भक्त के जीवन की तीन बातें
पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र में पूषा व आघृणि बनकर प्रभु - प्राप्ति का संकेत हुआ था । जब मैं प्रभु को प्राप्त करूं तो (उत+उ) - और निश्चय से (सः) - वे प्रभु (मह्यम्) - मेरे लिए (इन्दुभिः) - ['सोमा वा इन्दुः' शत० २/२/३/२३] इन सोमकणों के द्वारा (षट्) - [यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह] मन से युक्त पाँच ज्ञानेन्द्रियों को जोकि (युक्तान्) - योगयुक्त व एकाग्र और स्थिर हो गई हैं , उनको (अनुसेषिधत्) - प्राप्त कराता है । प्रभु को प्राप्त करके ही मन व इन्द्रियाँ स्थिर होती हैं , उससे पूर्व तो वे भटकती ही रहती हैं । सान्त विषयों में इनके स्थिर होने का सम्भव ही नहीं । उन विषयों के आगे - पीछे को उन्होंने देखा , उन विषयों की नवीनता समाप्त हुई और ये उनसे हटकर अन्यत्र चली । प्रभु अनन्त हैं , वहाँ पहुँचकर न ये अन्त ही पाती हैं और न अन्यत्र जाने का प्रसंग आता है । यह इन्द्रियों की स्थिरता और पवित्रता सोम की रक्षा के द्वारा होती है ।
२. [न इति अर्थे । (न) - और वे प्रभु (गोभिः) - बैलों के द्वारा (यवम्) - यवादि धान्यों की (चर्कृषत्) - कृषि मुझसे कराते हैं , अर्थात् वे प्रभु मुझे ऐसी प्रेरणा देते हैं कि मैं कृषि को अपनाता हूँ और द्यूत से दूर भागता हूँ । 'अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व' - "पाशों से मत खेलो , खेती ही करो" - इस वेदोपदेश को मैं जीवन में अनुदित करता - घटाता हूँ ।
३. यहाँ मन्त्रार्थ के उत्तरार्द्ध से यह बात स्पष्ट है कि [क] खेती बैलों से होनी ही ठीक है , ट्रैक्टर्स से नहीं । ऊबड़ - खाबड़ भूमि को ट्रैक्टर्स से एक बार ठीक बेशक कर लिया जाए , परन्तु उनके द्वारा सदा खेती करना उपयोगी नहीं । बैलों से खेती होने पर खेत छोटे - छोटे होते हैं , क्यारियों की मुंडेरों पर लगी झाड़ियों पर चिड़ियाँ आदि बसेरा करती हैं । ये खेती के विध्वंसक कीटों को समाप्त करके कृषि की रक्षा करती हैं । ट्रैक्टर्स से जुतनेवाले खेत मीलों - मील चले जाने से इन पक्षियों के लिए सुविधाजनक आश्रय प्राप्त नहीं होता , परिणामतः विध्वंसक कीटों से खेतियाँ नष्ट कर दी जाती हैं । बैलों से खेतों के जोते जाने पर स्वाभाविक खाद भी भूमि को मिलता रहता है । ट्रैक्टर्स से जोतने पर खेतों में कृत्रिम खादों की आवश्यकता होती है । [ख] दूसरी बात यह भी संकेतित हो रही है कि खेती जो इत्यादि उपयोगी धान्यों की ही होनी ठीक है , तम्बाकू आदि की नहीं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उपासक का जीवन तीन बातों से युक्त होता है - [क] वह सोम की रक्षा करता है , [ख] इन्द्रियों व मन को प्रभु में स्थिर करता है , [ग] यवादि की कृषि करता हुआ जीविका का उपार्जन करता है । ये कर्षणि - चर्षणि ही प्रभु को प्यारे होते हैं ।