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नि ष्वा॑पया मिथू॒दृशा॑ स॒स्तामबु॑ध्यमाने। आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ni ṣvāpayā mithūdṛśā sastām abudhyamāne | ā tū na indra śaṁsaya goṣv aśveṣu śubhriṣu sahasreṣu tuvīmagha ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नि। स्वा॒प॒य॒। मि॒थु॒ऽदृशा॑। स॒स्ताम्। अबु॑ध्यमाने॒ इति॑। आ। तु। नः॒। इ॒न्द्र॒। शं॒स॒य॒। गोषु॑। अश्वे॑षु। शु॒भ्रिषु॑। स॒हस्रे॑षु। तु॒वी॒ऽम॒घ॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:29» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:27» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:3


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह क्या-क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (तुविमघ) अनेक प्रकार के धनयुक्त (इन्द्र) अविद्यारूपी निद्रा और दोषों को दूर करनेवाले विद्वान् ! जो-जो (मिथूदृशा) विषयाशक्ति अर्थात् खोटे काम वा प्रमाद अच्छे कामों के विनाश को दिखानेवाले वा (अबुध्यमाने) बोधनिवारक शरीर और मन (सस्ताम्) शयन और पुरुषार्थ का नाश करते हैं, उनको आप (निष्वापय) अच्छे प्रकार निवारण कर दीजिये (तु) फिर (सहस्रेषु) हजारहों (शुभ्रिषु) प्रशंसनीय गुणवाले (गोषु) पृथिवी आदि पदार्थ वा (अश्वेषु) वस्तु-वस्तु में रहनेवाले अग्नि आदि पदार्थों में (नः) हम लोगों को (आशंसय) अच्छे गुणवाले कीजिये॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को शरीर और आत्मा से आलस्य को दूर छोड़ के उत्तम कर्मों में नित्य प्रयत्न करना चाहिये॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

आत्मालोचन व स्वाध्याय

पदार्थान्वयभाषाः - १. उत्तम जीवन के लिए यह आवश्यक है कि हम अपना ही आत्मालोचन करें और अपने जीवनों की कमी को दूर करने का प्रयत्न करें । इसी के लिए स्वाध्याय द्वारा अपने बोध को बढ़ाएँ । घर में पति - पत्नी हैं । वे एक - दूसरे के ही दोषों को देखेंगे तो प्रेम की इतिश्री होकर घर नरक बन जाएगा । स्कूल में अध्यापक व विद्यार्थी ऐसा ही करने लगें तो शिक्षा का वातावरण समाप्त हो जाएगा । राष्ट्र में राजा और प्रजा परस्पर दोष देखने लगें तो राष्ट्र अवनत होकर शत्रुओं से पादाक्रान्त कर लिया जाएगा , अतः मन्त्र में प्रार्थना करते हैं कि (मिथूदृशा) - एक दूसरे को ही देखनेवालों को (निष्वापया) - निश्चित रूप से सुला दीजिए , अर्थात् हम एक - दूसरे को ही देखने में न लगे रहें , अपने ही जीवन का आलोचन करनेवाले बनें ।  २. (अबुध्यमाने) - जो प्रतिदिन स्वाध्याय के द्वारा अपने बोध को बढ़ाते नहीं वे (सस्ताम्) - [सम् Cease] समाप्त हो जाएँ हम नैत्यिक स्वाध्याय के द्वारा अपने ज्ञान को बढ़ानेवाले हों ।  ३. प्रभु से कहते हैं कि हे (इन्द्र) - प्रभो ! आत्मालोचन व स्वाध्याय करनेवाले (नः) - हमें आप (शभ्रेषु) - शुद्ध व (सहस्त्रेषु) - प्रसादयुक्त (गोषु) - ज्ञानेन्द्रियों में तथा (अश्वेषु) - कर्मेन्द्रियों में (आशंसय) - प्रशंसायुक्त जीवनवाला बनाइए । (तुवीमघ) - आप तो महान् ऐश्वर्यवाले हैं , हमें भी अपने ही समान ऐश्वर्ययुक्त कीजिए । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम अपना ही आलोचन करें , औरों की आलोचना न करते रहें , हम स्वाध्यायशील बनें । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स किं कुर्यादित्युपदिश्यते॥

अन्वय:

हे तुविमघेन्द्र विद्वन् ! ये मिथूदृशाबुध्यमाने शरीरमनसी आलस्ये वर्त्तमाने सस्तां शयातां पुरुषार्थनाशं प्रापयतस्ते त्वं निष्वापय निवारय पुनः सहस्रेषु शुभ्रिषु गोष्वश्वेषु नोऽस्मानाशंसय॥३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (नि) नितरां क्रियायोगे (स्वापय) निवारय। अत्र अन्तर्गतो णिज् अन्येषामपि इति दीर्घश्च (मिथूदृशा) मिथूविषयाशक्तिप्रमादौ हिंसनं च दर्शयतस्तौ। अत्र मिथृमेथृ मेधाहिंसनयोरित्यस्मादौणादिकः कुः प्रत्ययस्तदुपपदाद् दृशेः कर्त्तरि क्विप् सुपां सुलुग्० इत्याकारादेशोऽन्येषामपि दृश्यत इति दीर्घश्च। (सस्ताम्) शयाताम् (अबुध्यमाने) बोधनिवारके शरीरमनसी आलस्ये कर्मणि (आ) आदरार्थे (तु) पश्चादर्थे। पूर्ववद्दीर्घः। (नः) अस्मान् (इन्द्र) अविद्यानिद्रादोषनिवारकविद्वन् (शंसय) प्रकृष्टज्ञानवतः कुरु (गोषु) पृथिव्यादिषु (अश्वेषु) व्याप्तिशीलेष्वग्न्यादिषु (शुभ्रिषु) शुभ्राः प्रशस्ता गुणा विद्यन्ते येषु तेषु (सहस्रेषु) अनेकेषु (तुविमघ) तुवि बहुविधं धनमस्ति यस्य तत्सम्बुद्धौ। अन्येषामपि दृश्यत इति पूर्वपदस्य दीर्घः॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैः शरीरात्मनोरालस्ये दूरतस्त्यक्त्वा सत्कर्मसु नित्यं प्रयत्नोऽनुसंधेय इति॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, glorious lord of vitality, vision and will to live, eliminate the phantom of illusion and sloth of body and mind which mislead and depress, and let us awake and rise to a splendid state of a thousand-fold brilliance of knowledge, generous prosperity and fast advancement.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What else should he (Indra) do is taught further in the third Mantra.

अन्वय:

O learned person-remover of ignorance and indolence, turn away the body and mind which show attachment, laziness and violence and which are not alert, as they are impediments to enlightenment. Make us full of good knowledge, good rulers, having good cows, utilizing fire and horses in various ways, O possessor of the wealth of various kinds.

पदार्थान्वयभाषाः - ( मिथूदृशा ) मिथू विषयासक्तिप्रमादौ हिंसनं च दर्शयतस्तौ । अत्र मिथृ मेथृ-मेधा हिंसनयोः इत्यस्मात् औणादिकः कुः प्रत्ययः । तदुपपदात् दृशेः कर्तरिक्विप् सुपांसुलुक् इत्याकारादेशः अन्येषामपि दृश्यते (अष्टा० ६.३.१३७) इति दीर्घश्च । = Showing attachment, sloth and violence. ( सस्ताम् ) शयाताम् | ( इन्द्र) अविद्यानिद्रादोष निवारकविंद्वन् । = Sleep.
भावार्थभाषाः - Men should keep away or remove the laziness of the body and the soul and should always endeavor to do noble deeds.
टिप्पणी: सस्ति स्वपितिकर्मा (निघ० ३.१२) इन्द्र:- शत्रूणां दारयिता वा द्रावयिता वा इति निरुक्ते १०;८ । = The destroyer or remover of enemies. Here Rishi Dayananda has taken the internal enemies in the form of ignorance and indolence.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी आळस सोडून शरीर व आत्मा याद्वारे सदैव उत्तम कर्म केले पाहिजे. ॥ ३ ॥