यच्चि॒द्धि त्वं गृ॒हेगृ॑ह॒ उलू॑खलक यु॒ज्यसे॑। इ॒ह द्यु॒मत्त॑मं वद॒ जय॑तामिव दुन्दु॒भिः॥
yac cid dhi tvaṁ gṛhe-gṛha ulūkhalaka yujyase | iha dyumattamaṁ vada jayatām iva dundubhiḥ ||
यत्। चि॒त्। हि। त्वम्। गृ॒हेऽगृ॑हे। उलू॑खलक। यु॒ज्यसे॑। इ॒ह। द्यु॒मत्ऽत॑मम्। व॒द॒। जय॑ताम्ऽइव। दु॒न्दु॒भिः॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
उक्त उलूखल से क्या करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
विजेता का भेरीनाद
स्वामी दयानन्द सरस्वती
तेनोलूखलेन किं कर्त्तव्यमित्युपदिश्यते॥
हे उलूखलक ! विद्वँस्त्वं यद्धि गृहेगृहे युज्यसे तद्विद्यां समादधासि, स त्वमिह जयतां दुन्दुभिरिव द्युमत्तममुलूखलं वादयैतद्विद्यां (चित्) वदोपदिश॥५॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should be done with that Mortar is taught in the fifth Mantra.
O learned person who sound the mortar, as you use this (mortar) in this world and the house and know its technique well, give forth a lusty sound, like the drum of a victorious host.
