यच्चि॒द्धि ते॒ विशो॑ यथा॒ प्र दे॑व वरुण व्र॒तम्। मि॒नी॒मसि॒ द्यवि॑द्यवि॥
yac cid dhi te viśo yathā pra deva varuṇa vratam | minīmasi dyavi-dyavi ||
यत्। चि॒त्। हि। ते॒। विशः॑। य॒था॒। प्र। दे॒व॒। व॒रु॒ण॒। व्र॒तम्। मि॒नी॒मसि॑। द्यवि॑ऽद्यवि॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब पच्चीसवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके पहिले मन्त्र में परमेश्वर ने दृष्टान्त के साथ अपनी प्रार्थना का प्रकाश किया है॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
स्खलनशीलो मनुष्यः To err is human
स्वामी दयानन्द सरस्वती
तत्रादौ प्रथममन्त्रे दृष्टान्तेन जगदीश्वरस्य प्रार्थना प्रकाश्यते॥
हे देव वरुण जगदीश्वर ! त्वं यथाऽज्ञानात्कस्यचिद्राज्ञो मनुष्यस्य वा विशः प्रजाः सन्तानादयो वा द्यविद्यव्यपराध्यन्ति कदाचित्कार्याणि हिंसन्ति स तन्न्यायं करुणां च करोति, तथैव वयं ते तव यद्व्रतं हि प्रमिणीमस्यस्मभ्यं तन्न्यायं करुणां चित्करोषि॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
In the first Mantra, by the way of illustration, prayer to God is revealed.
O God, the most acceptable and the Best, the Giver of happiness, as when one's sons or subjects commit errors day by day but that man or king is just to them as well as kind, in the same manner, although we men, transgenes or violate Thy laws day after day, Thou art Just but at the same time Kind to us.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)चोविसाव्या सूक्तात सांगितलेल्या प्रजापती इत्यादी अर्थांमध्ये जो वरुण शब्द आहे त्याचा अर्थ या पंचविसाव्या सूक्तात सांगितल्याने या सूक्ताच्या अर्थाची संगती पहिल्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर जाणली पाहिजे. ॥
