वि॒भ॒क्तासि॑ चित्रभानो॒ सिन्धो॑रू॒र्मा उ॑पा॒क आ। स॒द्यो दा॒शुषे॑ क्षरसि॥
vibhaktāsi citrabhāno sindhor ūrmā upāka ā | sadyo dāśuṣe kṣarasi ||
वि॒ऽभ॒क्ता। अ॒सि॒। चि॒त्र॒भा॒नो॒ इति॑ चित्रऽभानो। सिन्धोः॑। ऊ॒र्मौ। उ॒पा॒के। आ। स॒द्यः। दा॒शुषे॑। क्ष॒र॒सि॒॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
दान व धनलाभ
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥
यथा हे चित्रभानो विविधविद्यायुक्त विद्वँस्त्वं सिन्धोरूर्मौ जलकणविभाग इव सर्वेषां पदार्थानां विद्यानां विभक्तासि, दाशुष उपाके सत्योपदेशेन बोधान् सद्य आक्षरसि समन्ताद्वर्षसि तथा त्वं भाग्यशाली विद्वानस्माभिः सत्कर्त्तव्योऽसि॥६॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How is he (Agni) is taught in the sixth mantra.
O learned person, endowed with the wonderful radiance of various sciences, you are analyzer and classifier of the sciences of various objects, like the waves or particles of the sea and soon rainest true wisdom on the person who surrenders himself to you for acquiring knowledge. Why should not we revere such a lucky wise and learned man ?
