौर्णवाभः सत्यस्य प्रणेतारावित्याग्रायणः। (निरु०६.१३) (वृक्तबर्हिषः) शिल्पफलनिष्पादिन ऋत्विजः। वृक्तबर्हिष इति ऋत्विङ्नामसु पठितम्। (निघं०३.१८) (आ) समन्तात् (यातम्) गच्छतो गमयतः। अत्र व्यत्ययः, अन्तर्गतो ण्यर्थश्च। (रुद्रवर्त्तनी) रुद्रस्य प्राणस्य वर्त्तनिर्मार्गो ययोस्तौ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वरो मनुष्यानुपदिशति-युष्माभिः सर्वसुखशिल्पविद्यासिद्धये दुःखविनाशाय च शिल्पविद्यायामग्नि- जलयोर्यथावदुपयोगः कर्त्तव्य इति॥३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Scholars of distinction dedicated to divine science, experts of natural metabolism, seated on the sacred vedi of scientific yajna, working on the marvellous powers of the Ashvins, fire and water, eternal media of divine power, for the elimination of suffering, let the gifts of divinity come (for the benefit of humanity).

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

O learned people, well-versed in sciences and taking out the essence of the things, mixing and separating articles properly, expert priests in the sacrifice of arts and crafts, when you will make full and proper use of the Ashvinau (water and fire etc.) which affect the Prana or Vital breath, whose attributes are true and destroyers of miseries, and which are instrumental in quick movement of various conveyances, then you will attain material happiness in this world.

पदार्थान्वयभाषाः - (दस्रौ )-दसु-उपक्षये = Therefore destroyers of miseries (युवाकू)-यु-मिश्रणामिश्रणयोः = To mix and separate. (वृक्तबर्हिषः) शिल्पफलनिष्पादिनः ऋत्विजः । वृक्तबर्हिष इति ऋऋत्विङ्नामसु (निघ० ३.१८) = Priests. ( रुद्रवर्तनी ) रुद्रस्य प्राणस्य वर्तनिर्मार्गो ययोः ।
भावार्थभाषाः - God instructs all persons that they should properly utilize the fire and water which are destroyers of miseries by the accomplishment of useful arts and crafts.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - परमेश्वर माणसांना उपदेश करतो की हे माणसांनो! तुम्ही सर्व सुखाच्या सिद्धीसाठी व दुःखाच्या निवारणासाठी शिल्पविद्येमध्ये अग्नी व जलाचा यथायोग्य उपयोग केला पाहिजे. ॥ ३ ॥