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स्यो॒ना पृ॑थिवि भवानृक्ष॒रा नि॒वेश॑नी। यच्छा॑ नः॒ शर्म॑ स॒प्रथः॑॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

syonā pṛthivi bhavānṛkṣarā niveśanī | yacchā naḥ śarma saprathaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स्यो॒ना। पृ॒थि॒वि॒। भ॒व॒। अ॒नृ॒क्ष॒रा। नि॒ऽवेश॑नी। यच्छ॑। नः॒। शर्म॑। स॒ऽप्रथः॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:15 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:6» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:15


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

यह भूमि किसलिये और कैसी है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

पदार्थान्वयभाषाः - जो यह (पृथिवी) अति विस्तारयुक्त (स्योना) अत्यन्त सुख देने तथा (अनृक्षरा) जिसमें दुःख देनेवाले कण्टक आदि न हों (निवेशनी) और जिसमें सुख से प्रवेश कर सकें, वैसी (भव) होती है, सो (नः) हमारे लिये (सप्रथः) विस्तारयुक्त सुखकारक पदार्थवालों के साथ (शर्म्म) उत्तम सुख को (यच्छ) देती है॥१५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को योग्य है, कि यह भूमि ही सब मूर्त्तिमान् पदार्थों के रहने की जगह और अनेक प्रकार के सुखों की करानेवाली और बहुत रत्नों को प्राप्त करानेवाली होती है, ऐसा ज्ञान करें॥१५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुखद शरीर [स्योना पृथिवी]

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र के अनुसार हृदय के प्रभु का निवास बनने पर (पृथिवि) - हे शरीर ! तू (स्योना) - सुखद (भव) - हो । एक बालक के कष्ट तभी से आरम्भ होते हैं जब वह माता से वियुक्त होता है , इसी प्रकार हमारे भी कष्ट तभी आरम्भ होते हैं जब हम प्रभु से दूर होते हैं । मेरा हृदय प्रभु का ध्रुवपद है तो उस अमृतप्रभु के रक्षण में मुझे कष्ट कैसे हो सकता है?  २.मेरा यह पृथिवीरूप शरीर (अनृक्षरा) - कण्टकों से रहित हो [अक्षरः - कण्टक] । इसमें सुख के विनाशक तत्त्वों का अभाव हो । इन कण्टकों के अभाव में मैं निरन्तर उन्नतिशील बनूं ।  ३. (निवेशनी) - यह शरीररूपी पृथिवी सब दिव्य शक्तियों [देवपत्नियों] की निवासस्थानभूत हो । ४. इस प्रकार यह शरीर हमें (सप्रथः) - सब शक्तियों के विस्तार से युक्त (शर्म) - शरण [गृह] को (यच्छ) - दें , अर्थात् यह शरीर मेरा ऐसा घर हो जिसमें सब शक्तियों का उचित विस्तार हो । 
भावार्थभाषाः - भावार्थ - यह शरीररूपी पृथिवी ' सुखद - कण्टकरहित - उत्तम निवासवाली व विस्तृत शक्तियों की शरणभूत' हो । 
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

इयं भूमिः किमर्था कीदृशी चेत्युपदिश्यते।

अन्वय:

येयं पृथिवी स्योनाऽनृक्षरा निवेशनी भवति सा नोऽस्मभ्यं सप्रथः शर्म्म यच्छ प्रयच्छति॥१५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (स्योना) सुखहेतुः। इदं ‘सिवु’धातो रूपम् सिवेष्टेर्यू च। (उ०३.९) अनेन नः प्रत्ययष्टेर्यूरादेश्च। स्योनमिति सुखनामसु पठितम्। (निघं०३.६) (पृथिवि) विस्तीर्णा सती विशालसुखदात्री भूमिः। अत्र पुरुषव्यत्ययः। (भव) भवति। अत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट् च। (अनृक्षरा) अविद्यमाना ऋक्षरा दुःखप्रदाः कण्टकादयो यस्यां सा (निवेशनी) निविशन्ति प्रविशन्ति यस्यां सा (यच्छ) यच्छति फलादिभिर्ददति। अत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट्। द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घश्च। (नः) अस्मभ्यम् (शर्म) सुखम् (सप्रथः) यत् प्रथोभिर्विस्तृतैः पदार्थैः सह वर्त्तते तत्। यास्कमुनिरिमं मन्त्रमेवं व्याख्यातवान्-सुखा नः पृथिवि भवानृक्षरा निवेशन्यृक्षरः कण्टक ऋच्छतेः। कण्टकः कन्तपो वा कृन्ततेर्वा कण्टतेर्वा स्याद् गतिकर्म्मण उद्गततमो भवति। यच्छ नः शर्म्म यच्छन्तु शरणं सर्वतः पृथु। (निरु०९.३२)॥१५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैर्भूगर्भविद्यया गुणैर्विदितेयं भूमिरेव मूर्त्तिमतां निवासस्थानमनेकसुखहेतुः सती बहुरत्नप्रदा भवतीति वेद्यम्॥१५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Dear green earth, beautiful, free from thorns of sufferance, wide expansive happy haven for all, give us a happy home of pleasure and delight.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What is the nature of the earth is taught in the fifteenth mantra.

अन्वय:

The earth which is free from thorns and pits, vast and giver of vast happiness, the resting place for all durable substances gives us delight and pleasure by providing fruits and corns etc.

पदार्थान्वयभाषाः - (स्योना) सुखहेतु: स्योनमिति सुखनामसु पठितम् (निघ० ३.६ ) = Source of happiness. (पृथिवि) विस्तीर्णा सती विशालसुखदात्री भूमिः अत्र पुरुषव्यत्ययः । (भव ) भवति अत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट् च । = Vast and giver of vast happiness. (अनृक्षरा ) अविद्यमाना ऋक्षरा: दुःखप्रदाः कण्टकादयो यस्यां सा । = Free from thrones and pits. (यच्छ) यच्छति फलादिभिर्ददाति = Provides fruits etc. (सप्रथ:) यत् प्रथोभिर्विस्तृतैः पदार्थैः सह वर्तते । = Vast or spread wide.
भावार्थभाषाः - When this earth is perfectly known by men with the help of Geology and other sciences, it becomes the source of happiness, the dwelling place of embodied beings and provider of many jewels and diamonds.
टिप्पणी: Rishi Dayananda has pointed out in his commentary that there is change of person and case etc. but that is just to make clear, lest ignorant or ordinary persons may not labor under the delusion that there is prayer addressed to the inanimate earth. But as in the Vedas, as well as in all poetry, inanimate objects are addressed as if they had life. अचेतनान्यपि चेतनवत् स्तूयन्ते (निरुक्ते अ० ७ ) It is not quite necessary to suppose there is or change of person, case, gender etc. As a matter of fact, there are many such changes (व्यत्यय) pointed out in Rishi Dayananda's commentary just for the sake of clarification. 2. Rishi Dayananda himself has given another interpretation to this in Yajurveda 36.13. where the meaning is with regard to the wife, taking the apparent meaning of earth as a simile. There the meaning is as follows- O wife, calm like the earth, just as the earth free from thorns and pits, the resting place for all durable substances, is comfortable to us, so should you be. Just as wide earth gives us place for dwelling, so should you delight affording, give us domestic happiness. To quote Rishi Dayananda's own words- हे पृथिवीव वर्तमाने स्त्रि । यथाऽनृक्षरा निवेशनी पृथिवी नो भवति तथा त्वं भव सा समथा न शर्म यच्छतु तथा स्योना त्वं नः शर्म यच्छ । It is clear that in this case, there is no need of any change in person, case or gender etc.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ही भूमी सर्व मूर्तिमान पदार्थ राहण्याचे स्थान असून, अनेक प्रकारचे सुख देणारी व अनेक रत्ने प्राप्त करून देणारी आहे हे माणसांनी जाणावे. ॥ १५ ॥