ता म॒हान्ता॒ सद॒स्पती॒ इन्द्रा॑ग्नी॒ रक्ष॑ उब्जतम्। अप्र॑जाः सन्त्व॒त्रिणः॑॥
tā mahāntā sadaspatī indrāgnī rakṣa ubjatam | aprajāḥ santv atriṇaḥ ||
ता। म॒हान्ता॑। सद॒स्पती॒ इति॑। इन्द्रा॒ग्नी॒ इति॑। रक्षः॑। उ॒ब्ज॒त॒म्। अप्र॑जाः। स॒न्तु॒। अ॒त्रिणः॑॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वे किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
राक्षसों का समूल विनाश
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते।
मनुष्यैर्यौ सम्यक् प्रयुक्तौ महान्ता महान्तौ सदस्पती इन्द्राग्नी रक्ष उब्जतं कुटिलं रक्षो दूरीकुरुतो याभ्यामत्रिणः शत्रवोऽप्रजाः सन्तु भवेयुरेतौ सर्वैर्मनुष्यैः कथं न सूपयोजनीयौ॥५॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What are their attributes (of Indra and Agni) is taught in the fifth Mantra.
Why should not all men properly utilize Indra and Agni (air and fire) which when used methodically or scientifically are mighty, protectors of various articles possessing many qualities and destroyers of wicked dealings. By their use, let wicked foes who are devourers of men be destitute of progeny.
