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न॒हि वा॒मस्ति॑ दूर॒के यत्रा॒ रथे॑न॒ गच्छ॑थः। अश्वि॑ना सो॒मिनो॑ गृ॒हम्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nahi vām asti dūrake yatrā rathena gacchathaḥ | aśvinā somino gṛham ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

न॒हि। वा॒म्। अस्ति॑। दू॒र॒के। यत्र॑। रथे॑न। गच्छ॑थः। अश्वि॑ना। सो॒मिनः॑। गृ॒हम्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:4» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

इसको करके अश्वियों के योग से क्या होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - हे रथों के रचने वा चलानेहारे सज्जन लोगो ! तुम (यत्र) जहाँ उक्त (अश्विना) अश्वियों से संयुक्त (रथेन) विमान आदि यान से (सोमिनः) जिसके प्रशंसनीय पदार्थ विद्यमान हैं, उस पदार्थविद्या वाले के (गृहम्) घर को (गच्छथः) जाते हो, वह दूरस्थान भी (वाम्) तुमको (दूरके) दूर (नहि) नहीं है॥४॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! जिस कारण अग्नि और जल के वेग से युक्त किया हुआ रथ अति दूर भी स्थानों को शीघ्र पहुँचाता है, इससे तुम लोगों को भी यह शिल्पविद्या का अनुष्ठान निरन्तर करना चाहिये॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु के घर में

पदार्थान्वयभाषाः - १. हम प्राणसाधना करते हुए मन्त्रों के अनुसार [क] सोम - रक्षा में समर्थ होते हैं । [ख] शरीर को नीरोग बनाते हैं । [ग] इन्द्रियों को निर्दोष , [घ] मन को दिव्य , [ङ] तथा मस्तिष्क को ज्ञानोज्ज्वल बनाते हैं । [च] इसके साथ हमारी वाणी मधुर व सूनुत हो जाती है । इन सब साधनाओं का यह परिणाम होना ही चाहिए कि हम प्रभु को प्राप्त करनेवाले बनें । इसी बात को प्रस्तुत मन्त्र में इस प्रकार कहते हैं कि हे (अश्विना) - प्राणापानो ! (यत्रा) - जहाँ (सोमिनः) - इस सोम का उत्पादन करनेवाले प्रभु के (गृहम्) - घर को (रथेन) - इस शरीररूप रथ से (गच्छथः) - जाते हो तो वह (वाम्) - आपके लिए (दूरके नहि अस्ति) - दूर नहीं है ।  २.मन्त्रार्थ में प्रभु को ' सोमी' शब्द से स्मरण करना भी बड़ा भावपूर्ण है । प्रभु सोमी हैं , सोम को हममें उत्पादित करते हैं । इस सोम को यदि हम शरीर में सुरक्षित रखने का प्रयत्न करते हैं , तो इस प्रयत्न से हम प्रभु का आदर कर रहे होते हैं । प्रभु की प्राप्ति इस सोम - रक्षण के बिना सम्भव नहीं है । इस सोम का रक्षण प्राणसाधना से होता है , अतः कहा गया कि ये प्राणापान ही सोमी प्रभु के घर में हमें ले - जानेवाले होते हैं , उनके लिए यह कार्य कठिन नहीं है । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से सोम की रक्षा करके हम उस सोमी प्रभु के घर में पहुँचनेवाले होंगे । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

एतं कृत्वाऽश्विनोर्योगेन किं भवतीत्युपदिश्यते।

अन्वय:

हे रथानां रचयितृचालयितारौ युवां यत्राश्विना रथेन सोमिनो गृहं गच्छथस्तत्र दूरस्थमपि स्थानं वा युवयोर्दूरके नह्यस्ति॥४॥

पदार्थान्वयभाषाः - (नहि) प्रतिषेधार्थे (वाम्) युवयोः (अस्ति) भवति (दूरके) दूर एव दूरके। स्वार्थे कन्। (यत्र) यस्मिन्। ऋचि तुनुघ० (अष्टा०६.३.१३३) इति दीर्घः। (रथेन) विमानादियानेन (गच्छथः) गमनं कुरुतम्। लट् प्रयोगोऽयम्। (अश्विना) अश्विभ्यां युक्तेन (सोमिनः) सोमाः प्रशस्ताः पदार्थाः सन्ति यस्य तस्य। अत्र प्रशंसार्थ इनिः। (गृहम्) गृह्णाति यस्मिंस्तत्॥४॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्या ! यतोऽश्विवेगयुक्तं यानमतिदूरमपि स्थानं शीघ्रं गच्छति तस्मादेताभिरेतन्नित्यमनुष्ठेयम्॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, masters of the celestial chariot, wherever you reach by the chariot, even farthest to the house of the lord of soma wealth, nothing is too far for you.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What is the result of the combination of अश्विनौ is taught in the fourth Mantra.

अन्वय:

O manufactures and drivers of the cars, when with the aero planes or other cars by the combination of fire and water, you go to the house of a man possessing praise worthy articles, there is nothing far away from you.

पदार्थान्वयभाषाः - (रथेन) विमानादियानेन । = by the car or chariot that is delightful. (अश्विना ) अश्विभ्यां युक्तेन । (सोमिनः) सोमा:- प्रशस्ताः पदार्थाः सन्ति यस्य तस्य । = Of the persons who possess admirable acts. षु प्रसवैश्वर्ययोः ।
भावार्थभाषाः - O men, because the car possessing the rapidity of fire and water goes even to the most distant places, there is nothing far away for you. You should make proper and methodical use of the fire and water.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो! अग्नी व जलाने वेगयुक्त केलेला रथ (वाहन) अतिदूर स्थानीही तात्काळ पोहोचवितो. त्यासाठी तुम्हीही त्या शिल्पविद्येचे निरंतर अनुष्ठान करावे. ॥ ४ ॥