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ती॒व्राः सोमा॑स॒ आ ग॑ह्या॒शीर्व॑न्तः सु॒ता इ॒मे। वायो॒ तान्प्रस्थि॑तान्पिब॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tīvrāḥ somāsa ā gahy āśīrvantaḥ sutā ime | vāyo tān prasthitān piba ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ती॒व्राः। सोमा॑सः। आ। ग॒हि॒। आ॒शीःऽव॑न्तः। सु॒ताः। इ॒मे। वायो॒ इति॑। तान्। प्रऽस्थि॑तान्। पि॒ब॒॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:1 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:8» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:1


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब तेईसवें सूक्त का आरम्भ है, इसके पहिले मन्त्र में वायु के गुण प्रकाशित किये हैं-

पदार्थान्वयभाषाः - जो (इमे) (तीव्राः) तीक्ष्णवेगयुक्त (आशीर्वन्तः) जिनकी कामना प्रशंसनीय होती है (सुताः) उत्पन्न हो चुके वा (सोमासः) प्रत्यक्ष में होते हैं (तान्) उन सबों को (वायो) पवन (आगहि) सर्वथा प्राप्त होता है तथा यही उन (प्रस्थितान्) इधर-उधर अति सूक्ष्मरूप से चलायमानों को (पिब) अपने भीतर कर लेता है, जो इस मन्त्र में आशीर्वन्तः इस पद को सायणाचार्य ने श्रीञ् पाके इस धातु का सिद्ध किया है, सो भाष्यकार की व्याख्या से विरुद्ध होने से अशुद्ध ही है।
भावार्थभाषाः - प्राणी जिनको प्राप्त होने की इच्छा करते और जिनके मिलने में श्रद्धालु होते हैं, उन सबों को पवन ही प्राप्त करके यथावत् स्थिर करता है, इससे जिन पदार्थों के तीक्ष्ण वा कोमल गुण हैं, उन को यथावत् जानके मनुष्य लोग उन से उपकार लेवें॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वायु का सोमपान

पदार्थान्वयभाषाः - १. यहाँ जीव को "वायो" कहकर सम्बोधित किया गया है । [वा गतिगन्धनयोः] हे गति व क्रियाशीलता के द्वारा सब बुराइयों का संहार करनेवाले जीव ! (सोमासः) - ये शरीर में उत्पन्न होनेवाले सोम - [वीर्य] - कण (तीव्राः) - बड़े तीव्र और तेजस्विता को देनेवाले हैं । (आगहि) - तू इन्हें सर्वथा ग्रहण करनेवाला बन ।  २. (सुताः) - शरीर में उत्पन्न हुए - हुए (इमे) - ये सोमकण (आशीर्वन्तः) - इच्छाओंवाले हैं [आशीः - इच्छा] । ये सोमकण हमारी सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं ।  ३. प्राणादि की साधना के द्वारा (प्रस्थितान्) - प्रकृष्ट मार्ग की ओर चलते हुए [उत्तरवेदिं प्रति आनीतात् - सा०] शरीर में मस्तिष्क ही उत्तरवेदी है । मस्तिष्क की ओर लाये हुए (तान्) - उन सोमकणों को हे (वायो) - जीव ! तू (पिब) - पीनेवाला बन । प्राणसाधना से इन रेतः कणों की ऊर्ध्वगति होती है । यही सोम का प्रस्थान है । इन सोमकणों को जब हम शरीर में ही व्याप्त करने का प्रयत्न करते हैं तब ये हमारी सब ऐहिक और आमुष्मिक कामनाओं को पूर्ण करनेवाले होते हैं । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - सोमकण तेजस्विता को देनेवाले हैं , सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं । इनका पान वही कर पाता है जो 'वायु' बनता है - गति के द्वारा सब बुराइयों का संहार करता है । 

स्वामी दयानन्द सरस्वती

तत्रादिमेन वायुगुणा उपदिश्यन्ते।

अन्वय:

य इमे तीव्रा आशीर्वन्तः सुताः सोमासः सन्ति तान् वायुरागहि समन्तात् प्राप्नोत्ययमेव तान् प्रस्थितान् पिबान्तःकरोति॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (तीव्राः) तीक्ष्णवेगाः (सोमासः) सूयन्त उत्पद्यन्ते ये ते पदार्थाः। अत्र अर्तिस्तुसुहुसृ० (उणा०१.१४०) अनेन षु धातोर्मन् प्रत्ययः। आज्जसरेसुग् इत्यसुक् च। (आ) सर्वतोऽर्थे (गहि) प्राप्नोति। अत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट्। बहुलं छन्दसि इति शपो लुक् च। (आशीर्वन्तः) आशिषः प्रशस्ताः कामना भवन्ति येषां ते। अत्र शास इत्वे आशासः क्वावुपसंख्यानम्। (अष्टा०वा०६.४.३४) अनेन वार्त्तिकेनाशीरिति सिद्धम्। ततः प्रशंसार्थे मतुप्। छन्दसीर इति वत्वञ्च। सायणाचार्येण ‘श्रीञ् पाके’ इत्यस्मादिदं पदं साधितं तदिदं भाष्यविरोधादशुद्धमस्तीति बोध्यम्। (सुताः) उत्पन्नाः (इमे) प्रत्यक्षा अप्रत्यक्षाः (वायो) पवनः (तान्) सर्वान् (प्रस्थितान्) इतस्ततश्चलितान् (पिब) पिबत्यन्तःकरोति। अत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट् च॥१॥
भावार्थभाषाः - प्राणिनो यान् प्राप्तुमिच्छन्ति यान् प्राप्ता सन्त आशीर्वन्तो भवन्ति, तान् सर्वान् वायुरेव प्रापय्य स्वस्थान् करोति, येषु पदार्थेषु तीक्ष्णाः कोमलाश्च गुणाः सन्ति, तान् यथावद्विज्ञाय मनुष्या उपयोगं गृह्णीयुरिति॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Sharp and lovely tonics are these somas, distilled essences of herbs. Vayu, vitality of the winds, take them on as they flow and energise them as food for the mind and soul.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

In the first Mantra of this hymn the attributes of Vayu are taught.

अन्वय:

These sharp and desirable substances are present here. it is the Vayu (wind) that covers them from all sides and it is again the wind that takes them in, when they move.

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमास:) सूयन्ते उत्पद्यन्ते ये ते पदार्थाः । अत्र अर्तिस्तु सुहृ (उणादि० १.१३९) अनेन षु-प्रसवश्वर्ययोः इति धातोर्मन् प्रत्ययः । आज्जसेर सुक् इत्यसुक्च (आगहि) सर्वतः प्राप्नोति । अत्र व्यत्ययो लड्थें लोट् । बहुलं छन्दसीति शपो लुक्च | (आशीर्वन्तः ) आशिष : प्रशस्ताः कामना भवन्ति येषां ते । अत्र शास इत्वे आशास:क्वावुपसंख्यानम् || (अष्टा० ६.४.३४ ) अनेन वार्तिकेनाशीरिति सिद्धम् । = desirable. (प्रस्थितान ) इतस्तत: चलितान् । = moving hither and thither.
भावार्थभाषाः - It is the Vayu (wind) that makes all substances which are desired by all and by attaining which they consider themselves to be lucky, givers of health. Men should know well the attributes whether sharp or mild of all objects and then take proper benefit from them.
टिप्पणी: विप्रास इति मेधाविनाम (निघ० ३.१५ ) विपन्यवः is derived from पन व्यवहारे स्तुतौ च Here it is the praisers of God-devotees. So according to this Mantra, it is by the combination of knowledge, devotion and action that it is possible to attain God.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

पूर्व सूक्तात सांगितलेल्या अश्वी इत्यादी पदार्थांचे अनुषंगी वायू इत्यादी जे पदार्थ आहेत, त्यांच्या वर्णनाने मागील बाविसाव्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर या तेविसाव्या सूक्ताच्या अर्थाची संगती जाणली पाहिजे.

भावार्थभाषाः - प्राणी ज्या पदार्थांना प्राप्त करण्याची इच्छा करतात व जे मिळाल्यावर आशीर्वाद देतात, त्या सर्वांना वायूच स्वस्थ ठेवतो. त्यासाठी ज्या पदार्थांचे तीक्ष्ण किंवा कोमल गुण असतात त्यांना यथायोग्य जाणून माणसांनी त्यांचा उपयोग करून घ्यावा. ॥ १ ॥