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या सु॒रथा॑ र॒थीत॑मो॒भा दे॒वा दि॑वि॒स्पृशा॑। अ॒श्विना॒ ता ह॑वामहे॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yā surathā rathītamobhā devā divispṛśā | aśvinā tā havāmahe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

या। सु॒ऽरथा॑। र॒थिऽत॑मा। उ॒भा। दे॒वा। दि॒वि॒ऽस्पृशा॑। अ॒श्विना॑। ता। ह॒वा॒म॒हे॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:2 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:4» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - हम लोग (या) जो (दिविस्पृशा) आकाशमार्ग से विमान आदि यानों को एक स्थान से दूसरे स्थान में शीघ्र पहुँचाने (रथीतमा) निरन्तर प्रशंसनीय रथों को सिद्ध करनेवाले (सुरथा) जिनके योग से उत्तम-उत्तम रथ सिद्ध होते हैं (देवा) प्रकाशादि गुणवाले (अश्विनौ) व्याप्ति स्वभाववाले पूर्वोक्त अग्नि और जल हैं, (ता) उन (उभा) एक-दूसरे के साथ संयोग करने योग्यों को (हवामहे) ग्रहण करते हैं॥२॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्यों के लिये अत्यन्त सिद्धि करानेवाले अग्नि और जल हैं, वे शिल्पविद्या में संयुक्त किये हुए कार्य्यसिद्धि के हेतु होते हैं॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्राणसाधना का लाभ

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र के अनुसार प्राणापान की साधना से सोम का शरीर में ही व्यापन होता है । शरीर में सोम के व्यापन से शरीर सब रोगों से रहित हो जाता है , इन्द्रियाँ निर्दोष हो जाती हैं , मन दिव्य भावनाओं से भर जाता है और ज्ञानज्योति चमक उठती है , अतः कहते हैं कि (या उभा) - प्राणापान ये दोनों (सुरथा) - उत्तम शरीररूप रथवाले हैं , अर्थात् जिससे रथ सब प्रकार के रोगरूप [रुजो भंगे] टूट - फूट से रहित हो जाता है । प्राणशक्ति के साथ रोगों का निवास नहीं होता । प्राणशक्ति [vitality] को न्यूनता से ही रोग आक्रमण करते हैं ।  २. ये प्राणापान (रथीतमा) - बड़ी उत्तमता से शरीररूप रथ का सञ्चालन करनेवाले हैं । इन्द्रियरूप घोड़े इस शरीर - रथ में जुते हैं । ये घोड़े ही इस रथ को खींचते हैं । प्राणसाधना से इन इन्द्रियाश्वों के सब दोष दग्ध हो जाते हैं , अतः ये रथ को बड़ी उत्तमता से ले - चलनेवाले हैं ।  ३. (देवाः) - ये प्राणापान मन के असुर - भावों को समाप्त करके दिव्य भावनाओं से परिपूर्ण करते हैं ।  ४. (दिविस्पृशा) - ये प्राणापान द्युलोक से स्पृष्ट होनेवाले हैं , अर्थात् मस्तिष्क को उसी प्रकार ज्ञानोज्ज्वल करनेवाले हैं जैसे कि सूर्यादि से द्युलोक उज्ज्वल होता है । (ता अश्विना) - उन प्राणापानों को (हवामहे) - हम पुकारते हैं । ' हमारे प्राणापान इस प्रकार के हों' ऐसी हम प्रार्थना करते हैं । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से शरीर नीरोग होता है , इन्द्रियाँ निर्दोष बनती हैं , मन दिव्य भावनाओं से भर जाता है , मस्तिष्क प्रकाश का स्पर्श करनेवाला होता है । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते।

अन्वय:

वयं यौ दिविस्पृशा रथीतमा सुरथा देवाऽश्विनौ स्तस्तावुभौ हवामहे स्वीकुर्मः॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (या) यौ। अत्र षट्सु प्रयोगेषु सुपां सुलुग्० इत्याकारादेशः। (सुरथा) शोभना रथा याभ्यां तौ (रथीतमा) प्रशस्ता रथा विद्यन्ते ययोः सकाशात् तावतिशयितौ। रथिन ईद्वक्तव्यः। (अष्टा०वा०८.२.१७) इतीकारादेशः। (उभा) द्वौ परस्परमाकांक्ष्यौ (देवा) देदीप्यमानौ (दिविस्पृशा) यौ दिव्यन्तरिक्षे यानानि स्पर्शयतस्तौ। अत्रान्तर्गतो ण्यर्थः। (अश्विना) व्याप्तिगुणशीलौ (ता) तौ (हवामहे) आदद्मः। अत्र बहुलं छन्दसि इति शपो लुकि श्लोरभावः॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैर्यौ शिल्पानां साधकतमावग्निजले स्तस्तौ सम्प्रयोजितौ कार्य्यसिद्धिहेतू भवत इति॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - We invoke the Ashvins, divine master makers of the chariot, most powerful energies of motion, water and fire, fire and earth, who can touch the skies.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What is the nature of Ashvinau is taught in he second Mantra.

अन्वय:

We invoke or make proper use of the Ashvins (earth and water) which are both divine and make the conveyances touch the sky, the best of charioteers, bright or beneficial.

पदार्थान्वयभाषाः - ( दिविस्पृशा ) यो दिवि अन्तरिक्षे यानानि स्पर्शयतस्तौ ।= which make the cars or conveyances touch the middle region. (अश्विनौ) व्याप्तिगुणशीले अग्नि-जले = The fire and water. ( हवामहे) आदम: = Accept.
भावार्थभाषाः - The fire and water which are best instruments in accomplishing all works of arts and crafts should be properly utilized.
टिप्पणी: The various meanings of the term अश्विनौ or Ashvinau are given in the Brahmanas and Nirukta etc. द्यावापृथिव्यौ, सूर्याचन्द्रमसौ, अहोरात्रौ, अश्विनौ वै देवानां भिषजौ- = Divine physicians. Here Rishi Dayananda has taken it to mean जलाग्नी ( water and fire.) In his commentary on Rig. 1. 3.1 Rishi Dayananda has clearly stated: अश्विनौ इति पदनाम पठितम् ( निघ० ५-६ ) अनेनापि गमनप्राप्तिनिमित्तौ अश्विनौ जलाग्नी गृह्येते । By Ashvinau are meant the water and the fire, which are instruments in motion and attainment of various kinds. हवामहे is derived from हु-दानादनयोः आदानें च Here Rishi Dayananda has taken it in the sense of acceptance.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांसाठी अग्नी व जल हे अत्यंत सिद्धी करविणारे असतात. ते शिल्पविद्येत संयुक्त केलेल्या कार्यसिद्धीचे हेतू असतात. ॥ २ ॥