या सु॒रथा॑ र॒थीत॑मो॒भा दे॒वा दि॑वि॒स्पृशा॑। अ॒श्विना॒ ता ह॑वामहे॥
yā surathā rathītamobhā devā divispṛśā | aśvinā tā havāmahe ||
या। सु॒ऽरथा॑। र॒थिऽत॑मा। उ॒भा। दे॒वा। दि॒वि॒ऽस्पृशा॑। अ॒श्विना॑। ता। ह॒वा॒म॒हे॒॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वे किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्राणसाधना का लाभ
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते।
वयं यौ दिविस्पृशा रथीतमा सुरथा देवाऽश्विनौ स्तस्तावुभौ हवामहे स्वीकुर्मः॥२॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What is the nature of Ashvinau is taught in he second Mantra.
We invoke or make proper use of the Ashvins (earth and water) which are both divine and make the conveyances touch the sky, the best of charioteers, bright or beneficial.
